छ50पा. (00।652, ७उस्षरा ॥४ए05 2 छाप्रएशाड 08॥ 887 099 00005 जाए छा (४४७ फ्राहशैप5 वाह गा0पा

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राजनीति विज्ञान के सिद्धान्त

[ गिरावट २] ६5 067 >0070%7 50 ध्ाप८८] (राजस्थान एवं मज़तेर विश्दविदात्तयों हारा निर्धारित नवोभतम हे पादुयक्रर के अनुरूषयु एच माध्यमिक शिक्षा बोई़, राजस्थान को सोनियर हायर सेफण्डरोे (भफादसिफ) परोक्षा, 7789 (एक-वर्षोप पाद्यक्रम) (कक्षा ॥2 के लिए) हेतु स्वीकृत पाद्य॑-पुस्तक

बैसक डॉ पुखराज देन अध्यक्ष, स्नातकोत्तर राजनीतिशाम्द्र विभाग राजशीय बॉयड महाविद्यात्तप, पालो

॥&)।

2988

डे

साहित्य भवन : आगरा

प्रथम सस्करण 97 पघचम सस्करण * 976 दशम्‌ ससकरण ॥987 अदहयाँ सस्करण ॥985 पन्द्रहवाँ रास्करण ॥986 सोलइहवाँ सस्करण 4988

सूल्य * सत्तोस रुपया पचास पंसे

प्रकाशक साहित्य भयन दोॉस्पिटल रोड आगरा 282 003

सुटक कलात्मक सुशक कागरा

भूमिका

मेशक की पुस्तक 'राजनीति विज्ञान के सिद्धाम्त' पिछले 7 दर्षों से विप्निन्न 'विद्याक्नयों के राजनीति विशान के दिद्यायियों द्वारा पढ़ी जाती रही हैं। पुस्तक पहु पस्करण राज॑स्थांन एद अजमेर विश्वविद्यांसयों द्वारा निर्धारित नवीततम ....)४ को दृष्टि ये रखकर तैयार किया गया हैं। परिवर्तित पादुयक्रम को दृष्टि रखते हुए पुस्तक में एक नवीत अध्याय शक्ति, सत्ता और उनके प््मग्य' जोड़ा पा है, कुछ अध्याय लगभग पूर्णतश नये छिरे से लिंग हैं पलोर इस शबके गय पुस्तक को झनावश्यक् विषय सामप्री से मुक्त कर दिया गया है। इस बात की <री पेष्ट की गयी है कि नवीगतम पाठ्यक्रम के अनुत्तार भी पुछ्ताक विद्यायियों के 7ए एक श्रेष्ठतम पुम्तक की स्थिति में बनो रहे। राजनीति विज्ञान के अध्यमंत विषय का तीड़ गति से विफात्त हो रहा है थोर विषय में नवीन प्रवृत्तियाँ प्रवेश कर रही हैं, जिनका सामान्य परिचय राजनीति विशान के प्रारम्भिक विद्याधियों को भी प्राप्त होता चाहिए। इस बात को दृष्टि में दे हुए म्रभी अध्यायों में नवीद प्रवृत्तियों की यधात्यान ह्मप्टतां और ध्रावश्पफ विस्तार के साथ विवेचदा की गयी है 'भारत यें लोकतस्त्र' जैसे विययों को समीक्षा में [988 के मध्य तक को स्थिति को दृष्टि मे रखा गया है। शाप्तन के प्रकार, राज- ' त्ोतिक दल भ्ौर ददांव भमृह तथा अम्य अनेक विषयों की विवेचना में देश-विदेश की नवीनतम घदनाओ के उदाहरण देकर विषय को रोचक बढ़ाने का प्रयास किया गया है मैं इस अवसर पर बंसल दम्धुओं को धन्यवाद देना चाहूगा, जिनके यो से पुस्तक आज धपने प्लोसहदें सस्ब'रण मे प्रवेश कर रही हैं। आशा है अपने दतंभान स्वरूप में यह पुस्तक पाठकों की इस विषय सम्बन्धी ही आवश्यकताओं को पूत्ति कर सकेगी। पुस्तक को भौर अधिक उपयोगी दनाने के लिए प्राप्त सुझावों का सदैव ही स्वागत किया जायगा

--पुपतराण जैन

राजस्थान एवं अजमेर विश्वविद्यालय

राज्नोति विशञान

पाठपष्रम

मोट- पाठयत्रम और प्रश्न पत्र तीन खण्डो मे विभाजितें हांगां। प्रएन पत्र में बृल 9 प्रणव होगे प्रत्यक खण्ड से तीन प्रश्द परीक्षावियों वो एस पाँच प्रश्नों वा उत्तर दैना हागा जिममे प्रत्यय सण्ड मे एक प्रश्व अवश्य हा सम्मितित हो।

तष्ड क्ष

राजनीति विशञांत परिभाषा प्रकृति नौछक्षत राजनीति विश्वन आध्य

मत उपोगर्स- विगमनोतमव' यो आदशों ऐतिहासिक और अवह्ाखादो उपागम

राजनीति विज्ञान का अुय समाजशस्जों से सम्बध राज्य समाज राष्ट्र राज्य की प्रवति--आदशवादी ओर आपिक सिद्धा'त

खण्ड

ाय्य की पत्ति ममझोताबादा ओर एनिहासपिक' सिद्धात्त राज्य का करायक्षत्र-- अहृस्तक्षपवादी और कल्याणकारी सिद्धा ते।

सम्प्रभता एप्मवादी बोर बहुलवारी सिद्धा त। खन्‍्न्‍न्‍न्‍न्‍_मीन-4

घारणाएं कावन, स्वेतजता समानता याय शक्ति सत्ता और एनके मम्बध घम्र निखेक्षता

सण्ड से

राजनोतिक ध्यवत्या के प्रकार _तोकतस्त्र और अ्रधिवायकतज, सयदीय खिल जा 7 और अध्यक्षात्मक व्यवस्था एकात्मक और मघात्मक व्यवस्था

चथ सगठत-- शक्ति पृथक्करण प्लिद्धा व्यवस्यापिका-कायपालिक ओर न्योयवालिका--ढाॉचां काय और आपत्ती सम्बंध, दलीय व्यवस्था और दबाव

समूह लोकमत घोर स्थानीय स्वशासन प्रतिनिधिस्त के सिद्धान्त

विषय-सूचो

प्रष्याय [पड सहया छुज्नीति विज्ञान की परिभाषा, क्षेत्र तथा स्वरूप. ]-29 [एश्लीपाणा, 5०096 भाप [रकणर ?०ाध्ठ $घ0ा०ट) 2 टीजलीति विज्ञान का श्रन्य समाज विज्ञानों से सम्बन्ध 30-44 (रिलुज्लाण्ण ण॑ ऐगाएव्वो लाल जा 005 500) 580७) १3.“राजनीति विज्ञान के बध्ययन के उपायम 45-57 (#0702७॥९५ (७ 96 80007 ?णप्रलां इलहा९ट) ढ़ घ्यवहारदादी उपायम या ध्यवहांरवाद 58-66 (पलाइराणव० हैएए7020॥ छ8७॥३४०प्रशाप्रा) ५5 राज्य, समाज भौर राष्ट्र 67-82

(0९, $ए0०९ए शाप प३॥0॥) 6 की प्रकृति सावधव सिद्धान्त और आदर्शवादी दिद्धानन. 83-95 (806 (६ 886 , 028॥0 शाप 4008॥॥श९ [॥6009) >/..रन्यि की उत्पत्ति समझौतावादी मोर ऐतिहासिक स्िद्धान.. 96-26 (छा धिका०. एणराहणाओ शर्द प्रा॥णादा] 70९06) , <र्ण्य का कार्यक्षेत्र अहस्तैक्षप मिद्धास्त और कल्याणकारों सिद्धास्त

27-50 (89608 ए8॥36 60ाए() | 562 सिश्ञार 20 ४९76 ्राह्ण्शलछ)

9इकरभुता एकत्ववादी और बहुतवादी सिद्धान्त 5-]76 ($0एशशट्टा(ए ०5५ 306 ए|ए/ंआा॥५ पणांध) टी

50 अवधारणाएँ खा बोर न्याय व77-99 है ०: जला (एण०्थ्फाई 489 शाएं 40४०९)

2) क्त सत्ता और उनके सम्दस्ध 300-26 ए0फथ्, हैएगणाए भाप शक्षा रिश॥00058 9)

: स्वृतस्तरदा और समानता 247-235 (एथ७ बय्त हदु॥9)

3, धर्म निरपेक्षता 236-25]

(56८पक्षाइव)

अध्याप

22068] १4

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6

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25

पृष्ठ-संह्या तौतिक व्यवस्था के प्रकार लोकतन्त्र और अधितायकतन्तर252-283

(फग्परणाड जी एगा।ओल्ज $१ञञला। ऐल्शाठ्सबटए बचत ॥ालडाण- $॥9)

सप्तदात्मक अध्यक्षात्मक शासन 284-302 (एज(बशाला।श9 04 [7९468 04] 79९ 59एल्‍070शा0

एकात्मक वे सघात्मक शासन 303-324 (एावाव्वाज़ 800 76८४७ 00४श॥7०70

सरकार का संगठन शक्तियों के पृथवकरण का सिदान्त, 325-336

(0:8क37588007 (9०एचगा९00. 7८079 ्॑ $८एबाबरा०ए ता ९० '#टा5)

व्यवत्पापिता 337-360 ([.८एछा4०:८)

बायंपालिया 36-372 (छाव्याएरले

न्यायपातिवा 373-383 (॥00ट279)

दलोय व्पवस्थां 384-406 (गग9 595 0॥)

दडाव समूह 407-422 (9?7685७४७८ (0७:५9)

सोजमत 423-435

(000॥९ 0970307)

स्थानीय स्वगामन 436-444 (००० $८०!! 60४८ नागा था

प्रतिनिधित्व शे सिद्धान्त

(60:८5 ०६ छ८क१९६९११७१४०७)

|. राजनीति विज्ञान की परिभाषा, क्षेत्र तथा स्वरूप

[08000॥॥0%, 50375 8४४० धाएपह 07 ?0घााएओआ, 80४६४०६४

"पम्नाज द्वारा सुप्स्कृत मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्वम होता है। परन्तु जब यह बिना कानून तथा न्याय के स्तीवन ध्यतोत करता है, तो बहू निह्ृष्टतम हो जाता है। यदि कोई मनुष्य ऐसा है जो समाज में रह सकता हो अथवा जिसे ध्माज को आवश्यकता हो मे हो, वर्योकि बहू अपने आप में पूर्ण है, तो उसे मानव समाज का संदेत्य मत समझों, बहु भगली जानवर या देवता ही हो सकता है।”! जाभस्स्तू राजनीति विज्ञान को परिभाषा धरस्तू अपने उपर्युक्त कयन में एक सामान्य सत्य का हो प्रतिपादन करता है। समाज में २हने वाले व्यक्तित के जीवन के विभिन्न पक्ष होते हैं और मानव जीवन “के इव-विप्िन्न पक्षों का अध्ययन विभिन्‍न समाज विज्ञानों द्वारा किया भाता है। समाजशास्त मानव के सामाजिक जीवन, अ्शास्त्र मानव के आदविक जौवन और नीतिशास्त्र मानव जीवन के नैतिक पक्ष का अध्ययत करता है। इन शाह्त्रों के समान ही राजबीति विज्ञात द्वारा मानव जीवन के रॉजनीतिक पक्ष का अध्ययतत किया णाता है। राजनीति विज्ञान विषय के विद्वानों द्वारा इस विषय की विभिन्न परिभाषाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, शिन्‍्हें प्रमुख रुप से ,विम्नलिखित त्षीन वर्गों मे रखा जा ग्क्ता है ; राजनीति विज्ञान केवल 'राज्य के अध्ययन' के रूप मे, राजनीति विज्ञानक़ेवल प्रकार के अध्ययन” के रूप मे, तथा राजनीति विज्ञात राज्य और सरकार दोती के अध्यग्न' के रूप मे

339 ननन«नन»«क कन>»ग »क-“अ 5० पहशा जता एचब्शित्त 33 045६ 8छकब$, 000 ध्रधक $ह0घ70५. प05 मत १३०९, [3 ऐह चऋठा थी, सह प्ी0 9. एएकीह [0ए८ जा ३0०85, 07 ७० ]88 70 7९6र्त 6९९805९ ॥6 ॥$ 30.६7 0 वंश, घए98 0६ धाणिवए & 7६280 07 900" >--#खिगाए

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2... राजनीति विज्ञान के सिद्धान्त

राजनीति विश्ञात्र 'राज्य का अध्ययर्ता

मानव के राजनीतिक जौवन का अध्ययन करने के लिए: उन संस्थाओं का क्ञान प्राप्त करना अविवाय हो जाता है, जिसके अन्तर्गत मावव ने: अपना राजनीतिक आदत आरम्भ हिया और जिनके माध्यम से वह अपने राजनीतिक जीवन को विकलित करने के लिए प्रयलशील है इस प्रकार राजनीतिक सस्थाओ मे राज्य सबसे अमुख है। 'रागनीति' का पर्यायदाची आग्त शब्द 'पॉलिटिक्' (7०7/2४) यूनानी भाषा के कृ०/ गन्द से ही बता है, झिसका अर्थ उस भाषा में नगर अथवा राज्य होता है। ग्रुवान छोटे-छो़े नगर राज्यों मे विभवत था और इस कारण बूनातवा्सियों के लिए नगर तैषां राज्य में कोई भेद मद्ीं था। घीरे-घीरे राज्य का स्वरूप बदना और आज इत राज्यों का स्थान राष्ट्रीय राज्यों ने से लिया है स्व्राभाविक .कूप से राज्य के इस विश॒मसित ओर विस्तृत रुप से सम्बन्धित विषयों को “राजनोति विज्ञान' बहा जाने लगा! इस हृष्टिकोण के आधार पर राजनीति विज्ञान विषय के कुछ विद्वानों ने इस विपय की परिभाषा केवल राज्य के अध्ययन के रूप मे की है

ब्लटशैलो के अनुसार, “राजनीति विज्ञान वह विज्ञान है जिधका सम्बन्ध राग्य से है और जो यह समझने वा प्रयत्न करता है कि राज्य के आधारभूत तत्व

कया हैं, उस्ता आवश्यक स्वष्टप क्या है, उसकी दिन विविध रूपों में अभिव्यवित होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ है ।"

आर लचप पपाप मा विद्वान डॉ गानर के अनुस्तार, /राजनीति विज्ञान विषय के अध्ययन प्रारम्भ और अस्त राज्य के साथ होता है। एप जाल पुस्कोष, एक्न, शा गुडतोव, एंक्टन, डॉ जराएिय! के द्वारा भी राजनीति विज्ञान को राज्य का ही अध्यपन बतलाया गया है

फल +-

राजनोति विज्ञान सरकार का अध्यपन'

बतमान समय में राजनीति विज्ञान हे कुछ विद्वान उपर्युयतः परिभाषाओं को हवीशार नहीं करते ये रास्प दे रपान पर सरवार के अध्ययत पर वल्ल देते हैं। उनता कथा है कि राज्य तो एक अपूर्त सस्या है और अ्रमुर शवित के प्रयोग येर सम्बन्प में इस सस्या का सूर्त रूप सरकार ही वह परत अथवा साधव है जिसके भाध्यम से राग्य की इच्छा हाय रुप में परिणित की जाती है इसलिए सीले और सीरींक आदि विद्वानों ने राजनीति विजान को सरकार का ही श्रध्ययन कहां है। सील के शम्दों मे, “राजनीति विज्ञात उसी प्रयार सरक्तार के हटवो वा अनुसन्धान रहा है दीप मम्पतिशास्त्र सम्पलि का, जोड शास्त्र जौवप का, बोजयणित अब या हथा स्यामितिशास्त्र शदान एएं सब्याई घोड़ाई का शरदा है ।” इसी प्ररगर सौक्षो्ठ का भी कद्दता है कि “राजनीति विजान सरकार हे शस्ता घत विद्या है।”*

8. +कजताएश 5९९०८६ ६९३४७ ॥94 ९०८ जा 5 96 इधिह्ट 3. +॥०पादा इच्चश७८७ हश्बाव कर (55 सणकर0१. मम

>> ९३००७ $, &/८कटत॥ शा #गापतत्यउत[ कब्र, छड

राजनीति विज्ञान को परिभाषा, क्षेत्र शया स्वरूप 3

राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार” का अध्ययन उपर्युक्त सभी डिद्वानों द्वारा दी गयी राजनीति विज्ञान की परिभाषाएँ वस्तुत* एकागी हैं और जहाँ तक राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध है, इसमे राज्य और सरकार इन दोनों ही अध्ययन किया जाता है राज्य के बिना सरकार को कल्पना ही नहीं की जा सकती, क्योकि सरकार राज्य के द्वाय प्रदत्त प्रभुत्व शक्ति का ही प्रयोग करतो है और सरकार के बिना राज्य एक अमूर्ते कल्पना माञ है। राज्य को क्रिया- रुमक अभिव्यक्ति के लिए सरकार का और सरकार के अस्तित्व की किसी कल्पना के लिए राज्य का अस्तित्व अनिवायं है ऐसी स्थिति मे राज्य के बिना सरकार और सरकार के विना राज्य का कोई अध्ययन पूर्ण नही हो सकता और राज्य एव सरकार दोनो ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन का विषय बने जाते हैं। फ्रासीसी विचारक पॉल जैेनेट ने इसी विचार को व्यक्त करते हुए कहा है झरि 5णण “राजनोति विज्ञान समाज विज्ञा्तों का अप है शिक्षमे राज्य के आधार ओर सरकार के धघिद्धान्तों पर विचार किया जाता है (" डिप्रोंक् ने भी राजनीति विज्ञान को इसी प्रकार परिभाषित करते हुए कहा है कि “राशनीतिशास्त्र का सम्बन्ध राज्य तया उप्तके साधन सरकार से है ।”? इस सम्बन्ध मे ग्रिलक्राइह्ट की परिभाषा कुछ अधिक स्पष्ट है जित्तमे उसने कहा है कि ' राजनोति विज्ञान राज्य और सरकार को सामान्य समस्याओं का अध्ययन करता है ।' * लॉस्को, गेटल और आधुनिक युग के अय सभी लेखकों ने भी इसी मत का समर्थन किया है। तत्द-लैकिन राजनीति विज्ञान की यह परिमाषा भी पूर्ण नहीं है, चयोकि इसमे बिपय के मानवीय पक्ष की अवद्ेलना की गयो है। यह बात निविवाद, ख्ध पत्र है कि किसी भी समाज विज्ञान मौर इसलिए राजनीति विज्ञान का _ अध्ययन उम्रके प्रखण मे मानवीय तत्व के अध्ययन के बिता. 'र्ण नही हो सकता राजनीति विद्वान में तो राज्य और सरकार के सम्पूर्ण अध्ययन में मानवीय पक्ष सवसे अधिक महत्वपूर्ण है और राज्य तया सरकार को व्यापक अध्ययन वेवल इसलिए किया जाता है कि ये सस्थाएं मानव जीवन को बहुते अधिक प्रभावित-करतो हैं| यदि केबल राज्य और सरकार पुर हो दृष्टि रखी जाय, तो राजनीतिक विश्लेपेण स्थिर, नितान्त औपचारिक और. .सस्यागत-होकर_ रह _ जायंगा। इसे सेम्बन्ध मे >सेन्ाइबतोबीडया भोफ सोशल साइसेज (प7०/ण ०७३६७) ००० ध्चक्रल्ह्ः में हरमन हैलर ने तो यहाँ तक कहा है कि “राजनीति विज्ञान के सम्पूर्ण स्वरूप का निर्धारण उत्तको मानर विषयक मौलिक सास्यताओं इारा हो होता है ।7

॥6॥ ८० 5छशा-€ 3६ शी" छव॥ 80.33 $टाहाएट$ जोक एव ता पी6 84

शव एड एञा प्रथण९5 छा इ१एथायोणदपा. न्जगग्म सकल 2. +कुमातढ्यों 5.क्‍006 $ ६०चव्ध्ताध्व जाए ऐड ड36 बच0. उ्शाणकट्शना >-+0990₹दाएशह्ग +-+0#०<*

3." एगएहाल्त्रां $छाला एंटवा5 जाती फल इच्छशवो एछःणणेटएड 0 प१८० ४३४ 800 00४उस- णलद्या। --प्प्कज

4 राजनोठि विज्ञान के पिद्धाग्त

बस्तुत राज्य ओर सरकार का अध्ययन निरपेक्ष रूप से नहीं वटन्‌ मानवीय सन्दर्भ से ही दिया जा सकता है॥ अत राजनीति विज्ञान_कौ न्यायसयृत परिभाषा करते हुए कहा जां सकता है कि *

“'राजनोति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अग है जिसके अन्‍्तारत सावदीय कोइन के राशनीतिक पद का कर झोदन डेः इस पद से सस्दन्धित राइप, सार हपा अन्य सम्बन्धित धगठनों का अध्ययन किया जाता है ।”

राजनीति विज्ञान की परिभाषा के सम्बन्ध में आ्राधुनिक वृध्टिकोण (0६पाक्ना0ल्‍4 08 70.7९. इटा8/7ट:-..& #४०0६४7४ ##श२0#»%९८॥) परम्परागत रूपए में राजनीति विज्ञान के अध्ययन को व्यक्तियों के राजनीतिक

जियाकलापों तक ही सीमित समझा जाता था मौर मह अध्ययन सस्थात्मक था मर्थात्‌ इसमें राज्य, सरकार और मन्य रॉजनीतिक प्तत्थाओ के अध्यवन को ही अधिक भहृरव- पूर्ण प्मप्ा जाता था। लेकिन द्वितीय महायुद्ध के बाद शान के क्षेत्र मे जिन सवीत प्रवुत्तियों का विव्रास हुआ, उनके परिणामस्वरूप राजनीति विज्ञान के अध्ययन गौ समस्त स्थिति के सम्बन्ध मे असत्तोष का उदय हुआ + इस असन्तोप ने क्षोम को छणन्‍्म दिया और छ्षोभ के परिणामह्वरूप स्थिति में परिवतेत आया ॥+

| छिवीय महापुद्ध के बाद के वर्षों में राजनीतिक विज्ञान की परिभाषा ने सम्बन्ध मे जिए नवीत हप्टिकोण गा रुदप हुआ, यह निश्चित रूप से अधिक स्यापक और यथापंवादी है इन वर्षों में राजनीति विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र मे जो 'स्यवद्वारथादी आन्ति' हुई, उसमे इस ग्रात प्रर बल दिया गया कि वर्तमान समय में समस्‍्त मातद जीवन मे एक इकाई का रूप घारण कर लिया है और मानव जीवन के विविध पर्षो (राजनीठिक, साथाजिक और आाधिक) को एव दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता इसलिए शजनीति दिज्ञात को ऐसा विषय नहीं समझा जाना घाहिए नो मजुप्य 47 बेवल राजनीतिक क्ियागसापों का बध्ययन बरता है। ऐसी स्थिति में यह शहुता उचित द्वोगा कि राजनीति विज्ञान मूलत मतुध्य के राजनीतिक जीवन तषां जिया कसापों गा तपा इसे सदमे में मातव जीवन के सामाजिक, आपिक, धामित दया अन्य पर्शों का अध्ययत शरता है

श्राधुनिर दृष्टिकोण मे अन्तगंत राजनीति विधान को एश ठेसा स्पापक रूप प्रदान बरने की चेप्टा की गयी है जिसये राग्य जो हो यहीं दरत्‌ उ्मान को भी

सम्मिलित विया जा सके यद सम्ाजपरक' हष्टिकोश है. जिसकी मस्यता यद्द है रि स्यक्ति ने राजनीविद जीदत बो धामाजिक जीदन के खग्द्ों मे ही उदित रुप मे समय दा सदता है सौर राजतीविक अध्ययन में 'अस्तर अनुशासतास्मक दृष्टिकोण दृशिल-6कटफादञ३ #9705०0] को. अपनाया जाना चाहिए। बेटलित तो इस

#च्छत 7४ कसी कृाफादो: * वर ॥0994:5 फिट 8:03930ए7२2 #7कर्कश58 06 774५० ॥9०69) 5<<६८४, ६0 है ४3१9 र#द3) (०७) द्यउमाक हैक मेक 5 (०५) 80ा०कग उमर

राजमोति विज्ञान की परिभाषा, क्षेत्र हपा स्वस्प 5

विचार का इतेसा प्रवल समर्यक है कि कुछ स्थानों पर तो वह राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र भें कोई भी भेद स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।' राजनीतिक विज्ञान वी परिभाषा वे सम्बन्ध मे एक और दृष्टि से भी महत्व- गे अन्तर जाया है। इस विषय को परम्परागत परिभाषाएं सस्थागत हैं ओर इतमे राजनीति विज्ञान के अध्ययन को राज्य, सरवार तथा अन्य राजनोतिक सस्याओ के साथ जोड़ा गया है लेकिन राजनीति विज्ञान के आधुनिक लेखक इस सस्पात्मक हृष्टियोण को अनुचित और अपर्योप्त समझते है , परम्परागत अध्ययन की इस सेस्पाप्मकता के करण हो आपंर वेण्टले ने इसे 'बजर और औपचारिकतापूर्णे, प्राण- दल, उकिएा और स्थिर बठलाया है ।? आधुनिक लेयको दा विच्वार है कि राज- भीतिक मस्थाओं वे_घोषित उद्ृश्द “हे कुछ भी वयो हो, उनके पीछे हृश्य भौर कल्प न्यामाााकआा पुन दे गन कक पाधा का +ाब ७८ एफ अहाय राजनीतिक प्रक्रिया कार्य करती है और यपायंवादी शजनीतिक अध्यपन की हृष्टि से यह प्रत्रियां हो अधिक महत्वपूर्ण हैं। अत आधुनिक लेखक राजनीतिक सस्‍्वाओं की अपेक्षा उन साधतों और प्रत्रियाओ को अधिक महत्व देते हैं शिनके' आधारपर राजनीतिक सस्थाएंँ कार्य करती हैं इसी आधार पर आधुनिक लेखकों जो हृज्नो केटसिन, भेदस बेवर, एच शो लासदेत, डेविड ईस्टने और हरभन हैलर आदि) थे द्वारा राजनीति विशान को 'शक्ति', प्रभाव, 'सत्ता' 'नियस्त्रण, “निर्णय', और 'पृल्मों का अध्ययन बतलाया गया है। इन विद्वानों के अनुसार 'राज- मीति विज्ञान अन्य समाज विज्ञानो से इसी रूप मे भिन्न है कि यह समाज के अन्तर्गत अोक्ति या निपरत्रण के तत्व का अध्ययन करता है।१ ४टलिन राजनीति विज्ञान को 'ज्क्ति का विज्ञान' (5०८००४ ७०७५) मानते हैं तथा लासवेल और केपलान > 0९ हवित करते हैं कि "एक आनुभाविक णोज के रूप मे राजनोति विज्ञान शक्ति के निर्धारण ओर सह 'शविता का अध्ययत करता बन हट मे रह” राब्सन ने राजनीति विशान को समाज में शक्ति का अध्यप्' कहा है ओर डेविड ईस्टने ने इसे 'मुल्यों का सत्तात्मह भावटन५ कहा है | इसी प्रकार डॉ हम्तजार ओरे स्टीवेस्सन लिखते हैं कि “राजनीति पल का वह क्षेत्र है जा प्रमुखतया शक्ति सम्बन्धी का अध्ययन करता है। ध्नशक्ति सभ्वन्धों के कुछ पु €प हैं. व्यक्तियों मे परस्पर, व्यक्ति और राज्य के अध्य शक्ति सम्बन्ध और राज्यों में परस्पर शक्ति सम्बन्ध ॥' 8 +--त...ु (च्णह४ 8 6 टावर 'फगोपर्ग उकव्गर मवा 52९ सैाण हष्णलरछ यह #१0%९७५ ठठरबलक्व, 9 462, ५९०३. #7उैसब 2ण॥#व्गाँ पक्रेल्‍्गऊ, 9. 4 ९७) 5०६०९८ ३5 शए दृतआटडो ॥0क्‍वए४५ ॥$. 08 ४009 छा धो औशएाएड ब०पै शिधाताह 7०७७ '"-३४४०१ 0. [.880७॥ ३०१ स्‍णिबएक ॥(३ 980. #0%₹ कददं ४३8४६ _ै घिवम&#ूण: लि सेगावाब्ग ववम्फ 9 3 >शा५६ सार 4८१७ जाती 6 8पफ्रणाबधज्ट ब0९8७00 0 ध्यॉज्ट३ *ए० -.श्लणफटा: डव इक. कैभीहीट्व उदलकरर 4 जिा77बंबटाण कफ. 6, कह ९3 5:८८ ॥5 ऐ॥6 गलिव 9 $४०व५ ९७१८०दएणचप फाक्रावााज ध्यकत एड ण्ण्ण्टर ॥0९१।७३ ढण०१३ पाए एटाजल्‍्टए घाटव ३७१ (06 आइए 0 ञ0०७8 हशितड " +-ए07 घष्डर४/ बछणप 50 ९057. #गापव्वां 5:/2॥2०, 5, 4,

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6. राजनीति विज्ञान के प्रिदान्त

उपर्दुक्त दिद्वातों, प्रमुदतया कैटलिन, लास्वेल और केपलान के द्वारा 'शर्ति शढ्द को बहुत व्यापक अर्ष में ग्रहण किया गया है। उनके अनुसार शर्क्तिका ढ््षे 'परिक शक्ति' नहीं है। कैटलिन ने तो यहाँ तक कहा है कि शक्ति का अर प्रभूत भो नहीं है, जैसा भानते वी गलती पार्गेन्यों ने को है। सहयोग भी शक्ति मणि करने गा एक रूप हो सकता है जो शायद प्रभुश्व से अधिक स्थायों हों, मथपि उप्र प्रयोग अधिक सूक्ष्म और कठित होता है। इन विचारकों द्वारा शक्ति को जो इठगा अधिक व्यापक रूए प्रदात गिया गया है, उसस्ते 'शक्ति की धारणा उन दुर्भावचाों है मुक्त दो गयी है जो परभ्परागत रूप मे शक्ति के साथ जुडी है। केटलित के बानुशार, “राजनीति विज्ञान में शक्ति और नियन्त्रण का वही छत हैच्कजों अंग मे माँग, पुतति और प्रतिस्पर्दों मूल्य का होता है "४ (र्चात ये समस्त राजनीतिक | जोवन और अध्ययत के निर्धारक तत्व हैं। «४

टाजनी नि विज्ञाम की परिभाषा & सम्कध में अपनाया गया यह आधुनिक #प्टिकोण भी शी हैँ ही है. (>ह 0 इपवन्घ पे हमे यह स्मरण रखना होगा हि शक्ति बाजनोति विश के” विविश्न दरिया (१3023) में से केवल एक है; एश्मातर महीं। भढ राजनीति विज्ञान के बुछ विद्वानों, विशेषत॒या बी शी (४ 0 /:53) में शोतेष्ड, पिनांश, सॉविश जो स्पिव आएि के द्वारा इुत विषय नी परिभाषा के भम्दर्ध में परम्परागत और आधुनिक दृष्टिकोण में स्रमख्व स्पोषित बरने ही चैष्टा की गयी है। [विनोंक मोर स्पिय पूर्णतया सन्ुतित हष्टिकौप अपनाति हुए लिखते हैं कि ' इस प्ररार राजनौति विजन कही भर ध्रमाव से उत सप्ी शक्तिपो, सत्पाओं तथा सगढ़नात्मश ढाँचों से सम्बन्धित होता है गिरें उत्त परमार में छुप्यचएवा हो शप्ापता ओर सयारण, अपने सदस्यों के शत्प सापरहिर हि तथा

उनके सतभेदों दा समाप्ाने करने के ई: >>झर्न्तमी' ८) ४६ रण हल्5-- «अन्त भे।

अम्तिप्त माना जाता है (४२ रा वस्ट 200८

राजनोति विज्ञान का क्षेत्र

६८०१६ 06 707रगए#, 5एादघटछ हे कक एक ठिषय के छोत्र से हमारा आशय इस बात से होता है नि उस दिवय

विन दिन बातों दा अध्ययत किया जाता है अर्यात्‌ उत्तरी विषय वस्तु

है राजनीति विज्ञान फी परिभाषा की धाँति ही हम विपय के क्षेत्र के सम्दः

दुष्ट प्रयुध मतों वा इल्लेय हम भार विया जा सता है

2430), 3 ,,3+ --_ ००२०

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५. पच्णाध्ए 0. एम्राकक करदातव पाछन> आकष 72777 22280 चाट (8 बा! १७७६ ४३४३ ६० 60 ७. (47६६३, ॥०५।७॥०0७६ १०९ वि्दिक जब दब अदालत पो$६ डा €-णड्रॉ:टर्ट 88 कै 28 ॥॥6 पल गषपीजाए साडपड 90 ऐपा +ण्णशाज शि शीद सागएी पिलनिनपकभापक जे वववल 08 लात्तापत०० थे ०ती९६ १०णुणण फेक $#8 ए० इ०९एचला॥ | सडए धतीवा0 ८88 '” >-मेह8०८६ 4०4 ६७१७, # ०४:०० इत॑लरर, सैंब वह 8व॥त09५

राजनीति -विज्ञान को परारभाषा, सेब तथा स्वकूप 7

प्रसिद लेखक ग्रारनंर ने राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित * किया है; 7 ([) राज्य को प्रद्भति तथा उत्पत्ति त्री खोज, (2) राजनोततिक सस्याओ के स्वरूप, उनके इतिहास ठपा विभिन्‍न रूपों की गवेषणा, एव (3) उक्त खोज ठया गवेषणा के आधार पर राजनोतिक विकास के नियमों का सथासम्भव अनुमान प्री. गेटल के मतानुसार भी राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत मुख्यद तीन बातें »सः मप्‌नित है; हि ]) शाज्य की उत्पत्ति और राजनोतिक सस्पाओं पिद्धान्तों का विकास, // 9) विद्यमान राजनीतिक सस्याओं और सिद्धान्तों का अध्ययन, एवं (3), राज्य का भावी आर्यात्‌ आदर्श स्व॒त्प निश्चित करना ओ- बित्ोवी के अनुसार, “राजनोति विज्ञान शिन-जिन महान्‌ विदयों की स्याध्या करता है वे है राज्य, सरकार ओर कानून इस प्रसग में उल्लेखनीय है कि सन्‌ 948 मे संपुक्त राष्ट्रसंधीय शेझणिक, वैज्ञानिक और सास्कृतिक संगटन (07२६६८०) के तत्वावधान में समस्त विश्व के राजनीति विज्ञान के पण्डितो का एक सम्मेलन हुआ था जिसमे यह निर्भप लिया गया कि राजवीठि विज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गठ निम्नलिखित दिप्रय-सम्पलित-समझे काले चाहिए _. >+-7०+5 (0) अजनीति के तिद्धा्त--राजनीतिक घिद्धान्द तथा राजनीतिक विचारों “के इतिहास | (2) राजनीतिक संस्षाएँ- संविधान, राष्ट्रीय सरकार, प्रादेशिक तया स्थानीय शासन भर तुलनात्मक राजनीतिक सस्याएँ (3) दाहनोतिक दल, सपूह एवं लोकमत--राजनीतिक दल, समूह तपा समुदाय, सागर्टिकों का सरकार प्रशासन में झागे लेना और लोकमत 4) अन्तरराष्ट्रीय सम्वन्ध-अन्तरराष्ट्रीय राजनीति, अन्तरराष्ट्रीय विधि, इलल्पटीय गत और प्रणा हि क्षेत्र के सम्बन्ध में यूनेस्‍्को सम्मेलन द्वारा अपनाया गया उपयुक्त दृष्टिकोश निश्वित रूप से अधिक महत्वपूर्ण है 7. विभिन्‍न विद्वानों रुपा यूनेस्कों सम्मेलन द्वारा राजनोति विज्ञान सम्प्रस्ध में जो विचार व्यक्त क्ये गये हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है वि राजलीनि ..*

सियत के सिम सकांब कसा (7 अव्ड का राजनीतिक जीवन) (2) शज्य, (5) सरकार, (4).स्पानीय,

-पप्ट्रीप और अन्तरराष्ट्रीय समसस्‍्याएँ, (5) राजनीतिक विचारों का इतिहास और

है. राजनौति विज्ञान के सिद्धासत

राजनीतिक विवारधाराएँ, तथा (6) अस्तरराष्ट्रीय विधि एवं सम्बन्धी और संगठव- डा अध्ययन *

“7-८ ज्ञतद का अध्ययन - राजनीति विज्ञान के अच्तगंत सम्पूर्ण मानव जीवन का अध्ययन नहीं किया जाता, वरन्‌ राज्य सस्या के सन्दर्भ में ही मानव का अध्ययन डिया जाता है। तायरिकों से ही राज्य का निर्माण होता... है ओर नागरिकों के लिए ही राज्य जीवित रहता है। राज्य के मागरिक समाज ढादा.स्वीकृत और राज्य द्वारा लागू गिये जाने वाले अधिकारों का ही उपभोग-करते हैं.तथा_राज्य-के नागरिक होने- के नाते व्यक्ति के राज्य के प्रति कुछ उत्तरदायित्व भी होते हैं वस्तुत व्यक्ति गौर इाग्य के सम्दग्ध की समस्या अत्यन्त जटिल रही है और राज्य के आरम्भिक चरण सै लेकर अब तक इस समस्या पर विचार किया जाता रहा है। अत राजनीदि विज्ञान के अन्तगंत व्यक्ति के अधिकार, राज्य के प्रति सके कर्तव्य और व्यक्ति एवं राज्य के पारस्परिक सस्तस्थो का सचालन करने वाले शाश्ारभरत धिड्ान्तो और तथ्यों का अध्ययन किया जाता है ।“केटलिन के शब्दों में। राजनोंति श्म्वान नियन्प्रक एव जियान्त्रित के व्यापक सम्दस्धों का अध्ययन है ।'

2 राम्य का अध्ययत-य्यक्ति के व्यक्तित्द के सर्वोत्तम विकास और समाज के सामाग्य उद्देग्यों की पूर्ति हेतु राज्य सर्वोच्च हवाई है। अरस्तू ने राज्य के साबन्य में ठीक ही वहा है कि 'राज्य को उत्यतति जोवत के लिए हुई और सदजीवत के. िए उसका अह्तिरद बता हुआ है” मानव जीवन भी आवश्यकताओं के अनुरूप

ही धिन्न-पिन्न समयो पर राज्य के >लतन रपसटैश जशौर राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य के इन सभी रूपो का अध्ययन किया षाता है। भक्त के शब्दों में गहा जा सरर्ता है कि. हज- "राजनीति विशात, 'राज्य कंता रहा है' को ऐतिहाप्िक ोज, राज्य कैता है' रा विश्तेषशारमक्ष अप्ययन और “राज्य कसा होना दाहिए' की राजनीतिक थ॑ सेतिए परिहस्पता है ।*

# रागप के अतोत का अप्यपत--राग्य के वर्तमान स्वष्प का शान उसके भूतक्स ने अध्यपत के आधार पर ही दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत हम राग्य को उत्पत्ति गा अध्ययन ररते हैं और यह देखते हैं कि राज्य का विकात्त कंसे हुआ हपा राजनीतिक सत्वाओं और विवारधारा्ओं ने कया बया स्वरूप धारण किये राज्य दो अपना वर्तेसात रूप प्राप्त करने मे सदियों लगी हैं प्रारम्भ मे _ राज्य परिदारो

+5086 (४9६ 4000 ऐशतड (66 6 इम४६ (6 806 4 000000९8 [00 9 इज4 0

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3. * एणाएप्ज $द००० शी 8 एगणांव्य ्च्च्माइआ०ा च४( ४6 2030० 3 0०८०, भा ६०४)१४८४) श७०१ 6! ४हेश फ़ैड श३6 200 8. ए0॥00०-९एंपग. ६ए0308 0[%8३॥ ॥॥$ ६६३6 ६४००३ फट *

+-0तताता, कक्कस्‍ग्ब॑बदान् 77 >गंपाल्ग डत॑तरर, 9.4

राजनीति विज्ञान को परिघाषा, क्षेत्र तथा स्वरूप... 9

हे समुह मात्र था, जो आगे चलकर कुलों ओर जनपदों मे विकसित हुए। यूनानी इतिहास में इन्ही को नपर-राज्य कहा गया है। धोरे-घीरे ये नगर राज्य परस्पर मिलकर सधो में सगठित होने लगे। यूनान के 'एपिनियत लोग” ओर 'एकियन लोग' इस प्रकार के सध राज्या के ही उदाहरण हैं। ध्रादीन भारत में इसी प्रकार के नगर रा्यो ते परझपर-सगठित होकए-वशिजि स्ध और 'अन्धकवध्णि सघ' का निर्षाण किया | इसके पश्चात्‌ विजय ओर पद्मजय के चक्र ने हमे वर्तमान राष्ट्रीय राज्यों के युग में लाकर खड़ा कर दिया और वर्तेमान समय में हम “विश्व सघ' कौ अ्पना- करने लगे हैं ग् राज्य के इन बदलते हुए रूपो के झा ही झाप्र मतुष्य के राज्य विपयक्ष [विचारो में भो परिवतेन हों रहा है। प्राचीन काल में राज्य और उसकी आज्ञाओं को 'लैवी समझा जाता था, लेकिन वर्तमान राजनीतिक दिचारो_के अनुसार राज्य की | टीवयक आकि या-कियो परमेपी के निहित न. होकर सर्वसाधारण निहित द्वोती है. राजनीति विज्ञान इस बात की भी वियरेचता करता है कि श्ह्प से हिक विवारों का विकास कैसे हुआ और इस विकात ने राज्य के स्वरूप को लोक-प्रकार प्रभावित किया शोक राम्य कै धर्तमात का. अध्ययन--ऐतिहासिक विकास के परिणामस्वरूप मान समय में राज्य एक विशेष स्वरूप को प्राप्त कर चुका है जिसे 'राष्ट्रोप राज्य कहा जाता है। आज की स्थिति में यह्‌ राष्ट्रीय राज्य भनुष्यो वा सर्वोपरि वे सर्वोत्कृष्ट समुदाय है और अन्य कोई भी समुद्याय राज्य से प्रतिस्पर्दा नहीं कर सकता राजनीति विज्ञान वर्तेमान समय मे राज्य के स्वरूप, प्रयोजन, उद्देश्य ओर शा कक अप है सत्ता. कार्यक्षेत्र के दो रूप हैं--आन्दरिक और नहीं कर सकता हैं। बा और [_और_सुब्यवस्था की सं५४ रंए४ पता, देशवासियों की चत॒र्मुबी तीय_ स्वशासन_ का. कार्य सचालन; , यज्य के आन्तरिक्‌

विज्ञातों के सन्दर्भ उदाहरणाय, कार्ल हर राय के बाह्य कार्यक्षेत्र के अन्वर्गंत 2 सम्बन्ध,

है और मेश्डगले, हू तथा विश्वशाल्ति से सम्बन्धित समश्याओं का अध्ययन किया. मनोविज्ञान की ओ९ राशनौति विज्ञान, ऊंघ का अध्यपंन--राज्य का अस्तित्व मानव जीवन को श्रेष्ठ रखता था, आम अपने ययोकि मानव जीवन की श्रेष्ठठा की कोई सीमा नहीं है, भौगोलिक आधारों को ४स्वरूप को अन्तिम तही कहा जा सकता है ( वर्तमान समय 3800 % द्वारा राज्य के स्वषप, उद्देश्य और कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में आज ९४०४५ किया जःर रह्म है उशहरणार्य, समरयवादरी विचार- भीतिक जीवन की रैज़्य द्वारा आधिक जीवन को भी नियन्त्रित किया जाना चाहिए इस क्षम मे राजनीतिकेशावादी विचारधारा के अनुभार राज्यहीन समाज की स्थापना, ये तो दे सस्याएँ है. (व्यत्तिवादी राज्य के कार्यों को सीमित करने के यक्ष में हैं दो 8: मानव निर्मित अन्य समुदायों के समान ही समझते हैं। इन सबसे

(

]0.. राइनोति विशान के सिद्धान्त

अलग अत्तरराष्ट्रीयता के प्रतिपादक युद्धों के मूल कारण इन राष्ट्रीय राज्यों का बन्द कर एक विश्व सघ को स्थापना के लिए प्रथलघोत हैं। ध्ामास्य धारणा गही है हि सदिष्य में राज्य का रुए सोइतस्शात्मर, सोरशल्याणकारों मोर विजायुत से शरगा बर आधार्ति होना चाहिए ।__ दर बाधार्ति होना चाहिए ऊपपुक्त विशेषता के आधार पर रहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान में शहुम राज्य का सवेशालीन अध्ययन करते हैं सरकार छा अध्ययत--राज्य बपनी सम्प्रभुता का प्रयोग सरकार के माध्यम से ही रूरता है और इसलिए सरकार के बिता राज्य के किसी अध्ययन को पूर्णे.सी फटा जा सकता है एंक समय पा जबकि सरकार ही राज्ए होता था और सुई चोदहवें जैसे शासक 'मैं हो राज्य हैं' ([ 00० ॥0० 5.06) जंझी यवंपूर्णं बात बह थे राजतन्वात्मक शासन में राश के हाथ में हो शक्ति रा समस्त केस्रीकूरण 3 | के कारण इस प्रजार को बात कही जाती यी। किन्तु कुछ समय बाद इः एत्तात्मक शाप्वन के स्पान पर कुलीनतस्वात्पक शासन स्यवस्था स्थापित वर्तमान समय में इसके स्थान पर जनता के प्रतिनिधि शाधतत की स्थापना | है। इत परिवर्ततनों के साद ही साथ सरकार के ब्यवस्थादिशा, दायंपरातिका' स्यायपालिका तीन स्प्ष्द अग हो पये हैं और वह इन अलग-अलग अर्यो मे शांसन व्यवस्पा दा कारें करतो है। दर्तमान समय मे इस बात पर विद्यार हिं जा रहा है ि शासन को जनता के भ्रतिं भोर अधिक उत्तरदायी झसे बनाया जा सदा है। अत राजनीति विज्ञान मे हम सरबार के अग, उसके प्रकार, उहरक सपठन ब्रादि का भी अध्ययन करते हैं। अहार हुए बह हे है कं 02 है। इसके अन्तगंत मानढ्र >> उन सम्पूर्ण कार्यों वा नका सम्दन्ध राज्य जा संगठन क्के अठोत, दर्लभात एक 'एसमे सरदार अध्ययन भी दिया जाता है। ६दालीप, राष्ट्रीय भोर अन्तरच्टोय समस्दापों शत पिद्वाते स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्चरराष्ट्रीय लेद वो राजनोति समस्याओं व) भी अध्ययन इरता है। आज रे प्रजागारि था दिध्िप्ट यहुतद है। दांव, कप + नेपर और शहर ही सेजों शे।

निराकरण बह! के भोगों मे हि हो बाउंइशतो का अम्ल पा 24782

इण्यम्त पेड आप, , राज्य कसा राजनोतिक

_राग्य पर्छारों

ि ओर उसमें नागरिकों के गगरिकों का भ्रहटय ॥, का बे अगर हैं अत रदानीय सस्पाओं को. ढापप्र टीम पे अध्दएन हमारे किधय को फमुद विदेष्य बस्तु कै हापुनिक राग्र मूलतः राष्ट्रीय इकाई है और ब्त्थ धैक-

६फ्प्शाएों डा ऋष्यरन

जे रा्रीय पृष्ठपृमि में हो डिया जा सकता टाल 7 4

राहनीति दिशान को परिभाषा, क्षेत्र तथा स्वरूप है

समस्याएँ भी हमारे अध्ययन का प्रमुख अग हैं। राष्दीयष एकता के लक्ष्य की ब्याव" ' हारिक रूप मे भ्राप्ति वर्तेधान समय की एक प्रमुख राष्ट्रीय समस्या है और इस ! सम्बन्ध में राजनीति विज्ञान का निर्देश है कि स्थानीय दृष्टिकोण की अपेक्षा राष्ट्रीय | दष्टिकोण को प्रमुखता दी जानी चाहिए | साम्प्रदायिक विद्ेष, भाषादाद और

टी पवानाद, की समस्याओं का भी राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किया बह

वैज्ञानिक प्रयदि के कारण आज सम्पूर्ण विश्व एक इकाई बन गया है और ' अन्तरसाप्ट्रीय समस्याओं का राष्ट्रीय स्थिति पर प्रभाव पढ़ता है आन के राजनीति- ' शास्त्रियो द्वारा इस बात पर निरन्तर विचार किया जा रहा है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर ' पर भ्रातकवाद से उत्पन्न सकट और इसी प्रकार की अन्य समस्याओं के हल के लिए फौन-से उपाय अपनाये जाने चाहिए

शासन प्रदाध का अध्ययन---राज्य और सरकार राजनीति विज्ञान के प्रमुध बरप्रप्ययल विषय हैं और इनके विशेयत॒या सरकार के सन्दर्भ मे लोक प्रशासन निश्चित रूप से एक भहंत्वपूर्ण तत्व है। मद्यवि लोक-प्रशापन एक पृथक्‌ विषय है परन्तु लोक-प्रशासत से सम्बन्धित मूल बातो का अध्ययन राजनीति विज्ञान का भी अग है » सोक-सेवको का मन्त्रियो से सम्बन्ध तथा प्रशासन को अधिकाधिक कुशल एवं लोक $ हितकारी और उत्तरदायी बताने के उपायो का अध्ययन राजनीति विज्ञान मे किया

जाता है कऊब्प सफ्ताज विज्ञानों का प्रासंणिक अध्यपन--वर्तेभान समय में इस्त तथ्य को

स्वीकार कर लियों गया है कि मानव के राजतीतिक विचारों को अन्य सामाजिक, झाथिक, भौगोलिक, मनोवैज्ञानिक आदि तत्वों के ढारा प्रभावित किया जाता है और गाजनीति विज्ञान अन्य समाज विज्ञानों से परे हटकर अपनी पतमस्याओं का अध्ययन मही कर सकता है। अत राजनोति विज्ञान के विभिन्न विद्वातो द्वारा अन्य समाज विज्ञार्तों के सन्दर्भ में ही राजनीति विज्ञात के अध्ययन पर बल दिया ग्रया है ) उदाहरणाय, काले मावस्त ने राजनीति विज्ञान के लिए आधिक आधार को अपनाया है और सेबड्गले, एपहुल खालस, आदि ने राजनीतिक सस्थाओं को समझने के लिए मनोविज्ञान की ओर सकेत किया है॥ अत- हजार और स्टोवेन्सन के शब्दों भे, “राजनीति दिज्ञाव, जो एक समय अपने अध्ययन के लिए राजकीय तत्वों का हो ध्यान रखता था, आज बपने भ्रशासनिक तत्वों के अध्ययत में आपिक, सामाजिक और भोगोलिक आधारों की भो विदेचना करता है ॥* राजनीतिक दलों तथा अन्य दबाव गुढ्दों का अध्ययन आऊ राजनोति विज्ञान राजनीति के सतही अध्ययन से आगे बंढकर राज- नीतिक जीवन की वास्तविक्ताओ का अध्ययन करने मे सलग्न है और अध्ययन के इस क्रम मे राजनीतिक दल दबाव गुट सबसे अधिक प्रमुख रूप मे आते हैं वस्तु मे तो वे सस्याएँ हैं जिनके द्वारा समस्त राजनोतिक जीवन को परिचालित किया

]2... राजनौति बिज्ञान के सिद्धान्त ; जाता है| बर्तम्राव समय मे तो सविधान और शासन के औपचारिक सगठन की ! अपैदा भी राजनीतिक दल और दबाव ग्रुद के अध्ययन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है राजनोविक विचारों का इतिहास और आयुनिक राजनीतिक विचारयाराएँ

राजनीतिक विचारो के इतिहास को पृष्ठभूमि में ही आज की राजनीतिक रिपति को सही रूप मे समझने का कार्य किया जा सकता है अत राजनौति विशान में सुकरात और प्लेटो से लैकर यदं प्ड रसल तथा मनु से लेकर महात्मा झाँधो तक विभिन्न विद्वानों द्वारा राजनी वि के क्षेत्र मे व्यक्त डिये गये वियारों वा अध्ययन रिया जाता है। राजनीति में हमारा आदर्श त्रया होना चाहिए, इस विषय वो लेकर ध्यक्तिवाद, समाजवाद, साम्पवाद, गाँत्वीवाद, आदि अनेक राजनीतिक विद्ारधाराबो का प्रतिपादन डिया जा घुका है! राजनीति विज्ञान में इन सभो विचारधाराओ के तुलनात्मक गुण दोषौ का अध्ययन कर इस बाव पर विचार जिया जांता है कि एक देश-विशेष की परिस्थितियों में इनमें से किए विचारधारा शो अपनाना अधिक उपयुक्त हो सकता है अग्तरराष्ट्रीय विधि, सम्बस्धों और सपठनों का अप्यपत

अन्तरराष्ट्रीय विधि, सम्दन्धों और सगठनौ वा अप्ययत भी राजनीति विज्ञान का विषय है। राजनीति विज्ञान में हम इन बातों पर विवार करते हैं कि अन्तर- राष्ट्रीय दिधि का विकाह कव और कंसे हुआ ? अन्तरराष्ट्रीय विधि वा वतमान स्वरूप बया है और उनके पीछे बन सो शक्ति है ? राजदूतों, ग्रुद्बन्दिपों, अन्तरराष्ट्रीय ध्यापार साग्धि तथा धरुद्ध से सम्बन्धित नियम्रो में कौस-से सुधार किये जायें !970 और उसके बाद विमानों के बलात्‌ अपहरण की बढ़ती हुई घटनाओं शो देवहर एस शात पर विचार क्या जा संता है कि वायु यातायात को सुरक्षित बनाते के लिए गया उपाय अपनाये जाये ? राजनीति विज्ञात विभिन्न राज्यों के पारस्परिय सम्बरन्धों पर विधार करता है और अब तछ स्पाषित अन्तरराष्ट्रीय संगठनो-राग्दुरय तथा शपुक्त रण्द्सप--तें सगठन और कार्यों का अध्ययत गरता है।*

इस प्रकार हम बह रायते हैं कि राजनीति वितान का शेत्र अप्यधिर विस्तृत है ओर इप्ते क््तगंत राज्य की उत्पत्ति के सिद्धाग्त, सम्यमुंता, कानूत, रवतस्त्रता, भपिशाए, शाएत के प्रपाए और अंगों, प्रतितिधिव, राग्य के कार्यों, राजनीतिक इसों, दृढाद सपूएू, शनमत, ध्यक्तिवांद, शपाभदाद, साप्यवाद आदि शामनौतिश विद्याधधाराओं तया मग्तरष्ट्रीय दिथि, सम्ःथों और शगठत का मध्ययत किया जाता है राजनोति विज्ञान के खेत्र में तिएप्तर ददि रे उपर्युक्त शीमाों तर तो राज्य का क्षेद्र परम्परागत रूप मे बिस्‍्तृत है ही हे स्तु राजजीति दिशाल का अध्ययत विषय गतिशीम है मौर इतये विरम्तर वृद्धि हो रही है। बर्दपात समर में झुछ सबीन प्रवृ्तियों का उदय हो जाने के गारण राज»

राननीति विज्ञान को परित्तावा, क्षेत्र तथा स्वकूप.... 3

भोति विज्ञान का क्षेत्र ओर भी अधिक विस्तृत हो गया है। इन प्रवृत्तियो मे प्रमुख रूप से लीवन की विविधता, प्रजातस्तात्मक शासन प्रणाली का उदय, लनकूत्याणकारी राज्य की घारणा, निर्योशित आयिक विशाल (?800०0 छं००००फा० 0८४८००१- प्राध्ण) मोह वेजानिक विकाप्त के परिणामस्वरूप ,सम्पूर्ण विद का एक इकाई वेजानिक विक्राप्त के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण दिश्द का एक इकाई के रूप में वरिणित हो जाना है। हा

वर्तमान समय में मानव-जीवन बहुत अधिक विविधतापूर्ण हो गया है और राज्य तथा सरकार के अतिरिक्त दूसरे समुदायो ने जन्म ले लिया है जो मानव के रागनीढिक जीवन को बहुत्त प्रभावित करते हैं। ब्रत राजनीति विज्ञान मे राजनीतिक समुझयों और सस्याओ का प्रमुख रूप से तथा सामाजिक जीवन के अस्य समुदाओं का प्रासंगिक रूप से अध्ययन जिया जाता है

राजतत्व और कुलीनतन्त्र के अन्ठर्गंत राजनीति कुछ गिने चुने व्यक्तियों के विचार का विषय थी किन्तु शासन व्यवस्था के रूप मे प्रजातस्त्र के उदय के साथ ही राज्य मौर राजनीति सर्वक्षाघारण वे विचार की वस्तु वन ययी है इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान के प्रमुथ प्रतिपाथ विषय राज्य का क्षेत्र अधिकाधिक विस्तृत होना जा रहा है। “आज पुलिस राज्य' का स्पान 'लोककल्याणकारी राज्य' ने ले लिया है श्लौर यह कहा जा सकता है कि पालने से लेकर श्मशान' ([०छा टाक्वे!७ (० 87४४९) तक व्यक्ति के जीवन का कोई भी कार्य राज्य के क्षेत्र से बाहर नही रहा है। गान अधिकाश प्रजातस्त्रात्मक राज्यो द्वारा नियोजित आथिक विकास' वे मार्ग को अपना लिया गया है. जितके परिणासंस्वस्प आय सेब की अंनेक-तिविधियां-- 'यजनीति विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय बन-गयी. हैं

इन सबके अतिरिक्त वैज्ञानिक विक्याम के कारण सम्पूर्ण मानव समाज ने एव इकाई का रूप धारण कर लिया है और विश्व के एक कोने मे घटने बालो घटता का प्रभाव पूरे विश्व पर पडता है। अमरीकन राजनोतिज्ञ वेण्डेल विल्की (भ्रल्यएथा जगत) ने अपनी, पुस्तक 'एक विश्व (078 'ै/०7५) मे सम्पूर्ण मानव समाज की जो एकरूपता दिखायी है वह एक तथ्य है ओर इससे राजनीति विज्ञान के क्षेत्र मे स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक वृद्धि हो गयी है

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि सभ्यता के विकास के साथ साथ राजनोति विज्ञान का क्षेत्र दिन प्रतिदित अधिकाधिक व्यापक होता जा रहा है और आज हम कह सकते हैं कि “राजनीति विज्ञान विधय का क्षेत्र उतना ह्ठी व्यापक है जितना कि समय और प्रदेश ४7?

राजनीति दिज्ान क्षेत्र के संम्दर्ध मे आाधुनिक्तम दृष्टिकोण

परम्परागत रूप मे यह समझा जाता है कि व्यक्तियों का राजनोतिक जीवन, राज्य और अन्य राजनीतिक सस्याएँ ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन दिपय हैं लेकिन

३. *्यूफरह ३८०७८ 7-३) 56०७४ 35 ९० दशयशधठडर5 क्या पए्6 500 उएब०5,०

]4. रामनौति विज्ञान के छिद्वान्त

युद्रोत्रकाल (945 के दाद) विशेषतया अभी हाल ही के वर्षों मे इस दृष्टिकोण वी क्‍टू भ्रातोचना हुई है। द्वितीय विश्वयृद्ध के पूर्द भी प्राहप वालस, ए- एफ घैष्टले, कंटलित, सासवेल, आदि विदारक़ों ने इस बात का प्रतिपादन कियां था कि ह॒पारे दिपय का अध्ययन केद्ध राजनीतिक सत्याओं की अपेक्षा इन सस्थाओं की चालक झक्ति मानवीय व्यवहार को बनाया जाना चाहिए। युद्धोत्तर वर्षों मे इस प्रवृत्ति ने एक स्यापक और त्रान्तिकारी रूप ग्रहण कर लिया और इस प्रवृत्ति के एक प्रभुब प्रणेता डेंदिड ईस्टम ने इसे फयवहारवादों क्षान्दोलन' की सज्ञा दी राजनीति विज्ञान का अध्ययन बहुत कुछ सीमा तक इन मान्यताओं के साथ ऑसम्म हुआ था कि मानव एक विवेकशील प्राणों है' और 'राज्य मानव को धरेष्ठ जीवन प्रदान करने वालो सर्वोच्च सस्या है' लेविन दोसवों रादी के दो भीषण पुंद्धों में जो जन सहार देखा गया, उप्तते माल की विवेकशीलता और राज्य सस्या वी श्रेष्दता पर से राजशात्त्रियों का विश्वास हिला दिया और अब उन्होंने यह सोचना शुरू किया कि मानव एक विवेक्शील ,धगणी हू! होने के - ध्यान पर भावताशीक प्राणी है, जिसके अपने संस्कार, भावनाएं, लाउसाएँ तथा दृष्टिसोण हैं ओर ये सब कुछ दियिर-- ही, यरन्‌ परित्यितियों और वातावरण के अनुसार परिवर्तनशील होते हैं। अत

'पअहि हम मानवीय स्पवहार की समझता चाहने हम मानवीय व्यवहार को समझता चाहते हैं, तो हमारे द्वारा उसके ध्यवहार को

प्रभावित करने वाला म॒! पता करो आल्शत्त मे क्त प्रामाजिक तथा आधिक परिस्थितियों का अध्ययन

शिया जाना चाहिए ब्यवहारवादी आखोलत में इस वात वर बस दिया गधा है कि गः

स्वेक्ति अपना राजनीतिक जीवन श-्य में ब्यहोत नहीं पं करता, घरन्‌ समाज के 8 बे रहें हुए ही ध्यतोत रूपा है आर सत्रत्त सामानिक जीवन वे मे! रंजिनीतिक जीवन_को समझा जा सता है। अत राग्य ओर राजनीतिक सस्याप्रों "क्षा दोरेधि के बाहर के मानव स्थवहार और राशनोतिर समुदार्पों का सो राजतोति विशान में अध्यपत शिया जाता चाहिए इस प्रशार राजनीति विशान के अध्ययन बी नवोन प्रवुलियों ने इस दिपय के अध्ययन क्षेत्र को और ध्यापह ता प्रदात पी है ओर मातव जीवन वे अराजनोतिक पक्षों तया समुदायों को इसमे सम्मिलित कर दिया है। आज शी स्थिदि के असस्ध _ में रांबर्ट .ए उद्त (पिला & 0५7) ने लिया है कि “राजनीति आज उानवीय _ कम मद परम के रकम हे जा अपरिहार्य तत्व बत धुरी है। प्रत्येऱ स्वक्ति रिसी ने शिगो_ रूप मे डिमी ने किसी प्रशार को राजनोविक ब्ययरया से अदेग्य ही सम्बंद होता है ।" राजमोति विज्ञान की परिभाषा ओर छऐ्षेत्र बे सम्बन्ध में परग्परागत और आधुनिक दृष्टिकोश ; एक तुतनात्मक अध्ययन

(र&एणा99&. ७१४० १4007ए४ ६४-१० # ए०७९७२७7]५८: 57 ए0४)

राजनीति विजान की परिभाषा और क्षेत्र के सायन्य में परम्पदागत हस्टिशौश का प्रतिपादत स्पट्शसी, गेरित, गानेर, सोते, सीढाँक, गेंटस ओर सॉस्‍को आदि

राजनीति विज्ञान को परिभाषा, केंद्र तथा स्वरूप... 5

विद्ठानों के द्वारा किया गया है, आधुनिक दृष्टिकोण के प्रमुख प्रतिपादक हैं * डेविड इस्टन, रॉबर्ट डहाल, जो जी केटलिन, मेंक्स वेवर और एच डी. लासवेल आदि | विषय की परिभाषा, प्रकृति और क्षेत्र के सम्बन्ध मे आधुनिक दृष्टिकोण निम्न रूपो मे परम्परागत दृष्टिकोण से भिन्न हैं

() परम्परागत दृष्टिकोण राजनोतिक सस्थाओ अर्थात्‌ राज्य, सरकार आदि के अध्ययत पर वल देता है, लेकिन आधुनिक हष्टिकोण की मान्यता यह है कि राजनीतिक सस्याएं व्यक्तियों से चालित होती हैं और व्यक्तियो के व्यवहार के माध्यम से ही राजवीतिक जीवन को समझा जा सकता है, अत वह व्यक्तियों के व्यवहार के अध्ययन को सर्वोपरि महत्व देता है इस हृष्दि से आधुनिक राजनोतिक अध्ययन में मानव के मनोंवेगो, इच्छाओ, प्रेरणाओ और आकाक्षाओं का अध्ययन किया जाता हूँ।

(2) परम्परागत दृष्टिकोध में राजीति विज्ञान बा अध्ययस आस्यता अर्थात्‌ अलगाव के रुप में किया जाता है और यह अपने आपको भात्र राजनीतिक क्ियाओ-प्रतिक्याओ तक सोमिव कर लेता है लेकिन आधुनिक हष्टिकोण की मान्यता यह है कि'च्यक्ति के राजनीतिक जीवन को सामाजिक जीवन के सन्दर्भों मे ही उचित रूप में समझा जा सकता है ओर राजनीतिक अध्ययन में अल्वर-अनुशासनात्मक दृष्टिकोण” (67 ४$८एग्राआ/ 6ै9ए7०5५7) को अपनाया जाना चाहिए

(3) परम्परागत हृष्टिक्रोण मूल्यों से युक्त और मूल्यी पर आधारित हैं, इसलिए उमप्रमे व्यक्तिनिष्ठता गयी है और विचार भेद को टह्थिति बहुत अधिक प्रबल रूप में है, लेक्नि आधुनिक हृष्टिकोण का उद्देश्य राजनीति विज्ञान में लगभग वदाये विज्ञानो वी स्रीमा तक वह्तुनिष्ठाता (0एव्णारशा9) लाना है, बत इसमे “मूल्य सापेक्षता' के स्थान