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हिन्दी प्रचार प्रन्थमाला, द्वितीय पुष्प

गहस्थ जीवन.

संयोजक---

पुनि श्रीयुत तिलक विजयजी पंजाबी +-मयाााक >परइाा ७५७०० अीकाााभउनभम ७५ प्रकाशक---

शाह चीमनलाल लक्ष्मीचंद मैनेजर हिन्दी प्रचार प्रन्थमाछा ९५ रबिबार पेंठ, पुना सिटी |

वीर सं० २४५१ ] खन्‌ १५२५ [ वि० सं० १९८१

ब्रिंटर:--एम्र. एन. कुछकर्णी, कनोटक प्रेस, ३१८ ए, ठाकुरद्वार, मुंबई २.

प्राकथन

०७० ७०-__ है हैं >>

यह भी एक नेसगिक सिद्धान्त है कि जीवन निर्मोणके साथ ही मनुष्यमें रही हुई गुप्त शक्तियोंके विकासका प्रारम्भ होता हैं | यदि उस समय अनुकूल संयोग मिल जाये तो उसकी गुप्त शक्तियोंका सुयोग्यताके साथ विकास होता चला जाता है और अन्तमें स्वभावसे ही उसका जीवन स्वयं सुखी होकर अन्य हजारों मनुष्योके सुखका साधन बन जाता है यदि जीवन निर्माणके समय ( जन्मसे लेकर विद्यार्थी- जीवन पर्यन्त ) प्रतिकूल संयोग हों तो मनुष्यकी सुशक्तियाँ विकसित होनेके बदले विकारित हो जाती हैं। उससे मनुष्यका जीवन अपने और दूसरोंके लिये सर्वथा बेकार हों जाता है इस लिये उसका जीवन निर्माण करनेवाले उसके जन्म दाताओंका यह मुख्य कत॑व्य हैँ कि अपनी सनन्‍्तानके जीवन निर्मोण समय उसके इर्द गिर्द ऐसे अनुकूल संयोग रक्खें कि जिससे वह आदश-जीवन जीना सीख जाय। त्रीशिक्षणके अभावसे और बेजोड़ विवाहोंके कारण अपने आपको ऊँची समझनेवाली भारतीय प्रजा आज किस प्रकारके कष्ट उठा रही है इस बातका हमने इस प्रन्थमें भली प्रकार दिग्दर्शन करा दिया है। विधवाओंकी स्थिति सुधारके विपयमे हमने बड़े बड़े विद्वानों एवं महान्‌ पुरुषोंके विचार प्रकट किये हैं और उन विचार्रेके साथ हमारी सम्माति क्या है यह तो स्पष्ट ही माछ्म हो जाता है

यों तो इस ग्रन्थकी एक एक पंक्ति गृहस्थ लोगोंके लिये मनन करने छायक है परन्तु उसमें भी अन्तिम दोनों प्रकरण हमारी दृश्टिसे कुछ अधिक महत्वके हैं। मनुष्य जीवनका परम उद्देश चारिन्र--त्याग है। क्योंकि बिना चारित्र या त्यागके सच्चे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। अर्थात्‌ चारित्रंके द्रारा ही मानव जीवनकी पूर्णता प्राप्त होती है।

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गाहस्थ्ययोग्य सुखसाधनोंमें जीवन बितानेबाला मनुष्य अमुक प्रका- रकी रीति द्वारा अपनी छालचों एवं अपने जीवन विकासमें विघ्नरूप बुरी आदतोंका परित्याग कर मात्र मानसिक पवित्र विचारों और सदैव उच्च ध्येय रखनेके कारण किस प्रकार उच्च चारित्रबल प्राप्त कर सकता है यह इन अन्तिम दोनों प्रकरणोंसे भली प्रकार माद्धम हो सकता हैं

इस ग्रंथम हमने अपने विचारोंके साथ अन्य बड़े बड़े विद्वानोंके विचार भी भाषा परिवर्तन द्वारा उद्धृत किये हैं | अतएव यह प्रन्थ जितना ख्रियोंके लिये उपयोगी है पुरुषोके लिये मी उससे कुछ कम उपयोगी नहीं हमें पूर्ण आशा है कि इस प्रन्थकों ध्यानपर्वक पढ़ कर हमारे बहिन भाई पाठक महानुभाव अवश्य हीं लाभ उठायँंगे और अपने कोटुम्बिक एवं सामाजिक जीवनकी उन्नतिके साथ ही भारतीय उत्का- न्तिके संपादक बनेंगे भारत जैन विद्यालय-

पूना सीटी,

अक्षय तृतीया १९८१

मुनि तिलक विजय

००>२ >>» « नमी

पनन्‍्यवाद

न्‍अलक्‍०कपन्‍मन-सणामलआ ए॥ 4ानपाभनवकाम्णाहाननन

हस ग्रन्थकी छपाईमें मद्रास निवासी श्रीयुत लल्छुभाई बेल- चंद देसाईने जो आर्थिक सहायता की हे तदर्थ यह संस्था उन्हें धन्यवाद देती हे

पैनेजर--हिन्दी अजार अन्थमाछा-

श्री आत्मातिलक भ्रन्थ सोसायटीके अन्यान्य ग्रन्थोंकी सूची

-$<२०२६०ब

गुणस्थानक्रमारोह,.. मूल्य-१|) | महावीरशासन, ... ... ।£) परिशेष्टपर्ब दोनों भाग, ... १॥) | सीमंघरस्वार्मीने खुल्ला पत्रों, ।॥) जैनसाहित्यमां विकासर्थवाथी---... | जिनगरुण मंजिरी ... ... 0) थयेली हानि, ... ... *) | उचैजीवनके सात सोपान ... &) लेहपूर्णा, चार्जिमंदिर.... ... हे )

जातीयशिक्षा..... ... £) साछुशिक्षा, ४० - शिशुशिक्षा ..... .... ») सैयमसाम्राज्य, ... ... “2 रत्नेन्दु ३६० 02०० 0) सूराचार्य और मीमदेव ,.. ।) | राष्ट्रीगीतावर्ली .... .... £) जैन बर्म, ... -- ।) | हिन्ठीका संदेश .... .... 7)

उपर्युक्त तमाम पुस्तकें मंगानेवाले को निम्न-लिखी पुस्तकें भेट दी जायँंगी-. -

हीर विजयसूरि, क्षमाऋषि. संप्रतिराजा, नित्यमनन, मेरे विचार, रनेन्दु, जिनयुण मंजरी,

इसके सिवाय, श्रीसुपासनाहचारियं, नामक प्रन्थ भी हमारे यहाँ मिलता है। प्रथम भाग, द्वितीय भाग, तृतीय भाग ओर चतुर्थ भाग, प्रत्येक भागकी दो दो रुपया कीमत है संपूर्ण प्रंथ मैंगानेसे सुरसु- न्दरीचरित्र भट दिया जाता है |

पता---झाह चीमनलाल लक्ष्मीचंद ९५ रविवार पेंठ प्रूना सीटी

गहस्थ जीवन, ७७ 00०००, जीवन निर्माण-

सन्मित्र सधनं स्वयोषितिरति थ्राज्ञापराः सेवकाः सानन्द सदने सुताश्र सुधियः कान्‍्ता मनोहारिणी आतिथ्य प्रश्यूपूजनं प्रतिदिन मिष्टान्रपानं गृहे साधोः संगम्॒पासते हि सतते धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥१॥ यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्‌ एवं गृहस्थमाश्रित्य वत्तेन्ते सवे आश्रमाः अनादि काछचक्रम परिभ्रमण करते हुये जीवात्माओँकों महा पुण्योदयसे इस अमूल्य मानव जन्‍्मकी भ्राप्ति होती है। मानव जन्म यह कोई साधारण चीज नहीं है जिस प्रकार दुनियाकी तमाम वस्तुओं में चिन्तामाणि रत्न या हीरा महा कीमती पदार्थ गिना जाता है वैसे ही समस्त संसारकी चौरासी छाख जीवयोनी ( उत्पत्तिस्थान ) में मानव जन्म महा कीमती पस्तु हे। मानव जन्म विना जीवात्मा किसी भी योनीगत जन्ममे अपना आत्मयि- कास नहीं कर सकता वास्तव में विचार किया जाय तो मानव जनन्‍्मका ध्येय ही आत्मविकास करना हे ६. आत्मीय थिकासके मार्ग आये बढ़नेके लिये महा पुरुषोने बह्म- # चयोधम, गृहस्थाभ्रम, चानप्रस्थाभ्रम, (जेन दशेनमें जिसे पडिमा घारी अथवा प्रतिमा घारण करने वाछा आवक कहते हैं, गृह- स्थावस्थामे रद्द कर साधु-सम्यस्तावस्थाकों तुछना की जाती है। ' जैन शास्प्रमे इन म्यारह प्रतिमाओंका घणेन विस्तार पूर्वक मिछता

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है मन वचन और कायाका संयम करनेवाछों के लिये यह बड़ा उपयोगी विषय है ) और संन्यस्ताभ्रम, इन चार आश्रमोका ऋम निर्माण किया है इस क्रमबद्ध आत्मीय विफासके राजमार्ग जीवात्मा सुछभता से उत्तरोत्तर गुणारोही हो सकता है

प्रथमके ब्रह्मचयोश्रम मे ऊपरके ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश करनेकी योग्यता संपादन करनी चाहिये। अथोत्‌ गृहस्थाश्रम में जो अनेक प्रकारकी महान जवाबदारियां हैं उनका भार वहन करनेकी योग्यता प्राप्त करनेके छिये ही ब्रह्मचयोश्रम है। पुरुषकों जन्मसे लेकर कमसे कम बीस बाईस वषे पर्यन्त ब्रह्मचयोश्रम मे रह कर विकट संसार यात्राकी याग्यता प्राप्त करनेकी आवश्यकता है ओर सत्रीको जन्म ले छेऋर कमसे कम सोछह सनत्नह वे पर्यन्त इस मदन ग्ृहस्थाश्रम का भार उठानेकी योग्यता प्राप्त करनेकी जरूरत है जो भनुष्य स्त्री हो या पुरुष ब्रह्मचयोश्रम में गरृहस्था- अ्रमके योग्य शिक्षण ग्रहण किये विना द्वी इसमें प्रवेश करता दे डसका जीवन बाल्ूकी नीव पर चिने हुये मकानके समान है | उस- के लिये यह मधुर म्दुछ संसार भी कट्ठु कठोर बन जाता है।

ग्ृहस्थाश्रम को अन्य तौन आश्रमोंसे अत्यधिक महत्व दिया जा सकता है, क्योंकि अन्य तीनो आश्रमोंके भमरण पोषणादिका आधार गृहस्थाअम पर दी निभेर है मनुष्य पर जितनी जवाबदारियां शृहस्थाभ्रम में रहती हैँ उतनी अन्य किसी आश्रम में नहीं रहती इस लिये सुखार्था मनुष्यको हर तरह की तयारी करके ही इस उछझन भरे ग्ृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिये।

जो मनुष्य अपनी जीवन याज्ञाके योग्य आवध्यकीय शिक्षणादि सामग्री संपादन करके ब्रह्मचयोश्रम से ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश करता है वद्दी मनुष्य सुछभता से ग्रहस्थाश्रमी जीवन युद्धम विजय प्राप्त कर ऊपरके वानप्रस्थाश्रम एवं संनन्‍्यरुत आश्रमों में चढ कर अपना आत्मविकास कर सकता है।

शमोदमस्तपः शोच क्षांतिराजेवमेव ज्ञानं विज्ञान मास्तिक्य ब्रक्षकर्मस्वभावजस्‌ गी०

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संसारका मार उठानेकी इच्छावाछे मजुध्यकों अपने अन्द्र रहे डुये दया, प्रेम, सत्य, सदाजुमूति, प्रमाणिकता आदि सद्‌ गुणांको विकशित करनेके लिये प्रथम उसके योग्य शिक्षण छेनेकी परमाय- इयकता है वह शिक्षण पुस्तकोंका पाठ घुखानेयाले स्कूछके शिक्षकों के पास नहीं मिछ सकता किन्तु मनुध्यके जीवनकों मछर चनाने वाला घद्द शिक्षण बाज््यावस्था में अपनी माताके पाख से ही मिल सकता है।

मजुष्यके जीवनरूप मकानकी नीच बाल्यावस्था मे ही पड़ती है इस छिये जिस प्रकारके संस्कारों मे उसे विशेष रहना पड़ता है उसी प्रकारके संस्कारों से उसका जीवन निर्माण होता दे। पूवेकाल में जो यह प्रथा थी कि बाल्यफाल में ब्रह्मचयोश्रमी बालक बाछिकायें शुरुकुछ संस्थाओं में रह कर विद्याभ्यास करते थे और आज भी कहीं कहीं पर बालक बालिकाओं को ऐसी संस्थाओं में रख कर पढ़ाया जाता है, उसका हेतु यही था और है कि गृहस्थाश्रम की तैयारीरूप विद्यार्थीअवस्था में घर पर विशेष समय रहनेके कारण उनके असंस्कारि कोमछ हंद्य पर घरके दृषित वातावरणसे बुरे संस्कार पड़ जाये घर संबन्धी बुरे संस्कारों से बचानेफे लिये और उनके जीवनमे उच्चतर संस्कार डालनेके छिये अर्थात्‌ ग्रहसंस्कार के संयोगोसे दूर रख कर उनका पवितश्न और आदशे जीवन निर्माण करनेके लिये ही बाछक बाछिफाओं को उस प्रकारकी संस्थाओं मे रख कर शिक्षण दिया जाता था | जिस घरमे माता पिताके पविशत्न और विशुद्ध संस्कार हैं, जिस घरमे बालक बालिकाओं के देखते बुरी चअेष्टाये या खराब दाब्द उच्चारण नहीं किये जाते, जिस घरमे बालक बालिकाओं के देखते माता पिताका पवित्र ही व्यवहार होता हो उस घरके बालक बालिकाओं को कदापि खराब संस्कार नहीं पड सकते। स्कूल या कालेजके शिक्षण पर नहीं किन्तु बहुधा अपने घरके खु- संस्कार या कुसंस्कार वाले संयोगोके निरीक्षण द्वारा मिलनेवाछे शिक्षण पर ही बालक याछिकाओं के जीवन मंदिरकी नीचकी रचना होती है। जिस प्रकारके कारीगर माता पिता होते हैं उसी प्रकारकी बच्चांफी जीवन इमारत तैयार होती है। बाल्यजीवन ही आदर्श

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जऔवमन बनानेकी प्रयोग शाला है, बालक ही देशाके भाघी स्तंभ हें, बालकों के जीवन पर ही देश और समाज का जीवन निर्भेर बालक ही मावाप के प्रतिनिधि हैं, बालक ही पवित्रता और झरछता सीखने के महान्‌ साधन हैं, बाछक ही माबाप की आशाओं को सफछ करनेके सच्चे साधन है और बाछक ही निष्कपटता एवं पवित्र निर्दाषता के नमूने हैं

यदि मुझसे कोई यह प्रश्न पूछे कि भारत देशकी उच्नति किस पर निभेर है? तो में छाती ठोक कर यही उत्तर दूँगा कि भविष्य सारतकी उच्नति, वत्तेमानके बाछक और बाछिकाओं पर ही निर्भर है। आजसे १५ वे बाद भारतवर्ष की अवस्था केसी होगी ? जेसी वतेमान काछके बालक बालिकाये मिल कर बनायेंगे घैसी होगी देशका उदय चाहने वाछोंकों इस वात पर छक्ष देनेकी बड़ी जरूरत है|

जिनके जीवन पर समस्त संसारफे (गृहस्थाश्रमके) सुख दुखका आधार हैं उन पविन्न हृदयी बालकों के जीबनका इस प्रकारका सुन्दर घड़ने के लिये कि जिससे थे स्वयं सुख भोगते हुये दुसरोको सुखी बना से किसी प्रेज्युणट मास्टर या प्रोफेसरकी आवश्य- कता नहीं किन्तु एक सुसंस्कारी सदाचार वाली प्रेमीछा माताकी जरूरत हें

बच्चा को रात दिन गोदमे रखने वाली एवं आठटठों पहर उसकी हर- तरहसे देख रेख सार संभार रखने वाली मातासे जो संस्कार या शिक्षण मिछता है वह शिक्षण सेकड़ो मास्टरों या प्रोफेसर से नहीं मिछ सकता बच्चोका हृदय फोनुग्राफ की कोरी रिकाड्ेके समान होता है, उसमें जंसा चाहो उस प्रकारका गायन भर सकते हो। परन्तु गायन भर देनेके बाद यदि वह गायन तुम्हे नापसंद हो और छुम उसको मिटा कर दूसरा श्रेष्ठ गायन भरना चाहो तो यह कदापि वनेगा। यह गायन आनन्द्प्रद्‌ होगा या नहीं इत्यादि बुरे भलेका विचार तुम्हे उस रिकार्डमे गायन भरनेसे पहिंले ही कर छेना आहिये। भर दिये बाद तो तुम्हें रुचिकर हो या हो किन्तु जिन्दू-

शीमर वही गायन सुनने को मिछलेगा। यदि रिकार्ड्मे गायन भरनेवाष्ठा संगीत वेता चतुर हो तो घह उस रिका्ंम इस प्रकार का मनोश और मधुर गायन भर सकता है कि वह रिकार्ड जनताकों अति प्रिय हो पड़ती है ओर उससे गायन भरनेवाले संगीत वेत्ाकी ओर भी जनताका प्रेम हो जाता है।

बस इसी प्रकार बच्चेके लिये समझना चाहिये। उनके कोमछ पवित्र एवं असंस्कारि कोरे हृदयमें जिस तरहके संस्कार फिर चाहे थे कुसंस्कार हो या सुसंस्कार पड़ जाते हैं वे फिर ताजिन्दगी नहीं बदरते | अतः भावी कालमे उनका खुसंस्कारी जीवन छोकप्रिय दो, वे महान पुरुष बन कर स्वयं कल्याणके भागी हो कर जगत कल्याणके मागेम॑ आरूद हो और प्महस्थाश्रम में आदर्श जीवन * बिता कर अपनी आत्माका विकास कर सके इस छिये उनके कोमछ हृदयरूप रिकाडेम सुसंस्कार रूप मधुर गायन भरनेके छिये छुसे- हे सदाचार वाली चतुरा मातारुष संगीत वेसाकी आवश्यकता

यह बात ध्यानमे रखनी चादिये कि सबसे प्राथमिक शिक्षण तो यारकों के छिये उनकी माताके गर्भमे ही प्रारम्भ होता है, याफी रहा हुआ शिक्षण जन्मसे छेकर आठ वधेके अन्द्र घर पर ही मिलता है। वाल्यावस्था में गोदम खेछते हुये बच्चोंको जिस प्रका- रका शिक्षण दिया जाता है वह उनके पवित्र हृदय पर इस प्रका- रका सुटढ जम जाता है कि मानों उनका स्वभाव या प्रकृति दी उस शिक्षणसे घड़ी गई है। बाल्य फकालका शिक्षण बचछ्चोंके अंग अत्यंग में व्याप्त हो जाता है उस पविज्न वयमें माताकी गोद ही याछक की बड़ेमे बदी पाठशाछा है। इस पाठशाछा का आअथमिक शिक्षण प्रथम कथन किये मुताबिक गर्भावस्था में मिलता है और उससे धाकी रहा इुआ शिक्षण यहाँ पर माताकी गोदम मिलता है। गभेमे शिक्षण मिछता है वह माताके मानसिक विचारों द्वारा मिछता है और जो शिक्षण माताकी गोदमे मिलता है बह मानसिक, चाचिक एयं शारीरिक दृक्तिओं प्रवृसिओं द्वारा मिलता है। यदि अभैस्‍्थान की पाठशाझ्ा में उसे चोरी करनेका प्राथमिक शिक्षण दिया

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गया होगा तो वह बारूक अवश्य चोर ही बनेगा | जो उसे वहाँ पर सत्यताका शाबक दिया गया होगा तो वह अवश्य ही सत्यवादी, प्रामाणिक बनेगा और यदि उसे शान्तिका पाठ सिखाया गया होगा, सो वह बालक जरूर शान्त स्वभाव बाला ही होगा यह ब्रह्मवाफ्य समझना चाहिये

शर्भस्थानरूप पाठशाझा से आगेका शिक्षण बालकों को उनकी माताकी गोद्रूप स्फूछ या शिक्षण शाछामे मिछता है गर्भेस्थान की शिक्षण शाछामें यदि कुछ शिक्षण देनेमे॑ भूल हो गई हो तो वद्द भूल माताकी गोदरूप विद्याशाला में खुधर सकती है अथोत्‌ बालकमे गभीवस्था में पड़े हुये कुसंस्कार कितने एक अंशमे माताकी गोदमे सुधर सकते हैं | बच्चेको स्तनपान कराते समय माता जिस भ्रकारके विचार करे, जिस तरह के संकल्प करे वा जेंसी घृत्तिका सेवन करे उन विचारों संकल्पों एवं क्ृत्तिकी खुडड असर गोदमें दूध पीते हुये उस निखालस दृद्यवाले बच्चेके मन पर अवश्य पड़ेगी | माता अपने मानसिक शुद्ध विचारों द्वारा ही अपने बच्चेको छुद्ध आचार विचारवान बना सकती हैं। माताके हृदयमे जैसे विचार हो, माताकी आंखोंमे जो भाव भरा हो बालक पर दृष्टि पढ़ते ही उन विचार भावोंकी असर उस बाछक के कोमछ हृदय पर बिजलछीकी त्वराके समान होती है। इस प्रकार माताफे आचार विद्यारकी असर बाष्ठक पर क्षण क्षणमे पड़ती है | ज्ञिस वक्त माता क्रोध करती है उस वक्त क्रोध भरी दृष्टि बाछक पर पड़ते ही था उस बाछक की दष्टिके साथ माताकी वह क्रोधभरी दृष्टि मिख्ते हीं उस फ्रोधका प्रतिर्बिब-फोटो बाछक के नाजुक हृदय पर जा पडता है। फिर उस स्वभावको या उस खराब शिक्षणको स्फूलके मास्टर या काछेजके प्रोफेसरां से मियाना चाहो तो वह कदापि नहीं मिट सकता | माता जिस समय प्रसन्न मुखसे पुत्रको देखती दे उस समय उस प्रसपश्नता की बालक पर यहां तक भसर पड़ती है कि बह बालक एकदम प्रफुछ्लित हो उठता है | बालक क्षण क्षणमें माताका मुख देखता रहता है। माताके हृद्यगत विचारों के अनुसार उसके मुख पर जिस प्रकारके भाव प्रगट या गुप्त झछकते होंगे डसी प्रकारके

भावोंका फोटो बालक के अन्तश्करण में पड़ता रहता है इस प्रकार माताके हरएणक आयार विचारका प्रतियबिब बालक के हृदय पर सदा कालछ पड़ता ही रहता है विशेषतः स्तनपान कराते समय बाछक फे अन्तःकरण मे माताके विचारों की गहरी छाप पड़ती है इस छिये बालककों स्तन- पान कराते समय माताकों अच्छे श्रेष्ठ विचार रखनेकी जरू- रत है। माता जैसा मन सोच विचार करती है पैसा ही शिक्षण घह बालक अपनी प्यारी माताकी गोदम पड़ा पड़ा स्तनपान के साथ ही ग्रहण कर छेता है। अथोत्‌ माताकी गोदम स्तनपान करता हुआ बालक मात्र अपने शर्रीरका ही पोषण करता दे इतना ही नहीं किन्तु वह सर्वे प्रकारका मानसिक शिक्षण भी साथ ही ग्रहण - करता है माता अपने पुत्रको स्तनपान कराती हुई नीति या अनीति, सदाचार या दुराचार, सत्य या असत्य, दया-प्रेम या करता, सरखता या दम्भता इत्यादि सदगणु॒ु्णों या दुगेणोका भी पान कराती है महान्‌ बुद्धिका शिक्षण भी माता अपने पुत्रको गोदम ही दे सकती है। माता अपने पुशत्रको जिस विद्या, कछा कोदाल्य फिवा धंधे में निपुण बनाना चाहती हो यदि उस विष* यका माता स्वत) उस समय अध्ययन करती हो या उस विषय- का चिन्तन करती हो, उस विषयके अध्ययन वा चिन्तन में ही उसका चित्त छगा हुआ हो ओर उस समय यदि माता अपने पुत्रको स्तनपान कराती हो तो अवश्यमेव उस अध्ययन या चिन्तन का एक एक परमाणु माताके स्तन-दूधके द्वारा उस बालक की रग-रगमे व्याप्त हो जाता हैं। अतः माताकों जिस कछाकोशल्य में वा जिस शाखमें अपने बालक को निपुण बनाना हो उस शास्त्र या कछा, व्यापार या हुश्ऋर तरफ अपनी बुद्धिका व्यापार, मनोवृत्ति एवं इन्द्रिय व्यापार रखना चाहिये | इसमे उसकी उस मनोबूत्ति आदि- का संस्कार उसके दारीरमे रही शुई सातों ही धातुओं में संखरित होकर उसके स्तनों में रहे छुये दूधके बिन्दुओं तक पहुँचता है। अथाोत्‌ उसके दूधके प्रत्येक बिन्दुम उसके स्वभाष की पर्व वित्तकी कृत्ति प्रथेश करती हे और उस दूधको पीनेयाछे बारूक की रग रखमे

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उस बूस्ति या संस्कारकी असर होती है। इस छिये बालक को स्तन- पान कराते समय कुटुम्ब कछहके, पड़ोस सम्बन्धी झगड़े टंटेके, सासु नणंद सम्बन्धी बेमनस्थके एवं पति सम्बन्धी अनबनाव के हानि कारक अनिष्ट विचारों का परित्याग करके किसी पवित्र शाख सम्बन्धी, किसी श्रेष्ठ हुप्लर उद्योग सम्बन्धी या किसी उपयोगी विद्या सम्बन्धी किया किसी धर्मेशासत्र सम्बन्धी प्रशस्त विचार रखनेकी आवश्यकता है। अथवा स्तनपान कराते समय पवित्र महात्माओं एवं महापुरुषों के झुण चिन्तन करनेकी जरूरत है। नीतिमान, भक्तिमान, दयावान, सत्यवादी एवं सरल स्वभावी धर्मिष्ठ पुरुषोका या उनके महान्‌ शुणोका चिन्तन करते हुये मेरा पुत्र भी वैसा ही महान्‌ बने इस प्रकारकी ढृढ भावना रखने की अत्यावश्यकता है।

स्तनपान कराते समय पूर्चोक्त भावना या रढ संकल्प रख- नेसे अवश्य ही तथा प्रकारकी संतान पेदा होती है इस बात पर हृढ विश्वास रखना चाहिये।

यह तो सिद्ध ही हो चुका कि माताके बुरे या भले मनोभाव का प्रभाव अवच्य ही बालकके कोमलछ हृदय पर पड़ता हे, उसकी धघुरी या भछी मानसिक तृक्ति स्तनपान कराते समय दुधके साथ ही बाछक के दिमाग पर अपना बुश या भछा प्रभाव अवदय डाछती है। इस लिये अब माताकों चाहिये कि जब तक वह बालक स्तनपान करता है तब तक याने एकसे सवा बे पर्यन्त तो अवश्य ही उत्तम विचार, उत्तम आचार तथा उत्तम प्रकारके ही कायों तरफ अपनी मनोबृत्ति रक्खे और अपने अन्दर यदि कोई खराब आदत पड़ी हुई हो तो उसका सत्वर परित्याग कर सदृगुण वाली आदत रक्‍खे ता कि महान पुरुष होने चाछा उसका प्रिय बाछक दुगैणों से बच कर सदगुणों का पात्र बने बाछक का जीवन घड़ते समय यदि किसी प्रकारकी ज्रुटि रह गई तो फिर बह जिन्दगी भर नहीं सुधर सकती और उस दोषका भार उस बालक का जीवन घड़ने वाले उसके माता पिता पर ही रहता है।

माताकी गोद छोड़े बाद बालक खेछता बुआ एवं आनन्द करता हुआ सारे घरमे फिरता है तथा घरके तमाम मलुष्यों के परिचय में

आता है और उन सबकी गोदका परिचय अनुभव करता है। इस कोमछ वयमे उसे घरके संस्कारों के वातावरण द्वारा बुरा या मा शि- क्षण निरन्तर मिछा करता है। यद्यपि इस अवस्था में उसके मा बाय अपने पास बैठा कर बाछकको शिक्षण नहीं देते तथापि वह निर्मल और पवित्र बुद्धिवाछा बाछक मात्र घरके ३३० च्यो के आचार विचार हारा दी प्रतिक्षण शिक्षण ग्रहण करता रहता है। उस घरमे जिस प्रकारके आचार तथा विचारों का आचरण होता है उसी प्रकार के संस्कार पैदा करने वाखे परमाणु उस घरके वायुमंडर में सदैव भरे रहते हैं इसी कारण उस घरमे आचरित आचारां, उच्चारित शब्दों, होते हूये कृरत्यों एवं विचारों की असर बालक के असंस्कारि कोरे इुदय पर भेस्मेरिज्ञम या बिजली की झड॒प के समान होती है। * बच्चेदी वय जब तक आठ दर वर्षकी होती है तब तक वह अपने ससहवास में रहने वाले घरके मनुष्यों के पिचारों, उचचारो, आचार तथा छृत्योका अनुकरण स्वभाव से ही अपने जीवनमे उतारता रहता है और वह बचपन के संस्कार प्रतिदिन इस प्रकारके सुडढ़ बनते जाते हैं कि उन संस्कारों को अब किसी भी प्रकारका शिक्षण नहीं मिटा सकता | समझने के लिये-ज़िस प्रकार कि बालक सिसाये विना ही जिस घरमे जन्म छेता है उस घरमें बोली जाती हुई साया बोलने रूगता है। किसी एक अंग्रेज के घरमे जन्म छेनेचाला बालक घिना डी सिसाये पहिछे से ही याने जन्मसे ही प्रथम इंग्लिस भाषा बोछने रूगता है। गुजरात देशमे किसी पंडित कुलमे जन्म छेनेवाला बालक घविना ही सिखाये बचपनसे शुद्ध गुजराती बोलने छगता है। बंगालमें किसी बंगाली के घरमे जन्म लेनेयाला बच्चा बसपन मे खिखाये बिना दी यंगछा भाषा बोलने छग जाता है। पूनाम किसी ब्राह्मण के घर जन्‍्मने वाछा बाछक जन्मसे ही शुद्ध मराठी भाषा बोखता है। दिल्ली या आगरे में किसी ग्ृहस्थके घर जन्म लेनेवाला बालक चविना ही सिखाये जन्मसे खुमघुर एवं शुद्ध हिन्दी बोछने छगता है। इस जगेर सिखछाये शिक्षण को ही ग्ृहशिक्षण या शूहसंस्कार कहते हैं। उन कुदटुम्बों में जिनमे कि बाऊक का जन्म होता है जिस प्रका- रकी भाषा बोली जाती है, जिस प्रकारका आचार विचार सेवन

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किया जाता है उस प्रकारका शिक्षण उस घरका बालक अ्रषण या निरीक्षण द्वारा स्वतः ही अहण कर छेता है। जिस घरमे विवेक बुद्धि द्वारा खुमघुर वाणी बोलनेका रीति रिवाज होता है उस घरका बालक जन्‍्मसे ही विवेक बुद्धि पुरस्सर बोलना सीखता

जिस घरमे सरछता भरा नीतिमय आचार पाछा जाता हो, जिस घरमे रहनेवाले मनुष्यों में परस्पर प्रेमभाव हो तथा जिस घरमें पति पत्नीमें पारस्परिक वास्तविक प्रेम हो ओर जिस घरमें छुच्छ सी बातों पर परस्पर झगड़ा टंटा होता हो एवं कुद्दुम्ब के सब मनुष्य जिनके बीचमें बालक का पोषण होता है आनन्दी स्वभाव घाले हां उस घरका बाछक जन्मसे ही सदाचारी, नीतिमान, सरछ इृदयी, खुश मिजाज तथा प्रेमी स्वभाव वाछा होता है। जिस घरमे उद्धत स्वभाव वाले मनुष्य होते हें, जिस घरके मनुष्यों का स्वभाव मधुर वाणी बोलने के बदले उल्दा कठ्ुु कठोर एवं निष्ठुर बचन बोलने वाला होता है उस कुटुम्ब या घरका बालक उद्धत स्वभावी अविवेकी एवं निष्ठुर वाणी बोलने वाला होता है, जिस घरके मनु- ध्यों में हमेशह पेसा कमाने की ही बाते हुआ करती हैं उस घरका बाछक भी छोभी तथा पेसा कमाने की चृत्तिवाछा होता है | अथोत्‌ जिस घरमें व्यापार सम्बन्धी ही चचो होती रहती है उस घरमें पलने वाछा बालक वेश्य-बृत्ति धारक द्वोता हैं। जिस घरमे हमेशह नोकरी सम्बन्धी ही चर्चा हुआ करती है उस घरमे पछने वाझा बालक एम. प्‌. तकका शिक्षण प्राप्त करने पर भी नोकरी की ही भावना रखने वाला होता है जिस बालक के माता पिताको गायन प्रिय हो ओर जिस घरमें सदेव संगीत की तालीम दी जाती दो उस घरमे पलने वाले बालक के दीमाग में अवश्य ही संगीत शक्ति होती है और वह गायन कछामे निपुण होता है। इसी प्रकार झाँपड़ों में पेदा होनेचाले हलकी जातिके--नीच कृत्य करने वाली जातिके बालक अपने माबाप के नीच संस्कारों एवं जिस झोपड़े में बे परिधुष्ट होते हैं उसके योग्य संस्कारके अनुसार आचार बाले होते हैं।वे कभी भी श्रेष्ठ वाणी नहीं बोछ सकते यद सब कुछ ग्ृहशिक्षण का ही परिणाम है

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अब यह बात जाननेकी रही कि उस बेसमझ नादान बालकके अन्तःकरण में या दीमाग में किस प्रकार घरके मनुष्यों के सुने इुये इब्दों या देखे हुये कृत्योकी असर होती है। आप यह तो अच्छी तरहसे समझते होगे कि जब कोई मनुष्य किसी पहाडके पास या किसी कुपेके पास हिंवा नदीके पास जोरसे आवाज करता है तो उसकी आवघाज्ञ के समान ताह॒श ही आवाज उसे अपने ही उच्चा- रित प्रतिशब्दों में सुनाई देती है, उसे प्रतिध्वनि कहते हैं इसी प्रकार ग्रहवायु मंडल में भी मजुष्यकी वाणीकी प्रतिध्यनि पड़ती

मनुष्य जिस स्थानमें रहता हो उस स्थानके वायुमंडलू में उसके इर्द गिदें उसके हरणक विचार एवं उच्चारका प्रति- / बिम्थ पड़ता है और वहाँ पर आस पासमें रहनेघाले मनुष्यों तथा विशेषतः कोमछ हृद्यवाले बालका में उस प्रतिबिम्ब का प्रत्याघात होता है। यह क्रिया शुध्र तया सदेंव होती रहती है और बछवान भनुष्योंके विचारों तथा शब्दोंकी निबेल एवं नाछुक मलुध्यो पर विशेष असर होती रहती है ! ,स बातका प्रत्यक्ष दृष्टांत यही है कि छोटे बेसमझ बच्चेकों जब उसकी मा या बाप किया अन्य कोई मनुष्य कुछ शाब्द कहता है तो तब उसी प्रकारका प्रतिशब्द उस बालक की ज़बानसे निकलता है अथोत्‌ यदि उस कोमरू हृदयी पवित्र बच्चेको कोई मनुष्य या उसके मा बाप बदमास कहे तो वह तुरन्त ही उस कहने घाखे मनुष्य या माबापको बद्‌- माश कहेगा। वह खराब दाब्द खुनने से ही उसे तो उसके जीवनमें उस शाब्दका शिक्षण मिछ चुका। किसी समय ऐसा भी बनाव बनता है कि कदाचित्‌ वह बालक उस तुम्हारे छाड़मे उच्चारण किये इुये खराब शब्द को तुम्हारे सामने जोरसे भी दुहदरा सके परन्तु यह तो निश्चित ही समझना चादिये कि बह सुना हुआ द्ाब्द उस बालक के हृदयरूप कोरे पट पर सदाके लिये आलेखित हो चुका | नीच कुछोम अच्छे जीवात्मायें भी वहाँ के नीच घाता- वरण---खराब संस्कारों के कारण अधमाचार एवं खराब स्व- भाव वाले ही हो जाते हैं। अच्छे प्राणिओं को भी खराब बनाने में मुख्य कारण उनको जन्म देनेवाले माता पिता प्॒व॑ उनकी बाल्या-

श्र

चस्थाम अनुभव किया हुआ, सुना हुआ तथा निरीक्षण किया हुआ अरके मनुष्यों का विचार, उच्चार, तथा आचार ही है। बहुतसे सम्य खुसंस्कारी कुट्धम्बों में पैदा होनिवाले बाछका के मुखसे बड़ी उमर सक भी कभी असम्य विभत्स-खराब दाब्द सुनने में नहीं आते इसका कारण सिर्फ उन बालकों के माता पिताकी सावधानता, नैस-. मिंक सभ्यता तथा जिस घरमें उनका पालन पोषण हुआ है उस घरके मनुष्यों का नेक चाल चलन ही है। जिस बालक ने जन्मसे 'छेकर आज़ पर्येन्त अपने कानों असभ्य-खराब शब्द सुना ही नहीं वह बालक किस प्रकार वैसा शब्द बोछ सकता है ? जिस कोरे धड़ेमे कस्तूरीके सिवाय आज तक छसण पड़ा ही नहीं उस घड़ेम से किस तरह छसण की गन्ध सकती है ? जिन बीभत्स शब्दोंकी सशि- क्षित समय कुटुम्बम गन्ध तक नहीं होती उन्हीं खराब शब्दों की हछके जघन्य कु टुम्बो में बालक के असंस्कारी माता पिता तथा घरके अन्य भनुष्यों के मुखसे रात दिन बृष्टि ही हुआ करती है। ऐसे गन्‍्दे संस्कारों में पेदा होकर जन्मसे ही असम्य तथा बीमत्स वाणीका अवण करने वाला बालक किस प्रकार समय, मचुराछापी तथा छुसंस्कारी हो सकता है !?

कोमछ मगज़ वाछे बाछको पर वचनकी असर वचनम ही होती है इतना ही नहीं किन्तु उन खराब घचरनोकी एक दूसरे प्रकारसे भी यद्धी खराब तथा हानिकारक असर होती है। यदि यश्यों पर उनके माता पिता या उनके बुज्ञुगों की ओरसे रात दिन इस प्रकार के ही शब्दांकी ध्योछार हुआ करे कि तू तो बिछकुछ सस्ते ही है, तू तो बेवकूफ है, तू तो नाछायक ही रहेगा, तू सदा बदमाश ही रहेगा, तो इस प्रकारके उसके विषयम उच्चारण होते हुये खराब शब्दाकी उस बालक पर 'पेसी बुरी और महा हानिकारक असर होती है कि सचमुच ही घदद शालक नित्य के खराब शब्द प्रहारों से मूखे, बेचकूफ और नाछायक दी निकलता है, बह बाछक स्व॒त$ वैसा नहीं बना किन्तु उसके माता पिताने जान बूझ्षकर ही उसे बैसा बेवकूफ या नाछायक घड़ डास्य है। यदि माता पिता बाछक को अच्छा बनानेकी भावना के साथ

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साथ उसे उत्साह वर्धक शब्द खुनाया कर कि बेटा तू बड़ा हशि- यार है, तू बड़ा बहादुर होगा, तू बढ़ा ही चतुर है, तो वह वाछक अवश्य ही उन उत्साह व्धेक अच्छे शब्दोडी असरसे अच्छा ही निकलेगा उसके पासमें यारंवार निरन्तर उच्चारित होते हुये अच्छे या बुरे शब्दोंकी असरसे वह नाज्ञुक अन्तःकरण याछा बालक सचमुच ही शब्द संस्कारों से अच्छा या बुरा बन जाता है | इसी प्रकार छड़की के छिये भी समझ छेना चाहिए यदि घरमें माता या अन्‍य स्त्रियों चाची ताई घगेरह उस कोमछ हृदया बालिका को हर- धक्त खराब शब्दोसे तिरस्कृता किया करें कि तू तो डायन जैसी है, रांड ! तेरा तो जन्म ही अच्छे मुहस्ते में नहीं हुआ इत्यादि , खराब विशेषणों से वारंवार उसकी कदथेना की जाती हो तो उन नीच दाब्द संस्कारोंसे बह बालिका अवश्य ही यैसी दुभेगा होगी कि जिसे सास ससुरेके घर पर भी खुख मिल सके बाछक बालिका- ओके संस्कार दूषित होनेमे मात्र उनके घरके मलुष्यों के रात दिन उच्चारित होते हुये खराब शब्द ही कारण भूत होते हैं। मानसिक और घाचिक शिक्षण की जो असर बालक पर पड़ती है घेसे ही कायिक शिक्षण का भी परिणाम मिछता है| हाथोंकी चेष्टा, आँखे निकालना, या अन्य शारीरिक चेष्टाये करना बालक देख कर ही सीखता दे। हमने देखा है कि कितनी एक माताये सारे दिन कुछ कुछ काम करते समय अपना मुँह चछाया ही करती हैं, अथोत्‌ कच्चे चावछ कच्ची दाल घगेरह जो कुछ आया सो मुंह डाला। बालक भी यह देख कर उसी प्रकार सीख जाता है | माता छड़की से कद्दे कि जा बह फछानी चीज उठा छा तो बद छीज लानेके साथ ही उस चीज़ की मुट्ठी भरकर सुँदर्म डालेगी,--क्यों कि यह उसने अपनी मभासे ही सीखा है | सबसे पहिछे बालक के जीवनकी नीव उसकी माताके आचार विचार और संस्कारों से चिनी जाती है यदि माता सत्सं- सस्‍्कारी एवं सुशिक्षिता हो तो बालक को घरके खराब संस्‍्कार्रों से भी छुरक्षित रख सकती है। इस छिये बालक को मद्दान्‌ पुरुष बनाने में सबसे प्रथम तो मातृपदके सदगुणों से विभूषित योग्य माता की ही आवश्यकता दे

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यह वात तो आप भी प्रकार समझते होंगे कि--योग्य माता सो शिक्षकों से भी अधिक शिक्षण दे सकती है। माता ही कुटुम्बमें अपनी सबे प्रजाके हृदय एवं चक्कषुओं फो आकर्षण करने वाछी है। माताके द्वारा ही सन्‍्तान के जीवनकी नीव पड़ती है। माता ही अपनी सन्‍्तानका सुन्दर जीवन घड़ सकती है। मुख्यतः माता ही अपनी सन्‍्तानके बुरे या भछे जीवनकी जघाबदार है। क्ये कि बच्चा निरीक्षण द्वारा माताके मानसिक भावों-शब्दों तथा आचरणों से उसी प्रकार का शिक्षण ग्रहण करता रहता है। इस छिये योग्य माताकी अत्यावश्यकता है यह एक अनुभव सिद्ध बात है कि उपदेश की अपेक्षा कर बतलछा- नेकी असर मनुष्यों पर बहुत ही सत्वर होती है। अथोत्‌ मनुष्यों के डदय पर उतनी उपदेश की असर नहीं पड़ती जितनी कृतिकी पड़ती है। वाचिक उपदेशकी अपेक्षा कर बतछाने फो ही अधिक महत्व प्रिछता है और इस प्रकारके उपदेश को ही विना वाणीका सिद्ध उपदेश कहते हैं| बाछकी के छिये यह नियम विशेषतः चरितार्थ होता है। बच्चोका छक्ष सर्देव अपने घरम रहने वाले मनष्यों तथा विशेष कर अपनी माताकी कृति पर ही रहता है, क्यो कि छोटे बच्चों में अभी वाणीका उपदेश अ्रहण करनेकी शक्ति नहीं होती। चह शाक्ति तो उनमे पाँच सात वर्षके बाद आती हैं। रूति द्वारा शिक्षण ग्रहण करनेकी शक्ति बच्चो जन्मसिद्ध होती है। माताझे या घरमे रहने वाछे अन्य मनुष्यों के आचरण को प्रत्यक्ष देख कर तद- नुसार आचरण करनेका शिक्षण ग्रहण करनेका तो बाछकों में स्वाभा- विक ही सहज सद्गुण होती इस छिये घरम माताका जिस प्रका- रका आचरण देखने, सुनने मे आता है उस प्रकारका शिक्षण बाछ- को के हृदय पर असर करता जाता है। यदि घरमें बोले जाते हुये उपदश वचन ओर कृतिमे परस्पर विरोध हो, अथोत्‌ कथन कर- नेसे आचरण विपरीत हो तो उससे बालकों को कुछ छाभ नहीं होता इतना दी नहीं किन्तु द्वाथीके दान्ताके समान उस द्विधा कथनी करनीसे उल्टी महान्‌ हानि होती है | इस प्रकार का अनुकरण बाल- को को नीचम नीच टगाईका डुव्येसन सिखाता है। द्विवचनी आते दी

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भनुृष्य में दूसरों को फसाने की कपटाई का दुर्गेण आता है बालक घर में बतेने वाले मनुष्यों की चाणी तथा कृतिकी एकता या विभिन्न ताके अजुमव से अपने विचार निर्माण करता है। बाल्यावस्था में घरके आचार विचारोको देखने खुननेसे, उनका धीरे धीरे बालक के पवित्र अन्तःकरण में अनुकरण होने छगता है| यद्यपि यह अनुक- शण बहुत ही सूक्ष्मता से शुरू होता है तथापि इस सूश््मता से शुरू हुये अनकरण के द्वारा धीरे घीरे बालकों के हृदयमें उस प्रकारकी वृत्तियाँ ऐसी सुदृढ़ और मजबुत हो जाती हैं कि परिपक्त अवस्था में स्कूलके मास्टरों या काछेजके सेकडो प्रोफेसरों फे शिक्षण से भी उनमें परिवर्तन नहीं होता | बाल्यकाछ में बालक फी दृष्टि विशेषत३ निरन्तर उसकी माता पर ही पडुनेका कारण यही हैं कि पिताकी अपेक्षा माताके ही पास बाछक जास्ती रहता है

घर यह ख्रीकी राजधानी है, उस गृद राजधानी मे उसकी आज्षा निरंकुश तया प्रवतेती है। उसकी छोटी प्रजा पर उसका हुक्म चलता है। उसकी निर्दाष प्रज्ञा छोटे बड़े हरणक प्रसंगो में उसीका मुँह ताकती हैं। उस पवित्र हृदयवाछी प्रज्ञाकी बड़ीसे बड़ी हाई- कोटे माता ही है। माता ही बालकां की प्राथमिक शिक्षण शाछा की शिक्षिका है, माता ही बाछकों के चारित्र मंदिरकों घड़नेवाला मद्ान कारीगर है, माता दही बालकों के से सुखकी आशा छता दे और माता ही बालकों का स्व सर्वेस्व है। इस लिये बालक प्रतिक्षण अपनी प्रिय माताके आचार विचार पर छक्ष रखता हैं और एकदम उसी तरहका अनुकरण करने छग जाता है। जिस प्रकार एक छोटेसे छोटे वृक्षम चक्‍कुसे छोटासा--बिछकुरछ सूक्ष्म घाव किया जाय ओर बह चूक्षके बढ़ने पर बदता जाता है, अथोत्‌ बालबृक्षम चक्‍कु आदि शख्मसे सूक्ष्म मे सक््म किया हुआ चिन्ह वृक्ष के साथ दी बदता हुआ बड़ा हो जाता है। उसी तरह बालवृक्ष के समान बाल्य* चयमे कोमल हृदयी बालकों के अन्तःकरण मे माताके आचार बिचा- रका अनुकरण करने से पड़े हुएए सूक्ष्म सश्म भी खुलंस्कार या कुसं स्कार उनकी वयके साथ ही बढते चले जाते हैँ इस प्रकारके बाल्यावस्था वाछे और विना सिखाये अनुकरण किये हुये प्रारंभिक

श्द्द

दिक्षण पर ही बाछकों के जीवन मंद्रिकी नीच चिनी जाती है। यहाँ से ही उनका चारित्र निमोण होना शुरू होता है यदि सच पूछो तो माता की दृत्तियां ही बालक रुपमें जन्म छेती हैं बाऊक यह एक माताके आचार विचार का प्रतिर्यिंब है। माता के हरणक विचार, हरफप्क आचार, हरणक उचद्चार का ही प्रतिरूष बालक है| माता की से प्रकार की चृत्तिओआं की छाया उस बालछकम मात्यूम देती है। बालक के प्रति मातृप्रेम भी कोई दिव्य योजना ही है। माताका प्रेम ही बाछक के हृद्यको अपनी ओर खींचा करता है, वह माता फी ममता भरी दृष्टिके लिये उत्सुख होकर निरन्तर ही उसके मुंहकी ओर निहारता रहता है। किसी दुःखकी विटंबना से मुक्त होने को नहीं, किसी महान विपक्षिकी विषम वेदनासे मुक्त होने के लिये नहीं किन्तु वद्द निर्दोष हृद्यवाछा वालक माताकी ममता, प्रेम, स्नेहके सदु भावसे अपने आपको आनंदित करने के छिये, अपने सुखको अधिकाधिक बृद्धिगत करने के छिये, उसे विशेषतः उद्दीघत करने के छिये ही माता के सन्मुख भागा आता हैं। निदान हरणक प्रसंग में बालक अपनी प्रिय माता पर ही दृष्टि डालता हूं वास्तव स्त्रियोंक ग़ददराज्य पर ही देशकी समुपन्नति निभेर है। यह कहना कोई अत्युक्ति भरा या अयोग्य गिना जायगा कि यदि शुहराज्य सुव्यवास्थित चछने छग जायें तो अनायास ही देश सम्ु- श्नत हो जाय देशकी समुश्नति का मुख्य अंश तो ख्रीजाति द्वारा किये हुये सुसंस्कार पर ही अवर्छंबित है यदि खत्री जाति को अपने योग्य विभाग में पूणे अधिकार दिया जाय, यदि स्त्री जाति सम्बन्धी पुरुषोंके दिछमें से हछके विचार सर्वथा दूर हो जायें, यदि पुरुष उन्हें अपनी कुछ देवियाँ समझने छग जायें तो अवश्य- भेव उनकी कुक्षिसे पेदा होनेवाली बीर सनन्‍्तान अपने देशको सुख्री समुन्नत बना सके देशके दरएक घर में माता की गोदम खेछते हुए छोटे बाछक ही तो भविष्यत्‌ की प्रौढ प्रजाका बीज हैं। बीज में जितना अच्छा संस्कार किया जायगा उतना ही उसका फलरूप भाज्री प्रजा सुसंस्कारी और खुडढ़ होगी मनुष्य की वृत्तियां घड॒- मेमे स्लरीकी समानता करनेवाला अन्य कोई भी शिक्षक मिलेगा |

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देशकी उल्नातिका आधार छुसंस्कारी तथा सखुशिक्षित देश प्रेम्नी मनुष्यों के चारित्र की उन्नति पर है और मनुष्य को सुसंस्कारी, सुशिक्षित, देश पेमी बना कर उसके यारिश्र को उच्चत बनाना यह सब कुछ ख्तरियों के-माताओं के ही हाथ में है

अपने अनुपम वीये पराक्रम से समस्त यूरोप खंडको घुजानेबा- छे वीर शिरोमाणि नेपोलियन बोनापाटे को मद्यान पुरुष बनाने में कारण भूत उसकी माता ही थी। जब नेपोछियन गर्सम था तथष उसकी माता एक साधारण सेनिक अपने प्रिय पति के साथ घोड़े पर युद्ध क्षेत्रम फिरा करती थी। रात्रिके समय छड़ाई की से हकीकत उसका पति उसके समक्ष कह स॒ुनाता था। माता उस समय युद्ध सम्बन्धी ही पुस्तकें पढ्ा करती, उसके दिलछमे पतिके साथ ही युद्ध क्षेत्रम उतरने की भावनाये पेदा दोती थीं। ऐसी परिस्थिति में ही नेपोछियन माता के गम मे परिपक्क हुआ था। छड़का पेदा हुये बाद भी माता उस बाछक पुत्रके समक्ष अपने घर में रहने वाली स्त्रियों के साथ उस युद्धकी ही बाते करा करती। बालक बड़ा होने पर माता के मुखसे युद्धकी बाते जिनका कि उसे गर्भ में से ही संस्कार पड़ा था बड्डे प्रेमसे सुनता आर पद छिख कर समझदार होने पर भी बद्द उस विषय के पुस्तक रुचि पूवेक पढ़ता उसे युद्ध सम्बन्धी बातों मे बड़ा ही आनंद आता इसका परिणाम यदद आया कि वह एक साधारण सैनिक पद से चढते अढ़ते अपने अद्वितीय याहुबछ से ओर तद्विषयक बुद्धि कौशल्य से अखिल यूरोप को धुजाने वाछा, यूरोपके सर्वे वीरों में प्रथम पद पाने चाछा और फ्रांस का सम्नाट पद प्राप्त करने बाला हुआ। नेपो- लियन की इस प्रकार की उन्नति का कारण उसके पिलाका दिया हुआ शिक्षण नहीं किन्तु उस फी जन्‍म दाजी माता ही थी।

क्र के क्र मै

माता अपने पविच्न प्रेम द्वारा निरन्तर शिक्षण देती है। पुरुष जनसमाज का बुद्धि स्थान है परन्तु ख्वी उसका प्रेमस्थान--इृदय है। पुरुष जनसमाज का निर्णेता है किन्तु र्री उसे रसादे कर

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प्रेरित करने वाली है | पुरुष यह जनसमाज का बल है पर सख्ती उसका छावण्य, आभूषण तथा खुखपरद नूर है। स्त्रियों की बुद्धि भी उनके प्रेम द्वारा ही बाहर पड़ती है। यद्यपि पुरुष बुद्धि के अधिष्टिता हैं तथापि उनकी रसाद्रे भावना को स्री ही विकसित करती है। रसादे भावनाओं से ही उच्च चारित्र नि्मोण होता है।

स्त्री सन्‍मान पूर्वेक पुरुषका स्मरण करती है, उसे अपना आराध्य देव समझती है, पुरुष की हार्दिक प्रेम भावना द्वारा स्त्री पर छीनता होती हैं, वह उसे अपनी कुछ देवी के समान समझता है, बस इस प्रकार दोनों का उच्च चरित्र बन कर सचरित्र सनन्‍्तान पदा होती दे

हमारे देशके बहुत से अधम पुरुष अपन आप तो रंडिया के तछवे चाटते फिरते हैं ऑर अपनी स्त्रीको सच्चयरित्रा सीता के समान सती बनने का उपदेश करते हैं। परन्तु इस प्रकार के उपदेश की कुछ भी असर नहीं पड़ती उन विचारे पामरों को अपने कृत्यों पर जरा भी खयाछ नहीं आता। यदि वे अपनी प्राण प्रियाकों सीता सती के समान बनाना चाहते हैं तो प्रथम उन्हें स्वयं रामचंद्रजी के समान सश्चरित्र बनना चाहिये | मनुष्य जा कार्य दूसरे से कराना चाहता हे उस कायेकों कराने का उपदेश करने से पहिछे उसे स्थरय॑ दी वह काये करना चाहिये। ऐसा करने स॑ जिस से उस काये को कराना चाहते हो उसे फिर उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं रहती

हमारे पवित्र भारत देश की पवित्र ग्रहदेविओं में दुनिया भरकी गृहदेविओं से अत्यधिक पात्रता है। उन मे इस प्रकार का प्रवठ प्रेम और संयम होता हे कि वे अधम से अधम मागे में गये हुये अपने पतिराज़ को अपने उस प्रबल प्रेम तथा प्रभाव शाली संयमन द्वारा सन्‍्माग में छे आती हैं पतिके मयोदा उलंघन करने पर भी वे स्वयं मयोदा में रह कर अपनी उदारता भरी पविन्न पाञ्नता के अनु- सार उसे अपना आराध्य देव ही समझती दें | यह पवित्र भावभरी मयोदा मात्र इस धर्मप्रिय भारतवर्ष की ही ग्रहदेवियों में पाई जाती है कि जो मागे श्रष्ट हुये भी अपने पतिको अपना पूज्य देव समझती

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हैं। पाग्चात्य देशों में ऐसा नहीं है। व्हों तो पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को ज्यादा मदत्व की दृष्टि से देखा जाता है। क्‍यों कि वहाँ पर स्त्रियों को मात्र पुरुषों के दिल बहलाने का खिखोना नहीं समझा जाता उस देश में प्रेम की कदर है वहाँ प्रेमका महत्व समझा जाता दे ख्री जाति पुरुषों के आस्मविकास में कितनी उपयोगी है, चह पुरुष-मंडछ पर कितना उपकार करती है यह सब कुछ वहाँ की संस्‍्कारी प्रजा भष्ठी भति समझती है

यदि गरीबसे गरीब पुरुष की झापड़ी में भी प्रेम हृदया सन्नारी अधिप्ठाशत्री हो तो चहाँ पर भी आनन्द सुख समृद्धि सथ्ारित्रादि सवे गुण सहज ही में प्राप्त हो सकते हैं

जे क्र क्र भर

संसार में आबाछ वृद्ध स्व मनुष्यों के लिये घर यह एक उत्त- ममे उत्तम प्रकार की शिक्षण शाला है प्रथम सब वदों पर ही प्रसन्नता, धेयेता, सहन शीलता, सहाय शीछता, संयमन, दया, प्रेम, तथा स्वकतव्य के स्वरूप समझ कर अन्तर में ही अनुभव करते हैं। पहिछे श्रष्ठ मातारूप शिक्षक की इसी पाठशाछ्ला में विनय विवेक आदि सद॒गुणो का पाठ पढ़ा जाता है। अथोत्‌ भ्रेष्ठ मातावाले घर ही में प्रथम सदगुणों का शिक्षण मिखता है यह तो हम प्रथम ही कह चुके देँ कि जिस प्रकार सुसंस्कारी योग्य मातावाछे घर में पाछन पषिण किये इये वाछक सदाचारी तथा सह्गुणी होते हैं उसी प्रकार कुसंस्कारी अयोग्य मातावाखे घर मे पालन पोषण किये हुये बाछक चारिज्र दीन तथा दुशगुणी होते है

बाछको में माता के संस्कारों की अखर कहें तक पड़ती है इस यात के छिये बड़े बड़े विह्ाना ने शोध-लछगाईकर अनुभव किया है कि पिता चाहे जैसा निखट्ट ही क्‍यों हो परन्तु -खुसंस्कारी योग्य माता की सन्‍्तान में अवश्य दी उसके सदणुण उतरते हैं उस योग्य माता के बाछक उसमे रहे हुये सदगुणों के अनुसार ही सदाचारी सुशील होगे | यदि माता योग्य/न हो, बह छड़ाकी स्वभाव की हो, सदाचार रादित हो तो.पिता:चाहे;जैसा सदाचारी

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शान्त स्वभाषी, चारित्र पात्र सदशुणी क्यों हो तथापि सन्तान में माता के दुगरेणो की गनध तो अवश्य ही आयगी |

यह बात सत्य है कि आज तक किसी ख्लीने सिद्ध देम जैसे व्याकरण की रचना नहीं की, यह भी सत्य है कि आज तक किसी रूदीने काव्य कोश तथा न्याय के कठिन ग्रन्थों की रचना नहीं की, यह भी सत्य ही हें कि आज तक किसी खीने भूगोल खगोछ या रसायण शाखत्र सम्बन्धी कुछ नूतन शोध नहीं की और यह भी किसी अंशर्म सत्य ही मानना पड़ता दे कि किसी खत्रीने रणसंग्राम में जाकर रावण जेसे योद्धाओं के साथ युद्ध नहीं किया तथापि यह तो निश्चित ही सिद्ध हैं कि खियों ने इससे भी उच्तम और अधिक महत्तम कार्य किया है और वह उत्तम तथा महत्तम काये यही दे कि पूर्वोक्त महान्‌ काये करनेवाले भद्दान्‌ पुरुषों को उस अकार के काये करने का प्राथमिक शिक्षण का पाठ अपनी वात्सल्य- पूणे गोदरूपी पाठशाछ्ला में उन्हों ने ही पढ़ाया था। दुनिया में माता के प्रेमाझ्त द्वारा ही पुरुष सच्चरित्रवान्‌ बनता है। पुरुष को उत्तम में उत्तम आर महान्‌ म॑ महान्‌ काये करने का बछ अस्त से भी मधुर माता के संस्कारी दूध से ही प्राप्त होता है

हिन्दु शास्त्र में कथन किये मुज़ब पतिदेव का वचन पालन करने के छिये वात्सल्य प्रेमका उत्कट उपहार समपैण करती हुई कौशल्या की भेमाद कतेव्य परायणता ही रामचंद्रजी के ख्वृदु किन्तु पराक्रम युक्त चीरत्व का बीज था। अमेरीका में स्वतंत्रता स्थापन करने वाले ज्योज वोशीग्टन आदि पाश्चात्य महान पुरुषों का जीवन चरित पढ़ने से माल्यूम दोता हे कि उनकी माताये बड़ी सुसंस्कारी और सद्वणवती थीं। उन छोगा की महत्ता यह उनकी योग्य माताओं की सद्धासनाओं का ही फल था। समर्थ भमे प्रवतेको मे भी उनकी खुयोग्य माताओं की सद्भावना वृत्तिकी छाया देख पड़ी है। क्रिश्वीयन धमम प्रव्तेक सद्दात्मा क्राइस्ट के पिताका कोई नाम तक नहीं जानता, परन्तु मात्र उनकी माता मरीयम या मेरी, ही उस धम्मके अनुयायी मनुष्यों की पूजा प्राप्त करती है खुना जाता है कि अकबर बादशाह में भी उनकी आता के गुण पाये जाते थे। इतिहास प्रसिद्ध महाराष्ट्र के मुकट

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शिवाजीने भी मुसलमानों को नि्मुंछ करने का बलवर्धक दूध अपनी भाताका ही पीया था। इसी प्रकार इस से विपरीत माता के दुगनैणो के कारण दुगुणी