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सर्वोदिय साहित्य माला : २०२ वां ग्रंथ

बापू

लेखक घनश्यामदास बिड़ला

उस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्‍ली

अक्तूबर ९४० ३००० फरवरी १९४१ ५००० भवबर १९४ ५०००

मूल्य बारह आना प्रकाशक मुद्रक मातेण्ड उपाध्याय, मंत्री, देवीग्रसाद शर्मा सस्ता साहित्य मण्डल हन्डुस्तान टाइम्स प्रेस

नई दिल्‍ली नई दिल्‍ली

आदि वचन

यदि भगवद्गीताके बारेमे लिखना आसान हो, तो गाधीजी के बारेस भी लिखना आसान होसकण हैँ, क्योकि भगवद्गीता पर लिखा हआ भाष्य केवल गीता-शाष्य होगा, बल्कि भाष्पकार के जीवनका वह दर्षण भी होगा जैसे गीतारहस्य लोकमान्य के जीवनका दर्पण है, बसे ही अवामक्तियोग गाधीजीके जीवन का दर्पण है ठीक उसी तरह गाधीजीके जीवतको समीक्षा करने में लेखक अपने जीवनका चिऋ्ूर भी उसी समीक्षाके दर्पणस खीच लेना हे

एक बात ओऔ+ जैसे गीता सथवेः लिए एक खुली पुस्तक है उसी तरह गाधीजीका जीवन भी एक खुली पुस्तक कहा जा सकता है। गीताकों बडे-बड़े विद्वान तो पढते ही हे, हजारों श्रद्धालु लोग भी, जो प्राय निरक्षर होते ह, उसे फ्ेससे पढले हे गाधीजी के जीवनको--विशेषत उनकी आत्मकथाकी--भी यही बात हैं जसे गीता सबके कामका चीज ह, वेसे गाधीजी भी सबके कामऊे हैं। गीतासे बड़े विद्वान अधिक लाभ उठाते या निरक्षर कित श्रद्वाल्‌ भक्त अधिक उठाते है, यह विचारने योग्य प्रउन है यही बात गाधोजीके विषप्रसे की हें! उसके हीवनको--उनके सिद्धातोंको--समझनेके लिए तो विद्वत्ताकी आवश्यकता है, लेखनशक्तिकी उसके लिए तो हृदय चाहिए मझे पता नहीं, भी घनव्यासदासजीका नाम विद्वानों या लेखकोमे।ं गिना जाता है या नहीं, कितु धनिकोमे तो पिना ही जाता परंतु उन्होंने धनकी सायासे अलिप्त रहने और अपने हृदय को स्फटित्र-सा

7

निर्मल या बुद्धि एव वाणीकों सत्यपुत रखने का यथासाध्य प्रयत्न किया है और उस हृदय, बृद्धि और वाणीसे की गई यह समीक्षा, बिडलाजी आज अच्छे विद्वान या लेखक माने जाते हो तो भी, समीक्षाकी उत्तम पुस्तकोर्में स्थान पायेगी और हिंदी के उत्कृष्ट लेखकोर्मे उनकी गणना करायेगी

यो तो श्री घनव्यागंटारजोकी लेखन-ाबितका ण्रिव्य जितना सझे हे उतना हिंदो-जअगतकों शायद होगा। को कई सालसे उनके सम्पर्कर्म हू, उनके हिंदी भाषासे लिखे हरए पत्र मुझे सीधो-सादी, नपी-तुली >ोर सारगाभित शैलीके अनपम नमूने माहल+ हुए हूं। ओर जबसे उस शेली पर मुग्धघ हुआ हूं, तबसे सोचता हँ कि बिडलाजी कुछ लिखते क्यों नहीं” मुझे बडा जानढ होता हैं कि इस पुस्तक उसी आक/क शेलीका पबन्चिय शणिलता जिसका कि उनके पजोसे मिल्‍लसा! था

गाधीजीके सम्पर्कम आये डिश्लाजीको २० बए शोगये है एस पच्छीस सालके सब्पके बारेमे वह लिखते +-

“जबसे मुझे गाधीज्गेका प्रथम दर्शन हुआ, तबसे मेरा-उनशा अविच्छिन्न सबध जारी ह। पहले कुछ साल समाठोच्रक होकर उनके पास जाता था, उनके छिद्र दृढ्नेकी कोशिश करता था, क्योकि नौजवानोके आराध्य लोकमान्यकोा ह्यातिका इसकी ख्याति टक्कर लगाने लग गई थी, जो म॒झे रुचिकर नहीं मालम होता था पर ज्यो-ज्यो छिद्र २ढनेके दिए में गहरा उतरा व्योन्‍त्यो मुझे निराश होना परत ओर कुछ अरसेसे समालोणककी अबात्ति आदर परिणत होगई जीर फिर आदरने भक्तिका खूप धारण कर लिया बात यह कि गाधीजीका स्वभाव ही ऐसा हू कि कोई विरला ही उनके सझभसे बिना प्रभावावित हुए छूटता है ।" इतना में जानता हु कि घनश्यामदासजी बिडला तो नहीं छूटे बह

हु

लिखते है . गाधोजीसे मेरा पच्चीस सालका संसर्ग रहा है मेने अत्यत निकटसे, सुक्ष्मदर्शकयत्रकी भाति, उनका अध्ययन किया है समालोचक होकर छिद्रावेषण किया हैं पर मेने उन्हे कभी सोते नही पाया ।” यह वचन गाधीजीके बारेस तो सत्य हे ही, पर बिश्लाजीके बारेमे भी काफी अझमें सत्य हे। क्योकि गाधीजी सिर्फ खुद ही सोते हे, बल्कि जो उनके प्रभाव में आते हे उनको भी नहों सोने देते

यह पुस्तक इस जाग्रत अध्ययन, अनुभव और समालोचन- का एक सुदर फल है। उन्होने एक-एक छोटी-मोटी बातको लेकर गाधीजीके जीवनको देखनेका प्रयत्न किया है। गाघधीजीसे पहुलि- पहल भिलनेके बाद बिडलाजीने उनको एक पत्र लिखा जवाब में एक पोस्टकार्ड आया, 'जिससें पैसे की किफायत तो थी ही, पर भाषा की भी काफी किफायलत थी ।॥' बात तो सासली- सी है, परन्तु उसमेंसे गाधोजीके जीवनकी एक कुजी उन्हे मिल जाती हैं “पता नही, कितने स्लौजवानों पर गाधीजी ने इस तरह छाप शाली होगी, क्वितनोको उलझनमें डाला होगा, दितनोके लिए वह कुतृहलकी सामग्री बसे होगे ! पर १९१५ में जिस वरह वह लोगोके लिए पहेली थे, बंसे ही आज भी ह, ।” यह महा हैं, पर इस पुस्तकरू हम देखते हे कि उनके जीवनकी कई पहे लिया घनदयामदासजी ने अच्छी तरह सुलझाई है

गीता इतला सीधा-सादा और ल्मेकप्रिय ग्रथ होने पर भी पहेलियोसे भरा हुआ हे इसी तरह गाधीजीका जीवन भी पहे- लियोसे भरा पडा €। कुछ रोज पहले रामकृष्ण-सठके एक स्वासी- जी यहा आये थे बडे सज्जन थे, गाधोजीके प्रति बडा आदर रखते थे और याधीजीकी ग्रामोद्योग-प्रवृत्ति अच्छी तरह समइ,नेके लिए और कातने-बुननेकी क्रिया सीखकर अपने समाज

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में उसका प्रचार करनेके लिए वह यहा आये थे। एक रोज मुझसे वह प्रछने लगे, “(गाधीजीके जीवनकी एकाग्रता देखकर में आइचर्य- चकित होता €, और उनवी ईश्वर-भ्रद्धा देखकर भी। क्या गाधोजी कभी भावावेश में आजाते हे ? क्‍या दिनमे किसी समय वह ध्यानावस्थिन होकर बेथ्ते हे ?” मेने कग़-- नहीं ।” उनके लिए यह बी पहेली धोगई के ऐसे कोई वाहय चिह्न ने होते हुए भी गाधीजी बठे भक्त है और योगी है गाधीजीके जीवन में ऐसी कई पहेलिया हैं उसमेंसे अनेक पटेलिगोक्रों हल करनेका सफल प्रयता इस पुस्तकसे किग्रा गया हूँ

एक उद्दाहरण लीजिए अहिसापे क्या सब वस्तुओकी रक्षा होसक्ती ? थह्ट प्रइत अक्सर उपस्थित किया जाता हैं इस प्रइनका कसी सदर भादामे बिश्छाजीने उत्तर दिया है:

“धन-मम्पत्ति-६प्रह, साल-जायदाद इत्यादि की रक्षा क्‍या अधिसमे होप्कती है ? हो भी सकती है आर नह/ भी जो लोग निजी उपयोगऊे लिए सब्र लेकर बठे है, सम्भव नहीं कि वे ग- नीतिके पात्र हो। ऑऑररखा यदि काणरताका दूसरा नाम नहीं, स्थें फिर सच्ची आऑहसा बह है जो अपने स्वाथके लिए सम्रद करना नहीं पिवाती अखििकरको लोसे कहा ऐसी हालतमें जहिलक को अपने लिए समह करनेकी या रक्षा करनेवी आवश्यकता ही नहीं होवो। योग-दक्षेम्रके झगड़े मे ज्ञायद ही ऑडिसाका पुजारों पड़े।

'नियगिलेम आत्मनान्‌ >+गीता ने यह घर्म अर्जुत्र जेसे गृहस्थ व्यक्ति का बताया यह तो +न्गासी का धर्म है--ऐसा गीता ने नहीं कहा गीता सवास्त नहीं, कर्म विखाती है, जो गहस्थ का धर्म है अहिसाबादी का भी झुद्ध धर्म उसे योग-क्षेप् के झगडे से दूर रहना सिखाता हु ! पर सग्रह करना ओर उतकी वक्षा करना स्व और पर' दोनो के छाभ के लिए होसकता है

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जो स्व के लिए सग्रह लेकर बेठे हे, वे ऑअऑहसा-धर्मकी पात्रता सम्पादन नही कर सकते | जो पर” के लिए सग्मह लेकर बेठ हे, वे गाधीजीके शब्दों में ट्रस्टी” है वे अनासक्त होकर योग-द्षे का अनुसरण कर सकते हे वे सशभ्नह रखते हुए भी ऑअहिसाबादी है, क्योकि उन्हे सग्रहमे कोई राम नहीं। धर्मके लिए जो सग्रह है, वह धर्म के लिए अनायास छोडा भी जासकता है और उसकी रक्षाका प्रइन हो तो वह तो धर्मंसे ही की जासकती हैँ, पापसे नही। इसके विपरीत जो छोग सप्रहमे आसकत हे, वे तो अहिसा- त्मक ही होसकते है, फिर ऑहसासे धनकी रक्षाका प्रइन हो उनके सबंधर्म उपयुक्त है पर यह सम्भव है कि ऐसे लोग हो, जो एर्णत' आह्सात्मक हो, जो सब तरहसे पात्र हो, ओर अपनी आत्मशक्ति द्वारा, यदि उन्हें ऐसा करना धर्म लगे तो, किसीके सपा भी ये रक्षा कर सके

“वर यहा कभी ते भूलना चाहिए कि अहिसक और हिसक मार्गकी कोर्ट तलना है ही नहीं। दोनोके लक्ष्य ही अलग-अछग हैं, जो काम हिसासे सफलतापूर्वक होसकता है--चाह वह सफ 5-7 क्षणिक ही क्यो हो --वढ़ अभहठिसासे हो हो नही सकता मसलन हम अह्सात्मक उपायोसे साम्राज्य नहीं फंछा सकते, क्सीक, देश नही छूट सकते। इटली ने अबीसी नियासें जो अपना साधाज्य-स्थापन किया, वह तो हिसात्मक उपाणो द्वारा ही हो- सकता था

“एमके याने यह हु कि ऑब्सासे हम धर्मको रक्षा कर सकते है, पापकी नहीं ऑर सप्रह यदि पाप का दूसरा नाम हे तो सग्रह- की भी नहीं। आहसामे जिले तब है, वे पापको रक्षा करना ही क्यो चाहेंगे अऑपटिसाका यह सर्यादित क्षेत्र यदि हम हृदयगम करलें, तो इससे बहुत-सो ७काओका समाधान अपनेआप हो-

जायगा बात यह हूँ कि जिस चोजकी हम रक्षा करना चाहते हैँ बहू यदि धर्म हे, तब तो अहिसात्मक विधियोसे विपक्षीका हम सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकते हे और यदि यह पाप हैं, तो हमें स्वय उसे त्याग देना चाहिए, और ऐसी हालत में प्रतिकार का प्रदन ही नहीं रहता

“यह निर्णय फिर भी हमारे लिए बाकी रह जाता है कि “घर्म क्या है, अधर्म क्‍या है ?” पर धर्माधर्मके निर्णय सत्य- के अनुयाथीकों कहा कठिनता हुई है ?

जिन खोजो तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, ही वोरी दूँदन गई, रटी किनारे उैंठ |

“असल बात तो यह है कि जब हम धर्मों नहीं, पापकी ही रक्षा करना चाहते है, और चकि अहिसासे पापकी रक्षा नहीं होसकती, तब आहसाके गुण-प्रभावमे हसे शका होती है और

अमेक ल्क-बवितर्क उपस्थित होते हैँ ।”

इसी तरह जितने प्रधन बिडलाजीने उठाये हुं उन सबकी चर्चा सक्षम अवलोकन और चितन से भरी हुई है। उनके धर्म- चितन और धर्मग्रथोके अध्ययन का तो मुझे तनिक भी खयाल नही था। इस पुस्तकसे उसका पर्याप्त परिचय मिलता हे गीता के कुछ इल्शेक जो कही-कहीं उन्होने उद्धुत किये हे, उनका रहस्य खोलनेम उन्होंने कितनी मौलिकता दिखाई है !

बिडलाजीकी किफायती और चुभ जानेवाली शलीके तो हमको स्थान-स्थानपर प्रमाण मिलते है “असलमें तो शुद्ध मनुष्य स्वय ही शस्त्र है और स्वय ही उसका चालक है ('' “गदे कपरूकी गदगीकी यदि हम रक्षा करना चाहते है तो पानी और साबुनका क्या कास ? वहा तो कीचडकी जरूरत हैँ ।” “आकाशवाणी अन्य चीजोकी तरह पात्र ही सुन सकता है सूर्यका प्रतिबिब शीशे

पर ही पडेगा, पत्थरपर नहीं ।” “सरकारने हमें शाति दी, रक्षा दी, परतत्रता दी, नुमाइदे भरी सी वही नियुक्त क्यो करे ? “स्रजसे पूछो कि आप सर्दी में दक्षिणायल ओर गर्मी सें उत्तराणण क्यो होजाते हे, तो कोई यथार्थ उत्तर मिलिगा ? सर्दी-गर्सी दक्षि- णायन-उत्तरायण के कारण होती है, कि दक्षिणायन-उत्तरायण सर्दी-गर्मो के कारण याधीजी की दलीलें भी वेसी ही है वे निर्णय के कारण बनती हे, कि तिर्णय उनके कारण बनता है ।”

आखिरो तुलना कितनी मनोहर, कितनी सौलिक और कितनी अयंपूर्ण है ! गाथीजीके जीवनके कई कार्यों पर इस दृष्टि से कितना प्रकाश पडता हूं

गाधीजीकी आत्ण दा्ण हम सब पढ़ चुके है, परतु उसके उुछ भागोपर श्री ८घनत्या- शसजीने जैसा भाष्य किया है वैसा हमसेंसे ज्ञायद हो कोई करते हो गाधीजीको मारने के लिए दक्षिण अफ्रीकामे गोरे लोयगोकी भीड टूट पन्‍्ती है। मुश्किल से गाधीजी उससे बचते बिउल्ाजीकोी उस दृश्य का विचार करते ही दिल्लीके लक्ष्मानागप्रण-मदिरके उद्धाटनके समय को भीड़ याद आजाती है ओ्पैर दोनों दक्योका सदर समस्वय करके अपनी दातका समर्थन करते हे

साधोजीके उपठास, उनकी ईश्वर-श्रद्धा, उनके सत्याग्रह आदि कई प्रइतोपर, उनके जीवनके अनेक प्रसंग लेकर उसकी गहरी छानबीन करके, उन्होने बडा सुदर प्रकाश डाला है

उनकी समझ, उनकी दृष्टि इतनी सच्ची है कि कही-कही उनका स्पष्टोकरण गाधोजीके स्पष्टीकरणकी याद दिलाता हैं। यह पुस्तक तो लिखो गई थी कोई तीन महीने पहले, लेकिन उस समय उन्होने आहिसक सेनापति और आहसक सेनाके बारे में जो- कुछ लिखा था वह मानो वैसा ही है जेसा अभी कुछ दिन पहले

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गाधीजीने हरिजन'में लिखा था

“ग्रह आशा नही की जाती कि समाजका हर मनुष्य पूर्ण अहिसक होगा। पर जहा सके फौजके बल पर शाति और सास्राश्यकी नींव डाली जाती है, वहा भी यह आजा नहीं की जाती कि हर मनुष्य युद्ध-कलामें निपुण होगा करोड़ो की बस्तोवाले मुल्ककों रक्षा के लिए कुछ थोई लाख मनृष्य काफो समझे जाते है। सोम एक मनुष्य यरि सिपाही हो तो पर्याप्त माना जाता हैं। फिर उन सिपा- हियोसे से री जो ऊपरी भणनायक होते ह, उन्हींकी नियुणता पर सारा व्यवहार चलता हूँ

“आज इग्लिस्तानसे कितने विदुण गणनाथक होगे, जो फोज के सचालनम अत्यन दक्ष पाने जाते है शाप्रद देस-बीस। पर बाकी जो लाखों को फोज है, उससे तो इतनी ही आज्ञा की जातो हूँ कि उसमे अपये अफसरोकी आज्ञा पर मरनेवी शक्ति हो। इसी उदाहरणके आधार पर हम एक अध्सिक फोजको भी कत्पना कर सकते हे अहिसात्मक फौज के जो गणनायक हा उनमें पूर्ण आन्मणुद्धि हो, जो अनुयागी हो ये भद्भालु हों, ओर दादे एनमे इतना तीक्ष्ण विवेक पर उनसे सल्य-जहिपाके लिए मरनेरी शक्षित हो इतना यदि हैँ तो काफी है ।”

सारी पुस्तक बिडलाजीकी ततस्पर्शी परोश्षग-शक्तिका सदर नमूना है। केवल एक स्थानयर मुझे ऐसा लगा कि वह जितनी दूर जाना चाहिए उतनी दूर नहीं गये। अहमा की समीक्षा करते हुए उन्होने एक अबाघ सत्य प्रतिपादित किया है--भनासक्त होकर, अरागहेष होकर, जनहितके लिए की गई सा अहिसा हैँ यह अबाध सत्य तो गीतामें है ही! पर उसपरसे बिडलाजीने जो अनुमान निकाला है, उसे शायद हो गाधोजी स्वीक।रेंगे। बिडलाजी कहते हे-- गाधीजो स्त्रय जीवन-मुक्त दक्षामें, चाहे वह दशा

क्षणिक-जब निर्णय किया जारहा हो उस घडी के लिए-ही क्यो हो, अहिसात्मक हिसा भी कर सकें, जेसे कि बछडेकी हहिसा, पर साधारण मनुष्यके लिए तो वह कर्म कौए के लिए हसकी नकल होगी ।“इसपर मे दो बातें कहना चाहता हु बछड़ेकी हिसा जीवन- मुक्त दशा में की गई हिसाका उदाहरण है ही नहीं थोड़े दिन पहले सेवाग्राम में एक पागल सियार आगाया था उसे मारने को गाधीजीने आज्ञा देदी थी, और वे मारनेवाले कोई अनासक्त जीवन-स॒वत नहीं थे वह आवश्यक और अनिवार्य हिसा थी, जितनी कि कृष्ि-कार्य में कीटादि की हिसा आवश्यक आर अनि- बार्य होजाती है हिसाके भी कई प्रकार हैँ बछडेकी हिसा का दूसरा प्रकार है। घुडदौडमें जिस घोडेका पेर टट जाता है या ऐसी चोट रूगती है कि जिसका इलज ही नहों है, और पशुके लिए जीना एक यत्रणा होजाता हैँ, उसे अग्रेंज लोग मार डालते हे वे प्रेमसे, अद्वेषसे मारते है, पर वे मरनेवाले कोई अनासक्त या जीवन-मृबत नहीं होते जिस हिसाको गोता ने विहित कहा है, बह हिसा अलौक्कि पुरुष ही कर सकता है--राम, कृष्ण कर सकते हे परग्तु राम अ,र कृष्ण, गाधीजीके अभिप्राय में, वहा ईच्वरवाचक हें गाधोजी अपनेको जीवन-मुकत नहीं मानते और वह और किसीफो भी सपूर्ण जीवन-मुक्त माननेके लिए लैयार हं ! सपूर्ण जोबन-मुक्त ईश्वर ही हेँ और यह गाधीजी की दृढ सान्‍्यता है कि “'हत्वाइपि इयाटलोकान्न हन्ति लिव>>ते” चचन भी ईइवर के लिए हो हैं इसलिए वह कहते हे--मनुष्य चाहे जितना बडा क्‍यों हो, चाहे जितना शुद्ध क्‍यों हो, ईश्वरका पद नही ले सकता और व्यापक जनहित के लिए भी उसे हिसा करनेका अधिकार है इस निर्णयमें से सत्याग्रह और उपवासकी उत्पत्ति हुई

इस एक स्थानकों छोड़कर बाकी पुस्तकमें मुझे कहीं कुछ भी नहीं खटका, बल्कि सारा विवेचन इतना तलस्पर्शों और सारा दर्शन इतना दोष-मुक्त मालूम हुआ है कि में पुस्तक को प्रूफके रूप में ही दो बार पढ़ गया, तथा और भी कई बार पढ़ तो भी मुझे थकान नहीं आयेगी मुझे आशा हैँ कि और पाठकोकी भी यही दश्ञा होगी और, जैसा कि मुझे मालूस हुआ है, औरोको भी इस पुस्तक का पठन शातिप्रद और चेतनाप्रद मालूम होगा।

सेवाग्राम, ) ८-९-४० | महादेव देसाई

१०

प्रकाशकीय

बापू' का यह तीसरा सस्करण आपके सामने है इस सस्करण में महात्माजी का एक पत्र ब्लाक बनाकर छाप दिया गया है जो उन्होंने लेखक को इस पुस्तक के बारे में लिखा था। उस पत्र की प्रतिलिपि इस प्रकार है--

संवाग्राम, २२-७-४

माई घनश्यामदास,

वबापू” अभी पूरी की दो तीन जगह हकीकत दोप है श्रत्ति- प्राय को हानि नहीं पहुँचर्ती है निशानी की है

बछुडय के बारे में जो दलील की हे वह कर सकते हैं लेकिन उसमे कुछ मालिक दोष पाता हें। जो रवणादि के बच के साथ यह वध किसी प्रकार मिलता नहीं है, बछुड़े के वध में मेरा कुछ स्वार्थ नही था कवल दु मुक्त करना ही कारण था रावणादि के वध में नो. लोकिक स्वार्थ था, प्रथ्वी पर भार था उसे हलका करना था। उसका संहारक साज्ञात रामरूपी डेशवर था। यहा तो सहारक कोई काल्वरनिक अवतार था। सेरा तो कथन यह है कि मेरी हालत में सब कोई ऐसा कर सकते है अंबालाल ने ४० कुत्तों को मेरी प्ररणा या प्रोत्साहन से मारे इसमे लोकिक कल्यास था सही लेकिन दूससे ओर रावणांदि के वध में बड़ा अंतर है। ओर मेंन ता इन चीजी का अलग अर्थ किया है। उसकी चर्चा वहा आवश्यक्र थी। ज्यादा ओर कोई समय आवश्यक समकका जाय तो

भाषा सधुर है कोड जगह दलील की पनरक्ति होगई है। यह कास प्रुफ सुधःर में हो सकता था। उससे भाफ के प्रवह से कुछ क्षति नहों आती | शायद दुसरे तो इस पुनरुक्ति को देख भी नही सके होगे।

अरब तो तबीयत अच्छी होगी बाप के आशीर्वाद

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गा धीजी का जन्म अक्तूबर सन्‌ १८६० ईस्वी में हुआ। इस हिसाब से वह इकहत्तर बर्य समाप्त कर चके | अनन्त- काल के अपरिमसित गर्भ मे क्या इकहत्तर और क्या इकहृत्तर सौ अथाह सागर के जल मे विद्यमान एक बद की गणना भले ही हो सके, पर अनन्तकाल के उदर में बसे हुए इकहत्तर सार की क्या बिसाल फिर भी यह सही है कि भारत के इस यग के इतिहास में इन इकहत्तर वर्षो का इतना मह्तत्त्त है जितना और किसीका शायद ही हो भारतवर्ष मं उस समय एक नई नरह की सानसिक हलचल का दरिदोरा है एक नई तरह की जागृति हे, एक नये अनुभव से से हम पार होरहें है धामिक विप्छव यहा अनेक हुए है, पर राज- नीति का जामा पहनकर श्रम किस तरह अपनी सत्ता जमाना चाहता है. यह इस देश के लिए एक नया ही अनभव है इसका अन्त क्या टोगा यह तो भविष्य ही बताएण्गा पर जबकि सारा ससार अस्त्र-शस्त्रा के सारक गजेन से त्रस्त है. और विज्ञान नित्य ऐस नये-नये व्वसक आविष्कार करने में व्यस्त है, जो छिन में एक पल पहले की हरी-भरी फलवाडी को फ्ककर स्मशान बना दे, जबकि स्वदेश और स्वदेश-भक्ति के नाम पर खून की नदिया बहाना गौरव की वात समझी जाती हो जबकि सत्या-

तीन

नाज्ञी कार्यो द्वारा मानव-धर्म की सिहासन-स्थापना का सुख-स्वष्न देखा जाता हो, ऐसे अन्धकार मे॑ गाधीजी का प्रवेश आजा की एक शीतल किरण की तरह हैं जो, यदि भगवान चाहे तो, एक प्रचण्ड जीवक तेज में परिणत होकर ससार से फिर शाति स्थापित कर सकती है

पर शायद मे आज्ञा के वहाव बहा जारहा ह। तो भी इतना तो शुद्ध सत्य हे ही कि गाधीजी के आविर्भाव ने इस दणश से एक आशा एक उत्साह, एक उमग और जीवन में एक नया ढंग पैदा कर दिया है, जो हजारों साल के प्रमाद के बाद एक बिलकुल नई चीज ह#

किसी एक महापुरुष की दूसरे से तुलना करना एक कप्टसाध्य प्रयास है फिर गाधी हर य॒ग में पैदा भी कहा होते है ? हमारे पास प्राचीन इतिहास-जिस दरअसल तवारीख कहा जासके-भी तो नहीं है कि हम गणना करें कि कितने हजार वर्षो में के गांधी पैदा हुए राम-क्रष्ण चाहे देहधारी जीव रहे हो, पर कवि ने मनष्य- जीवन की परिधि से बाहर निकालकर उन्हें एक अलौकिक रूप दिया है कवि तो कवि ही ठहरा, इसलिए उसका दिया हज अलौकिक स्वरूप भी अपूर्ण 6॥ ऐसे स्वरूप के विवरण के लिए तो कवि अलौकिक लेखनी अलौकिक और भाषा भी अछोकिक ही चाहिए। पर तो भी कवि की इस कृति के कारण राम-कृष्ण को मानवी मापदण्ड से मापना दुष्कर होगया हैं।

इसके विपरीत, कवि पृष्कल प्रयत्न करने पर भी बद्ध की ऐति- हासिकता और उसका मानवी जीवन मिटा सका। इसलिए ससार के ऐतिहासिक महापुरुषों मे बद्ध ने एक अत्यन्त ऊचा स्थान पाया पर कलियुग में एक ही बुद्ध हुआ हैं और एक ही गाधी पुद्ध ने अपने जीवन-काल में एक दीपक जलाया, जिसने उनकी

चार

म॒च्य के बाद अपने प्रचण्ड तेज से एशियाभर से प्रकाश फैला दिया गाधीजी ने अपने जीवनकाल में उससे कही अधिक प्रखर अग्नि- जिखा प्रदीप्त की, जो शायद समय पाकर ससारभ्र यो प्रज्वलित ब्ग्द।

अपने जीवनकाल् मे गाधीजी ने जितना यथ कमाया, जितनी ज्याति प्राप्त की और वह जितने छोकवल्लभ हुए उतना शायद है कोई शेतिशासिर पुरुष हुआ हो ऐसे पुरुष के विषय में कोई कहा- हक लिखे ? इकहत्तर साल की क्रमवद्ध जीवनी शायद हो कभी सफ्लता के साथ लिखी जा सके और फिर गाधीजी को पूरा जानना भी कौन हैं?

सम्यग्‌ जानाति वे कृष्ण किचित्‌ पार्थों धनुधेर./

जैसे गीता के बारे में यह कहा गया है वैसे गांधीजी के बारे मे प्र कहा जासकता हैं कि उन्हें भल्ली प्रकार तो खद बही जानते बाकी कुछ-कुछ महादेव देसाई भी

पाच

र्‌

मेने गाधीजी को पहले-पहल देखा तब या तो उन्नीस सौ चौदह का अन्त था या पन्द्रह का प्रारम्भ जाडे का मोौसिम था लन्दन से गाधीजी स्वदेश लौट आये थे और कलकत्ते आने की उनकी तैयारी थी। जब यह खबर सुनी कि कर्मवीर गाधी कलकत्ते आ- रहे है, तो सार्वजनिक कार्यकर्नाओं के दिल में एक तरह का चाव- सा उमड पडा ! उन दिनों का सार्वजनिक जीवन कुछ दूसरा ही था अखबारों मे लेख लिखना, व्यास्यान देना, नेताओं का स्वागत करना और स्वय भी स्वागत की लछालसा का व्यूह रचना, सार्वजनिक जीवन करीब-करीब यहीतक सीमित था।

मेने उन दिनो जवानी में पाव रक्‍वा ही था, बीसी बस खतम हुई ही थी। पाच सवारों में अपना नाम लिखाने की चाह लिये में भी फिरता था। मेलों मे वाठटियर बनकर भीड में लोगो की रक्षा करना, बाढ-पीडित या अकाल-पीडित लोगो की सेवा के छिए सहायक-केन्द्र खोलना, चन्दा मागना और देना, नेताओ का स्वागत करना, उनके व्याख्यानो मे उपस्थित होना, यह उन दिनो के सार्वजनिक जीवन मे रस लेनेवाले नौजवानों के कत्तंव्य की चौहही थी उनकी थिक्षा-दीक्षा इसी चौहद्वी के भीतर घुरू होती थी मेरी भी यही चौहही थी, जिसके भीतर रस और

छुः

उत्साह के साथ मे चक्कर काटा करता था।

नेतागण इस चौहही के बाहर थे। उनके लिए कोई नियम, नियत्रण या विधान नहीं था। जोजीले व्याख्यान देना, चन्दा मागना, यह उनका काम था। स्वागत पाना, यह उनका अधिकार था। इसके माने यह नहीं कि नेता लोग अकर्मण्य थे या कतंव्य से उनका मोह था। बात यह थी कि उनके पास इसके सिवा कोई कार्यक्रम ही नही था, कोई कत्पना थी। जनता भी उनसे इससे अधिक की आजा नहीं रखती थी। नेता थे भी थोडे-से, इसलिए उनका बाजार गरम था) अनुयायी भक्ति-भाव से पूजन-अचेन करते, जिस नेता लोग बिना सकोच के ग्रहण करते थे

उस समय के लीडरो की न॒ुकताचीनी करते हुए अकबर साहब ने लिखा था --

कौस के गम में डिनर खाते हे हुक्‍काम के साथ, रंज लीडर को बहुत हे, मगर आराम के साथ |

अवश्य ही अकबर साहब ने घोडे और गदहे को एक ही चाब॒क से हाकने की कोशिण की, मगर इसमे सरासर अत्युक्ति थी ऐसा भी नहीं कहना चाहिए | यदि कुछ लछीडरो के साथ उन्होंने अन्याय किया तो बहुतो के बारे मे उन्होने यथार्थ बात भी कह दी

गाधीवाद के आविर्भाव के बाद तो मापदड कुछ न्यारा ही बन गया। नेताओ को लोग दूरबीन और खुर्देबीन से देखने लग गये एक ओर चरित्र की पूछताछ बढ गई तो दूसरी ओर उसके साथ- साथ पाखण्ड भी बढा। स्वार्थ मे बूद्धि हुई, पर त्याग भी बढ़ा शाल सरोवर गाधीवाद की मथनी ने पानी को बिलो डाला उसम से अमृत भी निकला और विष भी उससे से देवासुर-सम्राम भी निकला। गाधीजी ने मालूम कितने बार विष की कडवी घूटे पी और शिव की तरह नीलकठ बने। सग्राम तो अभी

सात

जारी ही है और सुरो की विजय अन्त में अवश्यम्भावी है यह आशा लिये लोग बैठे हे पर जिस समय की में बाले कर रहा हू, उस समय यह सब कुछ था सरोवर का पानी शात था। ऊषा की लछालिमा शातभाव से गगन में विद्यमान थी, पर सूर्योदय अभी नही हुआ था। पुनजेन्म की तैयारी थी, पर या तो नये जन्म से पहले की मृत्यु का सन्नाटा था, या प्रसव-वेदना के बाद की सुषुप्ति-जनित जाति नेताओं को पाखण्ड में आत्मग्लानि थी, अनुयायी ही इस चीज को वैसी बुरी नजर से देखते थे

ऐसे समय में माधीजी अफ्रीका से लन्दन होते हुए स्वदेश लौटे और सारे हिन्दुस्तान का दौरा किया कलकत्ते मे भी उसी सिल- सिले में उनके आगमन की तैयारी थी |

मुझे याद आता है कि गाधीजी के प्रथम दर्शन ने मुझमे काफी कुत्हल पैदा किया एक सादा सफेद अगरखा, घोती, मिर पर काठियावाडी फंटा, नें पाव, यह उनकी वेशभूषा थी। हम लोगो ने बडी तैयारी से उनका स्वागत किया। उनकी गाड़ी को हाथ से खीचकर उनका जुलूस निकाछा पर स्वागतों में भी उनका ढंग निराला ही था। में उनकी माडी के पीछे साईस की जगह खडा होकर कमवीर गाधी की जय! गला फाड-फाडकर चिल्ला रहा था। गाधीजी के साथी ने, जो उनकी बगल मे बैठा था, मुझसे कहा “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्प वराज्िबोधत ऐसा पुकारों गाधीजी इससे प्रसन्न होगे ।” मेने भी अपना राग बदरूू दिया

पर मालूम होता था, गाधीजी को इन सब चीजो कोई रस नथा। उनके व्याख्यान में भी एक तरह की नीरसता थी जोश था, कोई अस्वाभाविकता थी, उपदेश देने की व्यास- वृत्ति थी आवाज मे चढाव था, उतार बस एक तार था,

आठ

एक तर्ज था। पर इस नीरमसता के नीचे दबी हुई एक चमक थी जो श्रोताओं पर छाप डाल रही थी

मुझे याद आता है कि कलकत्ते में उन्होंने जितने व्याख्यान दिये--नायद कुछ पाच व्याख्यान दिये होगे-- वे प्रायः सभी हिन्दी भाषा में दिये। सभी व्याख्यानों से उन्होंने गोखले की जी-भरकर प्रशसा की उन्हें अपना राजनैतिक गृरु बताया और यह भी कहा कि थ्रो गोखले की आज्ञा हैं कि मे एक साल देश में भ्रमण कर अनुभव प्राप्त करू। इसलिए जबतक मुझे सम्यक्‌ अनभव नहीं होजाता, तबतक में किसी विषय पर अपनी पक्‍की राय कायम करना नहीं चाहता नौजवानों को गोखले का ढग नापसन्द था, क्योकि वह होथ की, कि जोश की बाते किया करते थे, जो उस समय के नौजवातों की शिक्षा-दीक्षा कम मेल खाती थी छोक- मान्य लोगो के आराध्यदेव और गोखले उपहास्यदेव थे इसलिए हेमस सभी नौजवाना को गाधीजी का बार-बार गोखले को अपना राजनैतिक गृुरू बताना खटका

पर तो भी गांधीजी के उठनें-बेंठने का ढग, उतका सादा भोजन, सादा रहन-सहन, विनमुता, कम बोलना इन सब चीजो ने हम लोगों को एक मोहिनी में डाल दिया नये नेता की हम लोग कुछ थाह लगा सके

मेने उन दिता गाधीजी से पूछा कि क्‍या किसी सार्वजनिक मसले पर आपसे खतोकिताबत होंसकती है ? उन्होंने कहा, 'हा। मुझे यह विष्यास नही हुआ कि किसी पत्र का उत्तर एक नेता इलनी जल्दी देसखकता है वह भी मेरे-जैसे एक अनजान साधारण नौजवान को पर इसकी परीक्षा मैने थोडे ही दिनो बाद करली उत्तर में तुरन्त एक पोस्टकाई आया, जिसमे पैसे की किफायत तो थी ही, भाषा की भी काफी किफायत थी

नौ

पता नही कितने नौजवानों पर गाघीजी ने इस तरह छाप डाली होगी, कितनो को उलझन मे डाला होगा, कितनो के लिए वह कुतृहल की सामग्री बने होगे ! पर १९१५ में जिस तरह वह लोगो के लिए पहेली थे, वैसे ही आज भी हे

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१९३२ के सत्याग्रह की समाप्ति के बाद लाडे विलिग्डन पर एक मततंबा, शायद १९३ की बात है, मेने जोर डाछा कि आप इस तरह गाधीजी से दूर भागे उनसे मिले, उनको समझने की कोशिश करे, इसीमे भारत और इग्लिस्तान दीनो का कल्याण है पर वाइसराय पर इसका कोई असर हुआ उन्हे भय था कि गाधीजी उन्हे कही फास ले। वह मानते थे कि गाधीजी का विश्वास नहीं किया जासकता मझे मालूम है कि भारत-मन्त्री ने भी वाइसराय पर गाधीजी से मेल-जोलछ करने के लिए जोर डाला था, पर सारी क्रिया निष्फल गई। जिस मेल-मिलाप का अमल- दरामद अरबिन के जाने के बाद टृटा, बह लिनलिथगों के आनेतक स्व सका

जिन गांधीजी पर मेरी समझ में निर्भय होकर विद्वास किया जासकता हैं, उनके प्रति वाइसराय विलिग्डन का विश्वास था | बाउसराय ने कहा, “वह इतने चतुर हे, बोलने में इतने मीठे हे, उनके घब्द इतने ट्विअर्थी होते हें कि जबतक में उनके वाकपाश मे पूरा फस ने चुकूगा, तबतक मुझे पता भी छगेगा कि मे फस गया हू इसलिए मेरे लिए निर्भेय मागे तो यही है कि में उनसे मिल, उनसे दूर ही रह मेरे छिए यह अचम्भे की बात थी कि गांधीजी के बारे

ग्यारह

में किसीके ऐसे विचार भी होसकते हे पर पीछे मालूम हुआ कि ऐसी श्रेणी मे वाइसराय अकेले ही थे, और भी कई लोगों को ऐसी शका रही है

अमरीका के एक प्रतिष्ठित ग्रथकार श्री गुथर ने गाधीजी के बारे में लिखा है

“महात् गाधी में ईसामसीह, चाणक्य और बापू का अदभुत सम्मिश्रण है। बुद्ध के बाद वह सबसे महान व्यक्ति हे उनसे अधिक पेचदार पुरुष की कल्पना भी नहीं की जासकती। वह एक एसे व्यक्ति है, जो किसी तरह पकड़ में नहीं आसकते | यह में कुछ अनादर-भाव से नही कह रहा एक ही साथ महात्मा राजनीतिज्ञ, अवतार और प्रतापी अवसरवादी होना यह मानवी नियमो का अपवाद या अवज्ञा है। जरा उनकी असगतियों का तो खयाल कीजिए एक तरफ नो गाधीजी का ऑअहिसा और असहयोग में दृढ विश्वास, और दूसरी ओर इग्लिस्तान को युद्ध मे सहायता देता ! उन्होने नैतिक दृष्टि से कैदखाने में उपवास किये, पर वे उपवास ही उनकी जेरूम॒क्ति के साधन भी बने, यद्यपि उनको इस परिणाम से कोई गरज नहीं थी। जबतक आप यह ने समझले कि वह सिद्धान्त से कभी नहीं हटते, च्राहे छोटी-मोटी विगतों पर कुछ ट्धर-उधर होजाये, तबतक उनकी असगतिया बेतरह अखरती है। इग्लिस्तान से असहयोग करते हुए भी आज गाधीजी से बढकर इग्लिस्तान का कोई मित्र नही आधुनिक तिज्ञान से उन्हे यूग-सी है पर वह थर्मामीटर का उपयोग करते हें और चश्मा लगाते है हिन्दू-मुस्लिम-ऐक्य चाहते है, पर उनका लडका थोड़े दिनो के छिए प्र्म-परिवर्ेन करके मुसलमान बन गया था इससे उन्हे चोट ऊलूगी काग्रेस के बह प्राण है, उसके मेरूदण्ड हे, उसकी आखे हे, उसके पाव है, पर काग्रेस के वह चार आनेवाले मेम्बर भी नहीं हर चीज

बारह

को वह घामिक दृष्टि से देखते हे, पर उनका धर्म क्या है, इसका विवरण कठिन है। इससे ज्यादा और गोरखधधा क्‍या होसकता है ”? फिर भी सत्य यही है कि गाधीजी एक महान व्यक्ति हैं जिनका जीवन शुद्ध शौर्य की प्रतिमा है ।'

इसमें कोई शक नही कि गाधीजी परस्पर-विरुद्ध-धर्मी गुणों के एक खासे सम्मिश्रण है वह वज्यादपि कठोराणि सृदूनि कुसुमादपि दरें अत्यन्त सरल, फिर भी अत्यन्त दृढ़, अतिशय कजूस, पर अतिशय उदार हे उनके विश्वास की कोई सीमा नही, पर मेने उन्हें बेमौके अविध्वास भी करते पाया है। गाघीजी एक कुरूप व्यक्ति हे जिनके गरीर, आखो और हरेक अवयव से देवी सौन्दर्य और तेज की आभा टपकती हे उनकी खिलेखिलाहट ने मालम कितने छोगो को मोहित कर दिया उनके बोलने का तरीका बोदा होता है, पर उसमें कोई मोहिनी होती हैं जिसे पी-पीकर हजारों प्रमत्त होगये

गाधीजी को शब्दाकित करना दुष्कर प्रयास हैं। कोई पूछे कि कान-सी चीज हैं जिसने ग्राधीजी को महात्मा बनाया, तो उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करने पर भी शायद सफछता मिले। बात यह है कि गराघीजी जैसा कि में पढ़के कह चुका हू, उतने परस्पर- विरुद्ध और समान सम्समिश्रणों के पुतले हे कि पूरा विश्लेषण करना एक कठिन प्रयत्न है। इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि ये सब चीजे है, जिनकी सारी शकित गाधीजी को बडा बनाया _गाघीजी को आदमी उनसे सम्बन्धित साहित्य को पढ़कर तो जान ही नहीं सकता, पास में रहकर भी सम्यक्‌ नहीं जान सकता

गाधीजी का जीवन एक बुहत्‌ देवी जुलूस है, जिसने उनके होश सम्हालते ही गति पाई, जो अब भी द्रुतगति से चलता ही जारहा है और मृत्य तक छगातार चलता ही रहेगा इस जुलूस मे मालम

तेरह

कितने दृश्य हे, मालूम कितने अग है पर इन सब दृश्यों का, इन सब अगो का एक ही ध्येय है और एक ही दिशा में वह जुलूस लगन के साथ चला जारहा है हर पल उस जुलूस को अपने ध्येय का ज्ञान हैं, हर पल उम्र प्रयत्न जारी है और हर पल वह अपने ध्येय के निकट पहुच रहा हैं

किसीने गाधीजी को केवल 'बापू' के रूप में ही देखा है, किसीने महात्मा के रूप मे, किसीने एक राजनैतिक नेता के रूप में और किसीने एक बागी के रूप में

गाधीजी ने सत्य की साधना की है अहिसा का आचरण किया हैं। ब्ह्मचर्य का पालन किया है भगवान की भक्ति की है हरिजनों का हित साथा है। दरिद्रनारायण की पूजा की है स्वराज्य के लिए युद्ध किया है खादी-आन्दोलन को अपनाया है हिन्दू-म्‌ स्लिम-ऐक्य के लिए अथक और अकथ प्रयत्न किया है प्राकृतिक जिकित्सा के प्रयोग किये है गोवश के उद्घार की योजना की है। भोजन के सम्बन्ध में स्वास्थ्य और अध्यात्म की दृष्टि से अन्वेषण किये हे ये सब चीजे गाधीजी का अग बन गई हे इन सारी च्रीजो का एकीकरण जिसमे समाप्त होता है वह गांधी है

“मेरा जीवन क्‍या है--यह तो सत्य की एक प्रयोगशाला है मेरे सारे जीवन में केवल एक ही प्रयत्न रहा ह--वह है मोक्ष की प्राप्ति, ईश्वर का साक्षात दर्शन में चाहे सोता या जागता हू, उठता हू या बैठता हू, खाता हू या पीता हू मेरे सामने एक ही ध्येय है। उसीको लेकर मे जिन्दा हू मेरे व्याख्यान या लेख और मेरी सारी राजन॑तिक हलचल सभी उसी ध्येय को लक्ष्य मे रखकर गति-विधि पाते हे मेरा यह दावा नहीं है कि में भूल नही करता में यह नही कहता कि मेने जो किया वही निर्दोष है पर मे एक दावा अवब्य करता हू, कि मेने जिस समय जो ठीक माना उस समय

चोदह

वही किया। जिस समय जो धर्म' रूमगा, उससे मे कभी विचलित नहीं हुआ। मेरा पूर्ण विश्वास है कि सेवा ही धर्म है और सेवा मे ही ईदवर का साक्षात्कार हैं गाधीजी का जीवन क्या हर, इसपर उनकी उपर्युक्त उक्ति काफी प्रकाझ्न डालती है। ये बडे बोल है जो एक प्रकाञ-पुज से प्लावित व्यक्ति ही अपने मुह से निकाल सकता है, पर-- त्वहूं कासये राज्य स्वर्ग नापुनभंवस्‌ कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामातिनाशनम्‌ ये क्या कम बडे बोल थे ?

पन्रह

मेने एक बार कौतुकवश गाधीजी से प्रश्न किया कि आप अपने कौन-से कार्य के सम्बन्ध में यह कह सकते है कि बस, यह मेरा काम मेरे सारे कामो का शिखर है ?'

गाधीजी इसका उत्तर तुरन्त नही दे सके | उन्हे एक पल-- बस एक ही पछ--ठहरना पडा, क्योकि वह सहसा कोई उत्तर नहीं दे सकते थे। समुद्र से पूछो कि कौन-सा ऐसा विशेष जल है जिसने आपको सागर बनाया, तो समुद्र क्या उत्तर देगा ? गाधीजी ने कहा, “सबसे बडा काम कहो तो खादी और हरिजन-कार्य ।” मुझे यह उत्तर कुछ पसन्द नहीं आया, इसलिए मेने अपना सुझाव पेश किया। और अहिसा ? क्‍या आपकी सबसे बडी देन अहिसा नही है ?” "हा, है तो, पर यह तो मेरे हर काम में ओतप्रोत है पर यदि समरष्टि अहिसा से व्यष्टि कार्य का भेद करो, तो कहृगा-- खादी और हरिजन-कार्य, ये मेरे श्रेष्ठतम कार्य है। अहिसा तो मानो मेरी माला के मनको में धागा है, जो मेरे सारे कामो मे ओतप्रोत है।'

हरिजन-कार्य अत्यन्त महान हुआ है, इसमे कोई शक नहीं इनको यह चटक कब लगी, यह कोई नहीं बता सकता पर जब यह बारह साल के थे, वभी इस विषय मे इनका हृदय-मथन शुरू होगया था इनके मेहतर का नाम ऊका था। वह पाखाना साफ

सोलह

जुरगर,

करने आया करता था। इनकी मा ने इनसे कहा इसे मत छूना ।' पर गाधीजी को इस अछतपन में कोई सार नहीं लगा। अछतपन अधर्म है, ऐसा इनका विश्वास बढ़ने लगा था। उस समय के इनके बचपन के खयालात से ही पता लग जाता है कि इन्हे अछूतपन हिदू- धर्म मे एक असहय कलक लगता था। जब इन्हे हिन्दू-धर्म में पूर्ण श्रद्धा नही थी, तब भी अछतपन के कारण इन्हे काफी वेदना होती थी यही सस्कार थे कि जिनके कारण आज से चालीस वर्ष पहले जब राजकोट में प्लेग चला और इन्होंने जन-सेवा का कार्यभार अपने ऊपर लिया तब अछुत-बस्ती का तुरन्त निरीक्षण किया उस जमाने इनके साथियों के लिए इनका यह कार्य अनोखा था, पर हरिजन-सेवा के बीज उस समय तक अकुरित हो चके थे, जो फिर समय पाकर पनपते ही गये और उस सेवा-वक्ष की प्रचण्डता तो हरिजन-उपवास के समय ही प्रत्यक्ष हुई हरिजन-उपवास तो क्‍या था, हिन्दू-समाज को छिलन्न-भिन्न होने से बचाने का एक जबरदस्त प्रयत्न था और उसमे गाघधीजी बगे परर्ण सफलता मिली

एक भीषण पड्यन्त्र था कि पाच करोड हरिजना को हिन्दू- समाज पृथक्‌ कर दिया जाये। इस एड्यन्त्र बडे-बडे लोग शरीक इसका पता कुछ ही लोगा को था। गाधीजी इससे परिचित थे उन्होंने द्वितीय गोलमेज-परिषद्‌ मे ही अपने व्यास्यान में कह दिया दिया था कि हरिजनो की रक्षा के लिए बह अपनी जान लडा देगे टुस मर्मस्पर्शी चुनौती का उस समय किसीने इतना गम्भीर अर्य नहीं निकाला | पर गांधीजी ने तो अपना निर्णय उसी समय गढ़ डाला था इसलिए प्रधानमन्त्री जब अपना हरिजन-निर्णय प्रकट किया तब, गाधीजी ने हरिजन-रक्षा के लिए मचमुच ही अपनी जान लड़ा दी। इस प्रकार गाधीजी ने आमरण उपवास करके

सत्रह

हिन्दूसमाज और हरिजन दोनो को उवार लिया अहिसात्मक शस्त्र का यह प्रयोग बडी सफलता के साथ कारगर हुआ | इसमें उनकी कोई राजनैतिक चाल नही थी, हालाकि इसका राजनैतिक फल भी उनकी दृष्टि से ओझल नही था। पर उनका मञगा तो केवल धामिक था

“हरिजनो को हमने बहुत सताया है हम अपने पापों का प्रायश्चित्त करके ही उनसे उक्रण हो सकते हे ---इस मनोवृत्ति में धर्म और अर्थ दोनो आजाते हे। पर धर्म मुख्य था, अर्थ गौण | इसका असर व्यापक हुआ | हिन्दू-समाज के टुकडे होते-होते बच गये षड्यन्त्र बेकार हआ जिन्हे इस पल्ञ्यन्त्र का पता नहीं, उनके लिए हरिजन-कार्य की गुहता का अनुमान लगाना मुश्किल हैं। खादी को भी गाधीजी ने वही स्थान दिया, जो हरिजन-कार्य को इसको समझना आज जरा कठिन है पर शायद फिर कभी यह भी स्पष्ट होजाये

“और अहिसा ?--क्या आपकी सबसे बरी देन अहिसा नहीं है ?” “हा हे, पर यह तो मेरे काम मे आतप्रोत है अहिसा तो मानो मेरी माला के मनको में धागा है ।” यह प्रश्नौत्तर क्या हे, गाधीजी की जीवनी का सूत्र-रूप मे वर्णन हैं। सत्य कहों या अहिसा, गाधीजी के लिए ये दोनो शब्द करीब-करीब पर्यायवाची हें। इसी तरह सत्य और ईश्वर भी उनके पर्यायवाची जब्द हे पहले वह कहते थे कि ईश्वर सत्य हैं, अब कहते हूँ कि सत्य ही ईदवर है अहिसा यदि सत्य है और सत्य अहिसा है, ओर ईश्वर यदि सत्य है और सत्य ईब्वर है, तो थह भी कहा जा सकता है कि ईश्वर अहिसा है और अहिसा ईश्वर हैं | चूकि सत्य, अहिसा और ईश्वर इन तीनो की सम्पूर्ण प्राप्ति शायद मानव-जीवन में असम्भव है, इस- लिए गाधीजी तीना को एक ही सिहासन पर बिठाकर तीनों की

अठारह

एक ही साथ पूजा करते है

परिणाम यह हुआ कि प्राणवायु जैसे शरीर की तमाम क्रियाओ को जीवन देती है, वेसे ही गाधीजी की अहिसा उनके सारे कामों का प्राण होगई है कितने प्रवचन गाधीजी ने इस विषय पर किये होगे, कितने लेख लिखे होगे ! फिर भी कितने आदमी उनके तात्पर्य को समझे ? और कितनों समझकर उसे हृदयगम किया ? कितनो ने उसे आचरण लाने की कोशिश की ? और कितने सफल हुए ? ओर दूसरी ओर गाधीजी को अहिसा-तीति व्यग्य का भी कम शिकार बनी कुतर्कों की कमी रही पर इन सबके बीच ऐसे प्रहत भी उपस्थित होते हो हे, जो सरल भाव से शकास्पद लोगो द्वारा केवछ समाधान के लिए ही किये जाते है

“अहिसा तो सन्यासी का धर्म हैं। राजधर्म मे अहिसा का क्या काम ? हम अपनी धन-सम्पत्ति की रक्षा अहिसा द्वारा कैसे कर सकते हें क्‍या कभी सारा समाज अहिसात्मक बन सकता है ? यदि नही तो फिर थोडे-से आदमियों के अहिसा धारण करने ये उसकी उपयोगिता का महत्व क्या ? अहिसा का उपदेश क्‍या कायरता की वृद्धि नही करता ”? और गाधीजी के बाद अहिसा की क्या प्रगति दोगी ?

ऐसे-ऐसे प्रइन रोज किये जाते हे गाधीजी उत्तर भी