सत कबीर

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चतुर्थावृत्ति ; १६५४७ ईसवी

दस रुपया

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मुद्रक : रामआसरे कक्‍्कड़ हिन्दी साहित्य प्रेस, इलाहाबाद

राग ओर सलोकृ का निर्देशु

[ग़ु सिरी न्‍ » गउड़ी » आसा » गूजरी » सीरठि

» पेनासरी

» पिलग » रे

» बिलावलु

» गौड

» रॉमकली

मारू » केदारा > भैरठ | » चंसंतु

» सारग

» बिभार प्रभाती

सलोक :

पृष्ठ 42 ! 99 ६० 9. रशेफ १9 १२० 39 १४१ 99 १४६ 9. १४७ 99 १५४२ 99 १६४ 99 १७६ 99 श्ष्प्६्‌ २७० /, २०६ 9 २३० 99 र्रे६ 5, २४२ प्रष्ठ २४६

पदनखख्या र्‌ १९ ७: 99 ३७ १5 र्‌ 959 ११ १) रे. 95 99 4३ १२ 99 १९ 29 १९ 99 ११ 99 दर 99 २० 99 छः 99 है

कुल पद-संख्या २२८,

२४३

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विषय-सूची

मअस्तावना

रागु

सलोकु

परिशिष्ट (क) राग के अर्थ » (ख) सलोकु के अथे ». (ग) कोष प्रममु'

(उल्टबॉसी कोष) (संख्या कोष) (शब्द कोष) 2... (घ) संत कबीर और कबीर म्रंथावली के पश्चों की समानता अनुक्रमणिका ( क) (रागु) (ख) (सलोकु)

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चित्रों का परिचय

कबीर का श्रस्तुत चित्र भारत इतिहास संशोधक मंडल, पूना से प्राप्त किया गया है। इसकी मूलप्रति वहाँ की चित्रशाला में सुरक्षित है। इसका आकार ८१६” %८५३” है। यह चित्र नाना फडन- वीस के चित्र-सग्रह से प्रास हुआ है कहा जाता है कि नाना फड़नवीस संतो के प्रति श्रद्धा रखते थे और सदैव उनके चित्नो की खोज में रहते थे। उसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने उत्तरी भारत से यह चिन्न प्राप्त किया था। चित्रकार या चित्र की तिथि अज्ञात है। नाना फड़नवीस का कार्य-काल सन्‌ १७७३ से १७६६ तक रहा है ।अ्रतः यह चित्र कम से कम पौने दो सो वर्ष पुराना है ( इस चित्र को प्रकाशित करने की आज्ञा प्रदान करने के लिए में भारत इतिहास संशोधक मंडल, पूना का कृतज्ञ हैँ। )

शरीर में घटचक्र--मेरुदंड' के समानातर सुषुम्णा नाड़ी के विस्तार | में नीचे से ऊपर तक छु। चक्र हैं। उनके नाम हैं :-...मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध ओर आशा प्राणायाम की स्थिति में इन चक्रों की सिद्धि दिव्यानुभूति में परिणत होती हैं | मूलाधार चक्र मे कंडलिनी है जो जाशत होकर समस्त चक्रों को पार कर सहखदल कमल मे पहुँचती है और योगी को चरम सिद्धि तक पहुँचा देती है

सहस्र दल कमल--यह तालु-मूल मे स्थित होकर शिरोभाग में फेला हुआ है। इसी सहखदल कमल मे ब्रह्मरंश्न है, जहाँ मूलाधार चक्र की कंंडलिनी सुघुम्णा में ऊपर बढ़ती हुईं स्थिर हो जाती है इसी कमल के मध्य में एक चंद्र है, वहाँ से सुधा का प्रवाह होता है

( )

जिससे शरीरक्षय दूर होता है। योगी के समाधिस्थ होने पर अनाइतनाद के गूँजने का यही स्थान है।

मूलाघार चक्र--यह चक्र गुह् स्थान, के समीप स्थित है। इसमें चार दल होते हैं। इस चक्र पर मनन करने से साधक को दरहुरी (मेढक के समान उछल ने की) शक्ति प्राप्त दोती है। वह क्रमशः प्रथ्वी को संपूर्णत! छोड़कर आकाश में उड़ सकता है। बुद्धि- संपन्नता के साथ उसमें सर्वक्षता आती है। वह जरा ओर मृत्यु को नष्ट कर सकता है। इस चक्र के सिद्ध होने पर प्रत्येक दल से क्रमशः व, श, ष, का नाद मसंकझृत होता है

0.

& कु'डलिनी --सुषुम्णा नाड़ी के मार्ग पर मूलाघार चक्र में एक सर्पा- कार दिव्य शक्ति निवास करती है उनका नाम कडलिनी है। उसका शरीर सप॑ की भाँति साढ़े तीन बार मुड़ा हुआ है और बह अपनी पेछ अपने मुख में दबाये हुए है। बह सप॑ के समान” शयन करती है ओर अपनी ही प्रभा से आलोकित है वह विद्यु- ल्‍लता की भाँति है | कुंडलिनी प्राणायाम से जाणति होने पर क्रमशः षट चक्रों में प्रवेश कर सुधुम्शा नाड़ी के सहारे सहल दल कमल" ' के ब्रह्मरभ्र में प्रवेश करती है | यह योग की चरमावस्था है।

< स्वाधिशन चक्र--यह चक्र लिगमूल के समीप स्थित है | इसमें छ; दल हैं। इस चक्र पर चितन करने से साधक विश्व में बधनमुत्त और भयरहित हो जाता है। वह इच्छानुसार अणिमा व्म लघिमा ' सिद्धि का उपयोग कर सकता है। वह मृत्यु भी जीत लेता है। , इस चक्र के सिद्धि होने पर प्रत्येक दल से क्रमशः ब, भ, में, य, र,, , ले का नाद मंकृत होने लगता है |

मणिपूरक चक्र-यह चक्र नाभि के समीप स्थित है | इसमें दस दल होते हैं| इस चक्र पर चिंतन करने से साधक इच्छाओं का स्वामी हो सकता है वह इच्छानुसार किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर

( १४ )

सकता है। स्वर्ण-निर्माण की शक्ति और गुप्त धन की दृष्टि उसे मिल जाती है। इस चक्र के सिद्ध होने पर प्रत्येक दल से क्रमश: ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, का नाद मभंकृत होने लगता है।

अनाहइत चक्र--यह चक्र ह्ृदयूस्थल के समीप है इसमें बारह दल होते हैं। इस चक्र पर चिंतन करने से साधक भूत, भविष्य और वर्तमान जानने लगता है। वह वायु पर चल सकता है, श्रथवा उसे खेचरी शक्ति आप्त हो जाती है। इस चक्र के सिद्ध होने पर प्रत्येक दल से क्रशः क, ख, ग, घ, ड, च, छ, ज, कर, भ, ट, का नाद मंकृत होने लगता है |

विशुद्ध चक्त--यह चक्र कंठ के समीप है। इसमें सोलह दल होते हैं| इस चक्र पर चिंतन करने से साधक योगीश्वर की संजशा प्राप्त करता है। वह चतुबंदों का ज्ञाता होता है और उसकी प्रवृत्तियाँ संपूर्णतः! अतर्मखी हो जाती हैं। वह सुहृद शरीर में एक सइल वर्षों का जीवन व्यतीत करता है। इस चक्र के सिद्ध होने पर प्रत्येक दल से क्रशः अ, आ, इ, है, उ, ऊ, ऋ, ऋ, द, लू, ए, ऐ,, ओ, ओ, थे, अरः का नाद मंकझृत होने लगता है। यह चक्र स्वर-ध्वनि का केंद्र है।

।० आज्ञा चक्र--यह चक्र त्रिकुटी ( भोंहों के मध्य स्थान ) के समीप है| इसके दो दल होते हैं। इस चक्र पर चितन करने से साधक जो चाहता है, वही कर सकता है यह प्रकाश का बिंदु है | इस चक्र के सिद्ध होने पर प्रत्येक दल्त से और क्ष का नाद मंकृत होने लगता है |

।१ मान चित्र-इस मानचित्र में भारत के भिन्न भिन्न स्थानों में

कबीर पंथ के केंद्रों और मठों की स्थिति ओर उनको प्रभाव प्रदर्शित किया गया है |

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सत कबीर *

प्रस्तावना

कबीर की कविता एक युगांतरकारी रचना है। भक्त कवियो की ' विनयशीलता और आत्म-भत्संना के बीच में वह स्पष्ट कठ में कही गई धामिक ओर सामाजिक जीवन की पक्षपात- कबीर की कविता रहित विवेचना है| उस कविता में समय की अंध- परंपराओं को छिन्नमूल करने की शक्ति है ओर जीवन में जागाण लाने की अपूर्व क्षमता हिंदी साहित्य के धामिक काल के नेता के रूप में कबीर ने जितने साहस से परपरागत हिंदू धर्म के कमकाड से संघ लिया उतने ही साहस से उन्होने भारत में जड़ पकड़ने वाली इस्लाम को नवीन सांप्रदायिक भावना से लोहा लिया। कबीर ने सफलतापूवंक दोनों घर्मों की थअधामिकता? पर कुठाराघात किया और एक नये सप्रदाय का सूत्रपात किया जो 'सतमत” के नाम से प्रख्यात हुआ इस सप्रदाय ने शास्त्रीय जखग्लिताओं से सुलझा कर धर्म को सरल और जीवनमय बना दिया जिससे साधारण जनता भी उससे अतःप्रेरणाएँं ले सके | यही कारण है कि इस सतमत में समाज के साधारण ओर निम्न व्यक्ति भी सम्मिलित हो सके जिनकी पहुँच शास्रीय ज्ञान तक नहीं थी। कबीर ने साधारण जीवन के रूपको द्वारा श्रथवा अनुभूतिपूर्ण सरस चित्रों के सहारे ही आत्मा, परमात्मा आर संसार की समस्याओ को सुलकाया | धम-प्रचार की इस शैली ने घम को व्यक्तिगत अनुभव का एक अग बना दिया और समाज ने धर्म के वास्तविक रूप को पहिचान लिया 4 जनता का यह गतिशील सहयोग कबीर की रचनाओ के पक्ष मे अनुकूल सिद्ध नहीं हुआ ! कबीर सत पहले थे, कवि बाद में उन्होने कविता का चमत्कार प्रदशित करने के लिए कैठ मुखरित नहीं किया

संत कबीर

उन्होने धर्म के व्यापक रूप को सुबोध बनाने के लिए काव्य नियोजित किया। अतः कबीर में धार्मिक दृष्टिकोण प्रधान हे कविता का रूप काव्यगत दृष्टिकोण गौण | यह दूसरी बात है कि जीवन में “गहरी पैठः होने के कारण उनकी कविता मे जीवन की क्रांति सहखमुखी हो उठी उससे धमम प्राशमय होकर अ्रनेक चित्रों में साकार हो गया। (संत कबीर कवि कबीर हो गए यद्यपि संत ने तो भाषा के रूप को सेवारा और पिगल की भात्रिक और वर्णिक शैली का अ्रनावश्यक अनुकरण किया। गेय पदो के रूप मे उन्होंने कबिता कही और जनता ने उसमें अपना कंठ मिला दिया | जनवाणी के रूप में ये पद समाज में संचरित हो गए। साथ ही साथ कबीर के नाम से जनता ने नवीन पदो की रचना करने में कबीर के प्रति अपनी श्रद्धा ओर मक्ति समझी | इस प्रकार कबीर की वाणी में ऐसे-ऐसे पद प्रन्नित किए गए. जिनमे तो कबीर की आत्मा है ओर उसका ओज कबीर ने 'पुस्तकशान”? का तिरस्कार किया था ग्रतः स्वयं उन्होने किसी विशिष्ट ग्रंथ की रचना नहीं को वे तो जनता में उपदेश देते थे ओर अपने पदो को उपदेश का माध्यम बनाते थे | फूलतः पदो में तो कोई क्रमबद्दता है ओर कोई श्रृंखला। कविता: | रूप मुक्तक होने के कारण सत संप्रदाय के भक्तों द्वारा मनमाना बढ़ाया-बटाया गया. है| अतः कबौरे के नाम से प्रसिद्ध रचना में कबीर की,वास्तविक रचना पाना बहुत कठिन हो गया है। कबीर के नाम से पाई जाने वाली रचना अधिकाशतः कबीर के प्रथम शिष्य घधमंदास द्वारा ही लिखी गई है| बाद में तो कबीर-पथी साधुओं ने अपनी ओर से बहुत सी रचना की..और संत कर्बीर में अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा होने के कारण उसे ,कबीर्‌, के नाम से ही प्रचारित किया। कबीर के प्रति इस श्रद्धा और भक्ति ने कबीर की कविता का वास्तविक रूप ही हमसे छीन लिया ओर आज कबीर के नाम से प्रचलिकरचना को. इम संदिग्ध दृष्टि से-देखंने लगे हैं|

प्रस्तावना डे

इस समय कबीर की कविता के बहुत से संग्रह कविता के संग्रह. प्रकाशित हैं प्रायः सभी में पाउनमेद है | इस दृष्टिकोण से निम्नलिखित सस्करण अ्रधिक प्रसिद्ध कहे जा सकते है ;-- १, संतबानी सग्रह (बेलवेडियर प्रेस) प्रकाशित सन्‌ १६०४, बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद | बीजक मूल (कबीरचौरा, बनारस) प्रकाशित सन्‌ १६३१, महाबीर प्रसाद, नेशनल प्रेस, बनारस केट ३. सत्य कबीर की साखी (श्री युगलानंद कब्नीरपंधी भारतपथिक) प्रकाशित सन्‌ १६२०, श्री वड्ुटेश्वर प्रेस, बम्बई | ४. सदगुरु कबीर साहब का साखी अ्रथ (कबीर धर्मवर्धक कार्या- लय, सीयाबाग, बड़ौदा) प्रकाशित सन्‌ १६३४, महंत श्री बालकदास जी, धमंवधक कार्यालय, सीयाबाग, बडौदा | ४, बीजक श्री कबीर साहब (साधु पूरनदास जी) प्रकाशित सन्‌ १६०५, वाबू मुरलीधर, काली स्थान, करनेलगज, इलाहाबाद | ६, कबीर ग्रंथावली (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) प्रकाशित सन्‌ १६२८, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग | उपर्यक्त सस्करणों में बीजक और साखी अथ अलग-अलग अथवा मिले हुए ग्रथ हैं जिनसे कबीर की कविता का ज्ञान जनता में सम्यक्‌ रूप से अवश्य हो गया किंठु इन सभी सस्करणों की संग्रहों की ग्रामा- प्रामाणिकता चित्य है |बेलवेडियर प्रेस से प्रकाशित णिकता, संतवानी सतत्रानी सग्रह का प्रचार सर्वाधिक है कितु यह सम्रह प्रति संतों और महात्माओं द्वारा एकत्र सामग्री के आधार पर ही संकलित की गई है। उसका रूप साधु-सतों के गाये हुए पदा और गीतो से ही निमित है, किसी प्राचीन हस्तलिखित ब्ति का आधार उसके संकलन में नहीं लिया गया और यदि लिया भी गया है तो उसका कोई सकेत नहीं दिया गया।

है सत कबीर

कबीरचोरा ने जो बीजक मूल की प्रति प्रकाशित की है, उसका पाठ अनेक प्रतियो के आधार अवश्य है कितु वे प्रतियो केवल 'सांज्षी रूप से ही डपयोग में लाई गई हैं।१ इस बीजक मूल प्रति का मूल आधार कबीरचोरा का प्राचीन प्रचलित पाठ है। किंतु यह प्राचीन पाठ किस प्रति

के आधार पर है, इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया श्री युगलानद कबीरपंथी भारतपथिक की प्रति प्रामाणिक प्रतियों की सहायता से प्रामाणिक नहीं हो सकी | श्री बुगलानद ने अपनी प्रति को अनेक प्रतियों से शुद्द भी किया है। सत्य कबीर की जिन पुस्तको से यह शुद्ध हुई है उनमें से एक साखी प्रति तो रसीदपुर शिवपुर निवासी श्रीमान्‌ बख्शी गोपाललाल जी, पूर्ब श्रमात्य, शिवहर राज्य के पुस्तकालय से ग्रास हुईं थी जो सबत्‌ १६०० की लिखी हुई है | दूसरी प्रति नागपुर इन्द्रभान जी निवासी श्री मैरवदीन तिवारी जी ने कृपाकर ज्ैजी थी जिसमें अनेक सतो की वाणी के साथ-साथ यह साखी भी है और संबत्‌ श्ट४२ की लिखी है और तीसरी प्रति मखदूमपुर जि० गया निवासी श्री नेतालालराम जी की भेजी हुई है, जिसमे यद्यपि सन्‌ संवत्‌ नह्दी लिखा है परंतु पुस्तक के देखने से जान पडता है कि यह भी प्राचीन ही लिखी हुई है। इसके अतिरिक्त स्वामी श्रीयुगलानंद जी

बीज्षक मूल के संपादक साधु लखनदास और साधु रामफलदाप दिखते हैं :--

झपने मत तथा इस ग्र॑थ का संशोधन ग्यारह ग्रंथों से किया है जिसमें छुः टीका-टिप्पणी साथ है ओर पांच हाथ की लिखी पोथी है परंतु इन सब ग्थां को साक्नी रूप में रखा था, केवल स्थान कबीरचोरा काशी के पुराने ओर भ्रचल्ित पाठ पर विशेष ध्यान दिया गया है

प्रस्तावना हे,

के पास और भी अनेक प्रतियाँ थी जिनसे उन्होंने इस पुस्तक को शुद्ध कर लिया है |” (श्री खेमराज श्रीक्षष्णदास) यदि श्री युगलानन्द जी अपनी प्रति में सबत्‌ १६०० की प्रतिवाली सामग्री रखते तो उनकी प्रति अवश्य प्रामाणिक होती ६कंठु उन्होंने किया यह है कि 'कबीर साहब की जितनी साखियाँ जगत मे प्रसिद्ध है सब इसी पुस्तक मे? संकलित कर ली हैं ओर उन्हे सवत्‌ १६०० की प्रति की साखियो से यथास्थान शुद्ध किया है | इससे इस पुस्तक की बहुत-सी सामग्री सवत्‌ १६०० की प्रति से अतिरिक्त है ओर उनकी प्रामाणिकता के संबंध मे कुछ नही कहा जा सकता क्योकि उनकी प्रति मे प्रामाणिक ओर श्रप्रामाणिक सामग्री एक साथ मिल गई है | कबीर धम्ंवर्धक कायोलय, सीयाबाग, बडौदा का साखी ग्रंथ एक आलोचनात्मक अवतरणिका और अनुक्रमणिका के साथ है और उसमे कबीर की सभी साखियाँ संग्रहीत है किहु साखी अरथ पुस्तक में किसी भी स्थान पर नहीं लिखा है कि साखियो के पाठ का आधार क्या है। अ्रतः इस पाठ की प्रमाणिकता के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जय सकता | साधु पूरनदास जी का बीजक ग्रथ बहुत प्रसिद्ध कहा जाता है | सबत्‌ १८६४ में उन्होंने उसकी “त्रिज्याः लिखी यह त्रिज्या “पहली बार बादा देवीप्रसाद और सेवादास और मिस्त्री बीजक बालगोविद की सहायता से म्रु शी गगाप्रसाद वर्मा लखनऊ के छापेखाने में छापी गई थो | उसके बहुत अशुद्ध हो *जा ने के कारण हर जगह के साधु लोग बहुत शिकायत किया करते थे। ,«-- सेब साधु-महत्माओं की दया से एक प्रति हस्तलिखित बीजक त्रिज्या सहित बुरहानपुर की लिखी हुई, साधु काशीदास जी साहब से हमको मिली | उस ग्रथ की शुद्धता को देखकर हमारा मन बहुत प्रसन्न हुआ, और साधु काशीदास जी साहब ने इस त्रिज्या के शोधने में पूर्ण परिश्रम उठाकर सहायता दी है |”

जड़

|. सत कबीर

(बाबू मुरलीधर) यहाँ यह स्पष्ट नही है कि साधु काशीदासजी साहब की जो प्रति थी वह किस संवत्‌ की थी और उसका आधार क्या था यों बीजक को कबीर के विचारों का पुराना संग्रह मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए |

प्रामाणिकता दृष्टिकोण को सामने रखते हुए. काशी नागरी प्रचारिणी सभा से रायबहादुर श्री (अब डाक्टर) श्यामसुन्दरदास जी ने कबीर अंथावली का प्रकाशन किया। यह संस्करण दो प्राचीन प्रतियो के आधार पर प्रस्तुत किया गया है | एक प्रति संवत्‌ १५६१ की लिखी हुई है और दूसरी संवत्‌ श्यय० की | “दोनो प्रतियाँ सुन्दर अच्षरों मे लिखी हैं ओर पूर्णतया सुरक्षित हैं इन दोनो प्रतियो के देखने पर यह प्रकट हुआ कि इस समय कबीरदास जी ने नाम से जितने ग्र॑थ प्रसिद्द हैं उनका कदाचित्‌ दश- मांश भी इन दोनो प्रतियो मे नहीं है। यद्यपि इन दोनो प्रतियो के लिपिकाल में ३९० वर्ष का अतर है पर फिर भी दोनों मे पाठ-मेद बहुत ही कम है। संबत्‌ श्य८ू१ की प्रति में सबत्‌ १५४६१ वाली प्रति की अपेक्षा केवल १३१ दोहे ओर पद अधिक हैं |?” नागरी प्रचारि- णी सभा के इस सस्करण का मूल आधार सवत्‌ १५६१ की लिखी हस्तलिखित प्रति है जिसके प्रथम और अंतिम प्रड्णो के चित्र इस संस्क- रण के साथ प्रकाशित है। यदि इस प्रति को बारीकी से देखा जाय तो इसकी प्रमाणिकता के संबंध में सदेह बना ही रहता है। संदेह का पृहला कारण तो यह है कि हस्तलिखित प्रति की पुष्पिका ग्रथ में लिखे गए. अच्ञरों से भिन्न ओर मोटे अज्ञरों में लिखी गई है| समस्त अंथ ओर पुष्पिका लिखने मे एक ही हाथ नहीं मालूम होता प्रति का अंतिम अंश यह है;---

इतिश्रीकबीरजीकीबांणींसंप्रणसमाप्तः साथी ॥८१०॥ अंरा ॥६६॥ पद ४०२॥ रा॥ १५॥

पुष्पिका यह हेः--- संपूरणस वत्‌ १५६१ लिप्पक्तावारणरसमध्यपेम-

कबीर रौथावली

भस्तावना

चंद पठनाथ मलुकदासबाचबिचाजांसूश्री रामरामछुयाद सि पुरुत कंद्र शवप्ता- इस॑लिषतंमया यदिशुद्ध तोवाममदोशोनदियताँ ॥।

प्रति के अतिम अश का "“संपूरण? पुष्पिका में 'संपूर!ः हो गया है| इस सबंध में भी हजारी प्रसद द्विवेदी भी लिखते हैं, “एक बार इतिश्री कबीर जी की बाणी सपूरण समाततः ॥..-. * इत्यादि लिख- कर फिर से अपेक्नञाकत मोटी लिखाबट से संपूर्ण सबत्‌ १५६११ इत्यादि लिखना क्या सदेहास्पद नहीं है ! पहली बार का '“संपूरण? ओर दूसरी बार का “सपूर्श! काफी संकेतपूर्ण हैं | एक ही शब्द के ये दो रूप--हिज्जे ओर आकार-प्रकार मे स्पष्ट ही बता रहे हैं कि ये एक हाथ के लिखे नहीं हैं। ऐसा जान पडता है कि अंतिम डेढ़ पंक्तियाँ किसी बुद्धिमान की कृति हें ।?* इस प्रकार इस प्रति की पुष्पिका सपूर्ण ग्रंथ के बाद की लिखी हुई जान पड़ती है। पृष्पिका में एक बात और ध्यान देने योग्य है | मूल में (लग 'कः “श्री! जिस अ्रकार-प्रकार मे लिखे गए हैं उस आकार-प्रकार में वे पुष्पिका में नहीं लिखे गए | फिर मूल प्रति मे 4” और “व? के नींचे बिंदु रक्खे गए हैं जो पुष्पिका के यः ओर “व” के नीचे नही हैं “दोष? के हिज्जे के अतर ने तो यह स्पष्ट ही निश्चित कर दिया है कि पुष्पिका और मूल एक ही व्यक्ति द्वारा नही लिखे गए। मूल के श्रतिम प्रृष्ठ की चौथी पक्ति में हेः--'पीया दूध रुप्न हो आया। मई गाइ तब दोष लगाया |? यही “दोष? युष्पिका में दोशो दियता! में 'दोश” लिखा गया है। इसी प्रकार मूल में “इंद्री स्वारथि सब कीया बध्या अ्रम सरीर? में “इंद्री? के 'द्र! का जो रूप है वह पुष्पिका में “याद्रसि पूस्तक॑ द्रष्ट्बा? में याद्रसि' और <द्रष्ट्वा? के दर! का रूप नही है। इन अनेक कारणो से यह प्रति प्रामाणिक ज्ञात नही होती | संदेह का दूसरा कारण यह है कि इस प्रति में पंजाबीपन बहुत है जब कि बनारस में लिखीजाने

कबीर-- पृष्ठ १६ (हिन्दी-मन्थ-रत्लाकर सीरीज, बम्बई १६४२)

ष् संत कबीर

के कारण इसमे पूर्वीपन ही अधिक होना चाहिए. | फिर कबीर की बोली 'पूरबी? ही अधिक होनी चाहिए क्योकि उन्होने कहा भी है कि उनका सारा जन्म 'सिवपुरी (काशी) में ही व्यतीत हुआ ।१ इस पजाबीपन का कारण स्वयं ग्रंथ के सपादक बाबू ईयामसुन्द्रदास की समझ में नही आता |? वे लिखते हैं “या तो यह लिपिकर्ता की कृपा का फल है अथवा पंजाबी साधुओ्रो की संगति का प्रभाव है |” यदि यह पंजाबीपन लिपिकर्ता की 'कृपा का फल? है तो प्रति में कबीर साहब का शुद्ध पाठ ही कहाँ रहा और यदि यह पंजाबी साधुओ की सगति का प्रभाव है तो कया बनारस में रहने वाले कबीर साहब पर बनारस की बोली या बनारस के साधुओं का कुछ भी प्रभाव नही पड़ा संपादक द्वारा दिए' गए ये दोनो कारण फेवल मन समझाने के लिए है | इस संस्करण मेजो पाठ प्रामाणिक माना गया है उसमे भी अनेक भूले है। हस्त- लिखित प्रतियो मे एक लकीर मे सभी शब्द मिलाकर लिख दिए जाते है| एक शब्द दूसरे शब्द से अलग नही रहता अतः पक्ति को पढ़ने में दृष्टि का अभ्यास होना चाहिए. जिससे शब्दों को अलग अलग क्रम में स्पष्ट पहा जा सके | हस्तलिखित प्रति को छपाते समय संपादक को संदर्भ ओर अर्थ समझ कर शब्दों का स्पष्ट रूप लिखना चाहिए। कबीर अंथावली में अनेक रुथलो पर शब्दों को अलग-अश्रलग लिखने मे भूल हो गई है। कही एक शब्द दूसरे से जोड दिया गया है, कहीं किसी शब्द को तोड़कर आगे ओर पीछे के शब्दों में मिला दिया है जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया है। उदाहरणाथ राश गोौडी के बारहवें पद की दो पंक्तियाँ लीजिए. :--- घोल मदरिया बेलर बाबी, ककआ ताल बजावे पहरि चोल नांगा दद्द नाचे, भेंसा निरति करावे *

) सराल जनम सिवपुरी गवाइया मरती बार मगहरि उठ आइआ ॥रागु गोड़ी १५ * कबीर प्रन्धावली, पृष्ठ ६२

प्रस्तावना हा

यहाँ बैलर बाबी? और “चोल नागा दह नाचें! का कोई अथ नहीं होता वास्तव में 'बैलर बाबी” के स्थान पर होना चाहिए 'बैल र्राबी? और “चोल नागा दह नाचे! के स्थान पर “चोलना गादह नाचै? इस प्रकार के अशुद्ध पाठ कबीर अ्थावली में भरे पडे है अतः कबीर की कविता का प्रमाणिक पाठ इस सस्करण द्वारा भी

प्रस्तुत नही किया जा सका | ि कबीर का प्रमाशिक पाउ जानने के सबंध में हमारे पास कोई

विशेष सामग्री नही है | कबीर ने पुस्तक ज्ञान का सदेव तिरस्कार किया है? | अतः इससे संदेह है कि उन्होंने किसी अथ की रचना की होगी। उन्होंने जीवन और ससार पर चितन कर उपदेश दिए ओर शिष्यो ने उन्हें स्मरण रखकर बाद मे पुस्तक रूप से प्रस्तुत किये कबीर ने पुस्तकों से अध्ययन तो नही किया* कितु उन्होने अपना ज्ञान सत्सग और स्वानुभूति से अवश्य अजित किया। वे साधारणत: पढ़ें-लिखे हो सकते है क्योकि अज्ञुर-ज्ञान से संबंध रखनेवाली बावन अखरी, उन्होंने लिखी है। यह कहा जा सकता है कि पंद्रह तिथि? सात बार! और 'बावन अखरी? जोगेसुरीबानी की परपरा हो सकती है और नाथपथ से उसका विशेष प्रचार भी हो सकता है किंतु एक बात है। कबीर की “पद्रह थिती? सात बार! के समानातर गोरख- बानी में “पद्रह तिथि! ओर ५सप्तवारः की रचना तो हमे मिलती है कितु बावन अ्रखरी? की रचना प्राप्त नही होती | बावन अखरी? की परंपरा कौ सभावना हो सकती है क्योंकि जायसी जैसे सूफी सिद्धांत से प्रभावित कवि ने 'अखरावट? की रचना में वर्णुमाला के बावन शअक्ष्रो,

क्रबीर सांसा दूरि करु पुस्तक देह बिहाई !

बावन अखर सोधि के हरि चरिनी चितु लाइ |! सलोकु १७३

*बिदआ परउ बादु नहीं जानऊ |

हरि गुन कथत सुनत बउरानो ॥रागु बिलाबलु

१० संत कबीर

के सकेत लिखें है। फिर भी 'बावन अखरी? से कबीर मे अश्षर-श्ञान की सभावना हम मान सकते हैं| हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि कबीर की गति साहित्य-शासत्र में अधिक नही थी यदि वे साहित्य शास्त्र से परिचित होते तो अपनी भाषी का श्रृंगार अवश्य करते और उसका अ्रक्खडपन निश्चय दूर कर देते। उनकी भाषा में साहित्यगत संस्कार नहीं हैं और वह जन-समुदाय की भाषा का अपरिष्कृत रूप ही लिए. हुए है। छदों मे भी मात्रा ओर वर्ण की अनेक भूले हैं। एक ही विचार अनेक बार दुहराया गया है। रूपक और उदाहरण साहित्य की परपरा से नहीं लिए गए, वे जीवन की घटनाओं के प्रतिबिंब हैं। इस प्रकार उनकी भाषा और भाव राशि साहित्य क्षेत्र की परिधि से बाहर ही है। फिर जब उन्होने एक बार भी'लिखने? की बात नहीं कही तब उनकी वाणी का वास्तविक रूप प्राप्त होना कठिन ही नहीं, असम्मव है।

कबीर के नाम से आज बहुत से अंथ हमारे सामने है | वे स्वय कबीर द्वारा रचित हैं अथवा उनके शिष्यो द्वारा, यह भी संदिग्ध है |

इतनी बात तो निश्चित है कि वे एक ही लेखक के खोज रिपोर्ट द्वारा नहीं लिखे गए!। उनमे शैली की बहुत भिन्नता है यद्यपि सभी शैलियो की भाषा में

साहित्यिकता बहुत थोडी है। उसका कारण यह है कि इन सभी ग्रथों के लेखक सत ही थे, कवि नहीं। उनका दृष्टिकोश धार्मिक सिद्धातों का प्रचार था, साहित्य-शैलियो का निर्माण नहीं।

नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस की खोज रिपोट के अनुसार सन्‌ १६०१ से लेकर सन्‌ १६९२२ की खोज में कबीर द्वारा रचित ८५ प्रतियो की सूची मिलती है | उनका विवरण इस प्रकार है :-- सन्‌ ग्रन्थ नाम पद्य संख्या विवरण -१६०१ कबीर जी की साखी ६२४ शान विषयक पद्म

रास सार १९०. राम महिमा

मस्तावना

सन्‌ अंथ नाम पद्य-सं॑ख्या १६०२ १९ कबीर जी के पद. १५१२ कबीर जी की रमेनी कबीर जी की साखियाँ' ... कबीर जी की साखी

पू कबीर जी के दोहे ४३२

कबीर जी के पद मा कबीर जी के कृत राग सोरठ का पद

१६०६ अमर मूल 52६ अनुराग सागर उग्म ज्ञान मूल सिद्धात ... कबीर परिचय की साखी ... पू ब्रह्म निरूपण शब्दावली

हइंसमुक्तावली 3०28 ३६ ०७-८:-५९ ०६ अठपहरा २०

अनुराग सागर १५६०

हे अमर मूल १श्प्र्प,

उग्रगीता १०२५५ है]

रै है

विवरण पद

इसकी एक प्रति और भी है | नीति और धर्म विषय के दोहे

मीरा, कबीर और नाम- देव जी के पट

इसकी एक अति ओर भी हे।

आठ प्रहर के देनिक ग्राचार

अआझाध्यात्मिक विचार अध्यात्म ज्ञान कबीर और धमरूंदास में

ज्ञान-संवाद

१२

सन््‌

सत कबीर

पंथ नाम

एथ-संख्या

विवरण

कबीर और धर्मदास की गोष्ठी २६ कबीर और धर्मदास में

& कबीर परिचय की साखी कबीरबानी निर्भय ज्ञान

£ ब्रह्म निरूपण १० रमेनी ११ रामरता

१२ शब्द वंशावली १३ शब्दावली

१४ संत कबीर बदी छोर १५ हिडोरा वा रेखता

१६ हंसमुक्तावली १७ ज्ञानस्तोत्र

श्प्: कबीर को बानी

१६ ०६-१६१०-१६

अचक्ष रखड की रमेनी अज्ञुर भेद की रमैनी अगाध मंगल

अनुराग सागर

अलिफ़ नामा (१)

जश्ञान-धवाद

इे३े५ , - ८०० धमंदास को उपदेश ७०० धर्मदा से कबीर का आत्म-चरित्र बर्णन ३०० ब्रह्म का स्वरूप वर्णन ४प्य सिद्धात विषयक पद्म ६३ रामोचारण से आत्म

रक्षा ८७ आध्यात्मिक तत्व १८४५० ? ? इसकी एक प्रति और है।

आध्यात्मिक सिद्धांत २१ आध्यात्मिक विषय पर गीत बढ 06 २५, आध्यात्मिक सिद्धांत ओर ब्रह्म निरूपण श्ध्र्प्‌

६१ आध्यात्मिक उपदेश ६० आध्यात्मिक ज्ञान ३४ योग साधन

१४५०४ आध्यात्मिक उपदेश ३४ 9)

प्रस्तावना अंथ नाम पद्म संख्या अलिफ नामा (२) ४१ अज॑नामा कबीर का २० आरती कबीर कृत ६० £ कबीर अष्टक २३ १० कबीर गोरख की शुष्टि १६७०

११ कब्चीर जी की साखी १६०० १२५ कबीर साहब को बानी. ३८३०

१३ कर्मकांड की रमेनी व्य्८ १४ गोष्ठी गोरख कबीर की ६५, १५ चोका पर की रमैनी ४१ १६ चोतीसा कबीर का १७ छुप्पय कबीर का २६ १८ जन्मबोघ २५० १६ तीसा जंत्र दर २० नाम माहात्म्य (१) ३२२३ २१ नाम माहात्म्य (२) शे६प २२ पिया पिछानबे को अंग. ४० २३ पुकार कबीर कृत श्र २४ बूलख की पैज श्श्छ २५ बारामासी ५० २६ बीजक कबीर ५७० २७ भक्ति का अ्रग ३४ श्८ मुहम्मद बोध ४४० २६ माषों घड' चौतीसा 00३

१३

विवरण आध्यात्मिक उपदेश ग्रार्थना आरती-विधि ब्रह्म-प्रशंसा कबीर गो रख सवाद ग्ध्यात्म ज्ञान

95

97 गोरख कबीर सवाद धामिक सिद्धांत

हि भक्तो के विषय में आध्यात्मिक ज्ञान २) नाम महिमा १9 अध्यात्म शान ब्रह्म-स्त॒ति कबीर ओर शाह बलख संवाद अध्यात्म ज्ञान 27 भक्ति का प्रभाव कबीर और मुहम्मद संवाद अध्यात्मज्ञान, भक्ति ओर सद्युण

१४

सन्‌

संत कबीर

पंथ नाम पद्य संख्या विचरण ३० मगल शब्द १०३ ब्रह्म प्रशसा ३१ रेखता १६७०. गुरु-महिमा ओर अध्यात्म ज्ञान ३२ शब्द अलह ठुक १६४. आध्यात्मिक सिद्धांत ३३ शब्द राग काफ़ी राग फगुवा २३० हे ३४ शब्द रागगौरी और रागभैरव १०४ आध्यात्मिक सिद्धांत इप सतनामा या सत कबीर ७२ ३६ सतसग कौ अंग ३० सतऊंग महिमा ३७ साध को अंग ४७ भक्त और भक्ति-निरूपण ३८ सतसग को अ्रग ३०. सतसग महिमा ३६ स्वाँस गंजार १४८६७. ग्राणायास ४० सानगुदडी ३० आध्यात्मिक सिद्धांत ४१ ज्ञानचोंतीसा ११५ रु ४२ ज्ञानसरोदय २०० सगीत ओर अध्मात्मसिद्धांत ४ई शानसबोध ४७० संत महिमा ४४ शाीनसागर १६८० अध्यात्म ज्ञान १६१७-१६ १८-१६ १६ कायापंजी ८०. योग विचारमाला ६०० उपदेश विवेकसागर ३२५ उपदेश और गीत १६२०-१६२१-१६२२ बीजक १४८० भक्ति, शान सुरति संवाद ३०० ब्रह्मन्सतुति -

ज्ञानचोतीसः १३० ज्ञान ओर भक्ति

प्रस्तावना श्पू्‌

सन्‌ प्र॑थ नाम पद्य संख्या विवरण १६२३-१६२४-१६२५, अखरावती २६२९ एकदेव पूजा और गुरु विश्वास अनुराग सागर १४४०. ज्ञानोपदेश उग्र गीता १०५५४ विविध योग एकोतरी सुमिरन ६० 3“कार महिमा ४, कबीर देवदूत गोष्ठी १८० गुरु महिमा कु भावली ६१७ शानोपदेश' गरुड बोध ४४० सृष्टि की कथा तिरजा की साषी ३५२ देह, प्रकृति, ब्रह्म, निरूपण द्वादश शब्द १५४ आत्म निरूपण १० बीजक १७५४० अध्यात्म ज्ञान ११ मनुष्य विचार ५२८ साखी फुटकर रेखता १२ यश समाधि ३६० उपदेश १३ रमैनी २६४ धर्म सबंधी विचार १४ सुमिरण साठिका २२५ मंत्र-विवरण १५ ज्ञान तिलक १०६ ज्ञानोपदेश १६ ज्ञान संबोध ४४६ १६२६-१६२९७-१६ २८ (अप्रकाशित) १६२६-१६ ००१६३ (ना०७ प्र७ प० भाग २०; अंक से) अखरावत “-गुरूु माहतय, शब्द माहात्म्य, नाम माहात्म्य, शान वर्णन कबीर बीजक --अंह्विद्या, माया एवं जीव विष- बीजक रमैनी यक भजन कबीर गोरख गोष्ठी --कंबीर गौरख का आध्यात्मिक

विषय पर बाद-विवाद

१५

कन्नीर जी के पद और साषियाँ

एू कबीर जी के वचन

कबीर सुरति योग

कुरम्हावली भूलना दत्तात्रय गोष्ठी

१० रमैनी “११ रेखता १२ बशिष्ठ गोष्ठी

१३ साधु माहात्म्य १४ सुरति शब्द संवाद १५ स्वांस गु जार

१६ ज्ञानस्थित ग्रंथ

कि

संत कबीर

-मायादि की निस्सारता और

ब्रह्मशान सबधी पद

>ल्‍्थात्मोपदेश'

--कृष्ण और युधिष्ठिर के सवाद

में मक्त का रूप

--सष्टि की कथा

--कंठीमाला आदि आडंबर खडन

--दत्ताजेय की साधनादि क्रियाओ का खडन

--उपदेश

रा 99

--जीव, माया, बह्म के सबंध में बशिष्ठ की अनभिज्षता ओर निज मत का उपदेश

--साधु ओर गुरू की महत्ता

--ब्रह्म ज्ञान

--श्वासों का वर्णन और साघु- उपदेश

नाम माहात्म्य, अजपा जाप तथा मंत्र

यदि इन सभी प्रतियो के नामओऔर विषय पर दृष्टि डाली जाय तो ज्ञात होगा कि कुछ प्रथ भिन्न नाम की प्रतियो में हैं ओर कुछ अन्य बड़े अ्रथों के भाग मात्र है | यथा 'सतसग को अग? (३६) या “साध -को अज्ञ” (३७) निश्चय ही कबीर जी के पद या कबीर जी की खाख्री के अन्जञ हैं | यदि स्वतंत्र ग्रन्थो की गिनती की जाय तो वे अधिक से अधिक ७४ होंगे | किंतु क्या ये सभी ग्रंथ प्रामाणिक है कुछ अंथ तो ऐसे हैँ जो केवल काल्पनिक कथावस्तु के आधार पर हैं, जैसे बलख की

प्रस्तावना १७

पैज, मुहम्मद बोधञ थवा कबीर गोरप की गु्टि। शाह बलख, मुहम्मद ओर गोरखनाथ से कभी कबीर का सवाद हुआ ही होगा क्योकि ये सब कबीर के पूववर्ती हैं| कबीरपंथी साधुओं ने कबीर साहब का महत्व बढ़ाने के लिए उनकी प्रशसा में ये अंथ लिख दिये होगे। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट में कुछ ही ग्रथो का लिपि-काल दिया गया है। इसके अनुसार सबसे पुराने हस्तलिखित ग्रथ निम्नलिखित हैं;-- कबीर जी के पद कबीर जी की साखी कबीर जी की रमैनी कबीर जी को कृत इन ग्रंथो का लिपिकाल विक्रम सवत्‌ १६४६ दिया गया है और रचना-काल सवत्‌ १६०० | कबीर १६०० तक जीवित नहीं रहे यह निविवाद है | अतः ये प्रंथ उनके द्वारा नही लिखे जोधपुर राज्य. जा सकते; उनके शिष्यो द्वारा इनकी रचना कही पुस्तकालय जा सकती है | ये सभी ग्रंथ जोधपुर के राज्य-पुस्त- के भथ कालय में सुरक्षित कहे गए हैं। मैंने जोधपुर के राज्य-पुस्कालय से कबीर सबंधी सभी ग्रथों की प्रतिलिपियाँ मेंगवाई | वहाँ से मुझे हस्तलिखित प्रतियाँ प्राप्त हुईं जो निम्नलिखित हैं :--

कबीर गोरष युष्ध (पत्र सख्या ७) कबीर जी की मात्रा ( ,, १) कबीर परिचय ( 9५ र*ै३) कत्ीर रदास सवाद ( ,, २) कबीर साखी (( ५, ५) कबीर धम्माल (६. 5४ ££) कबीर पद ( » २४) ८: कबीर साखी ( 9 ४)

इन प्रतियों में खोज रिपोर्ट द्वारा निर्दिष्ट “कबीर जी को क़ृतः और “कबीर जी की रमैनी? नही हैं | “कबीर जी की साखी” और “कबीर जी र्‌

श्थ सत कबीर

के पद! अवश्य है। कितु जोधपुर राज्य पुस्तकालय से प्राप्त हुए एक ग्रथ को छोडकर किसी भी ग्रथ में लिपिकाल नहीं दिया गया है। केवल “कबीर गोरष गुष्ट! का काल सबवत्‌ १७६५ दिया गया है। अतः खोज रिपोर्ट का प्रमाण स॑दिग्व और अविश्वसनीय है। मैंने कब्चीर सबंधी अ्रनेक हस्तलिखित ग्रथ देखे हैं कितु उनके शुद्ध रूप के सबध में मुझे विश्वास कम हुआ है। इसके अनेक कारण हैं :--- १, कबीर-पथ के अनुयायी प्रमुखतः समाज की निम्नश्रेणी के होने के कारण साहित्य और भाषा के ज्ञान में अत्यंत अनेक हस्तलिखित साधारण होगे। अतः हस्तलिपि-लेखन में उनसे बहुत सी भूले हो सकती है | २, कबीर का काव्य अधिकतर मौखिक ही रहा वह शुरु के मुख में अधिक प्रभावशाली है, पुस्तक में नहीं। अतः कबीरपथ मे पुस्तक का महत्व गुरु से अ्रपेकज्ञाकृत कम है | सदूगुर का उपदेश “करण्ु-विभू- ' घ॒ण? के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये पुस्तक-पाठ से नहीं। इसलिए, पुस्तक-पाठ सदेव अप्रधान समझा गया है। जब गुरू का उपदेश प्रधान हो गया तब परंपरागत पाठ में परिवतन होने की आशंका यथेष्ट हो जाती है [ प्रत्येक गुरुउस पाठ में अपनी स्मरण- शक्ति के अनुसार कम या अधिक परिवर्तन कर सकता है | फिर गुरु हो जाने पर तो अपनी ओर से घटाने और बढ़ाने का अधिकार भी वह रख सकता है। इस प्रकार प्रथम पाठ से यह उपदेश' कितना दूर होगा, यह अनुमान किया जा सकता है। फिर युग़ो के प्रवाह में सिद्धंतो की रूप-रेखा में भी भिन्नता सकती है। नये सिर्दधांतो के बीच में पडकर कविता की दिशा दूसरी ही हो जाती है कबीर के सिद्धांत जनता में व्यापक रूप से प्रचलित थे | उनके विचार भिन्न-मिन्न प्रांतो में मिन्न-भिन्न वर्ग के लोगो मे प्रचारित होते रहे | अ्रतः प्रांतीयता के दृष्टिकोश से अथवा अशिक्षित जनता के

मस्तावना रे

संपक में आने से उनके पदो और साखियो में बहुत मिन्नता सकती है| कबीर ग्रंथावली का पंजाबीपन इस बात का प्रमाण है। भाषा ओर भावों को इस मिन्नता से बचाने के लिए. कभी कोई सध और सगीति की आयोजना नही हुईं | कभी कोई ऐसा प्रयत्न हुआ जिससे भिन्न-भिन्न प्रांतो मं प्रचलित वाणी को एक रूप दे दिया जाता जैसा कि बौद्ध या जैन धर्मों में हुआ करता था योग्य और मान्य आचायों के विचार-विनिमय अथवा परामर्श से जो काव्य मे एकरूपता आती वह प्रत्षित अथवा भूले हुए सिद्धातो को व्यवस्थित कर सकती | कितु इस प्रकार के प्रयत्न कबीरपंथ में कभी नही हुए.

४. हस्तलिखित ग्रथो मे जो पक्तियाँ लिखी जाती हैं वे एक पूरी लकीर की लंबाई में कभी पूर्ण होती हैं, कमी अपूर्ण। यहाँ तक कि शब्द भी टूट जाते हैं। प्रतिलिपि करने मे ऐसे स्थलो पर अ्रनेक भूले हो जाती हैं| पंक्तियो मे शब्द भी आपस मे जड़े रहते हैं ओर वे शब्द स्पष्टतः आँखो के सामने रहने से कमकरभी प्रतिलिपियों में छूट जाते है। ऐसे प्रसग अनेक बार हस्त-लिखित प्रतियो मे पाये जाते हैं | इस संबंध में कबीर ग्रथावली से एक उदाहरण दिया जा चुका है। एक पूरा शब्द जब पंक्ति के अत में द्वट जाता है तब कभी-कभी उसे दूसरी पक्ति मे जोड़ने से भश्रांति हो जाती है | विराम चिह्ो के अभाव में यह कठिनाई और भी बढ़ जाती है

४.. कही-कही अशुद्ध शब्द या चरण के नीचे बिंदु. रखकर उसे छोडने का धंकेत होता है या उस पर हरताल लगा दी जाती है किंठु प्रतिलिपिकार उस बिंदु को समझकर अथवा हरताल के हलके पड़ जाने से अशुद्ध शब्द या चरण की प्रतिलिपि कर ही लेता है। वह हाशिये में दिए हुए छोड़े गये शब्दो को पक्तियों मे जोड़ भी लेता है |

६, कही-कही पत्र सख्या डालने से पदो के क्रम में भी बहुत अड़चन पड जाती हैं| प्रष्ठों के बजाय पन्नो पर ही सख्या लिखी जाती है | अतः एक पत्र की संख्या मिट जाने पर दूसरा पत्र अपने संदर्भ

२७० पंत कबीर

की सूचना नहीं*दे सकता जब तक कि उसमें कोई टूटा हुआ शब्द या चरण हो | इस कठिनाई से वह पत्र ग्रथ मे कहाँ जोडा जाय यह एक प्रश्न हो जाता है यदि दो-तीन पन्नो के सबंध में ऐसी कठिनाई हो गई तो सारा हृस्तलिखित ग्रंथ ही क्रम-विहीन हो जाता है। उदाहरण के लिए नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित कबीर अंथावली मे गोकल नाइक बीठुला मेरो मन लागौ तोहि रे? (पद 9) के बाद “अब में पाइबी रे ब्रह्म गियान! (पद ६) है कितु जोधपुर-राज्य पुस्तकालय की “अथ कबीर जी के पद? में पद के बाद “मन रे मन ही उलदि समाना? पद है जो कबीर ग्रंथावली में ववाँ पद है। अनु- मान द्ोता है कि जिस मूल प्रति से जोधपुर-राज्य पुस्तकालय की प्रतिलिपि बनाई गई होगी, उसका एक पत्र खो गया होगा |

७, कबीर के काव्य को पग्रतियाँ स्वय कवि द्वारा अथवा किसी संस्था द्वारा लिखी जाकर भिन्न-भिन्न स्थानों से तथा भिन्न भिन्न यरुगो मे की गई हैं। छपाई के अभाव मे प्रामाणिक प्रतियो की प्रति- लिपियों में मी अनेक अ्रशुद्धियाँ श्रा जाती हैं | किसी प्रति की जितनी ही अ्रधिक प्रतिलिपियाँ होगी उसमे अशुद्वियो का अनुपात उतना ही अधिक बढ़ता जावेगा फिर बडी रचना होने के कारण एक ही प्रति की प्रतिलिपियों मे अनेक व्यक्तियों का हाथ हो सकता है। वहाँ भूले झऔर भी अधिक हा सकती हैं। समानता का अभाव तोहोही जायगा | फिर यदि लिपिकार अ्रहभाव से युक्त होगा तो वह पाठ को अपनी ओर से शुद्ध भी करे लेगा।

भाषा-विज्ञान के अनुसार अनेक पीढ़ियो में उच्चारण-भेद हो जाना स्वाभाविक है | अतः जब्न तक मूल प्रति या उससे की गई प्रामाणिक प्रति मिले तब तक पाठ के संबंध मे पूण आश्वस्त शेना अत्यंत कठिन है |

६. किसी रचना के मिन्न-मिन्न पाठों में ठीक पाठ चुनने का कार्य यदि किसी गुरु के द्वारा किया भी गया तो उसके चुनाव की उपयुक्तता

प्रस्तावना जे

भी सदिग्ध ही है। और यदि चुना हुआ पाठ मल पाठ से भिन्न है तो फिर मूल पाठ आगे चलकर सदैव के लिए ही लोप हो जाता है | इस प्रकार प्रतिलिपिकारों क्लोअशानता, समय का अत्याचार, गुरुओं की अहमन्यता, छपाई के अभाव में हस्तलेखन की कठि- नाइयाँ, कविता के भिन्न-भिन्न प्रांतो में व्यापक और मौखिक प्रचार ने कबीर के काव्य को मूल से कितना विक्ृत किया होगा इसका अनु- मान हम सरलता से कर सकते है | जब तक किसी प्राचीनतम प्रति का अन्य समकालीन प्रतियो से मिलान कर शुद्ध पाठ प्रस्तुत किया जाय तम्र तक हम कबीर के शुद्ध पाठ के संबंध मे सतुष्ट नहीं हो सकते | उपयुक्त समीक्षा को दृष्टि में रखते हुए कबीर की रचना का प्रामाणिक पाठ प्रास करना कठिन है। भेरे सामने अधिक से अधिक विश्वसनीय पाठ श्री आदि गुरु अथ साहब फा ज्ञात श्री गुरु अन्थ साहब होता है| श्रो ग्रथ साइब का सकलन पाँचवें गुरु श्री अजनदेव ने सन्‌ १६०४ (संवत्‌ १६६१) में किया था। सन्‌ १६०४ का यह पाठ अत्यंत प्रामाणिक है | इसका कारण यह है कि आदि श्री गुरु ग्रथ सिक्‍खो का धर्मिक ग्रथ है। यह ग्रंथ सिक्‍खो द्वारा देव स्वरूप? पूज्य होने के कारण अपने रूप में अक्षुर्ण हैं ओर इसके पाठ को स्पश करने का साहस किसी को नहीं हो सका | यहाँ तक कि एक-एक मात्रा को मंत्रशक्ति से युक्त समझकर उसे पूववत्‌ ही लिखने ओर छापने का क्रम चला आया है| यह ग्रथ गुरुमुखी लिपि मे है,। जब गुरुपुखी लिपि से यह देवनागरी लिपि मे छापा गया तब “शब्द के स्थान शब्दः रूप में ही इसका रूपान्तर हुआ क्योकि सिक्‍्ख धर्म के अनुयायियो मे विश्वास है कि महान्‌ पुरुषों की तरफ से जो अक्षरों के जोड-तोड मत्र रूप दिव्य वाणी में हुआ करते हैं, उनके मिलाप में कोई अमोघ शक्ती होती है जिसको स्वासाधारण हम लोग नहीं समझ सकते | परंतु उनके पठन-पाठन में यथावथ्य उच्चारन से ही पूर् सिद्ध प्रात्त हे सकती है। इसके सिवाय यह भी है कि भ्रीगुरु

श्श्‌ सत कबीर

ग्रथ साहिब जी के प्रतिशत ८० शब्द ऐसे हैं जो हिंदी पाठक ठीक- ठीक समझ सकते हैं इस विचार के अनुसार ही यह हिंदी बीड गुर- गुखी लिखत अनुसार ही रखी गई «है अर्थात्‌ केवल गुरमुखी अक्षरों के स्थान हिंदी ( देवनागरी ) अक्षर ही क्लिये गये हैं|? (प्रकाशक की विनय पृष्ठ १, भाई मोहनसिंह वैद्य) ।*