राजस्थान पुरातन शअ्रन्थमाला

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प्रधान संपादक -पुरातत्ताचाय, पद्मश्री, जिन विजय सुने [ सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान |

ठक्कुर -फेरू -विरचित

रलपरीक्षादि -सप्त - ग्रन्थसंग्रह

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राजस्थान राज्य संस्थापित

राजस्थानप्राच्यविद्याप्रतिष्ठान जोधपुर(राजस्थान)

राजस्थान पृरातन अनन्‍न्यथसाला

राजस्थान राज्यद्वारा प्रकाशित सामान्यत अग्यिट भारतीय तथा विद्योपत राजस्थान प्रदेशीय पुरातनकालीन सस्कून, प्रात, भपम्रश, राजस्थानी, गुजराती, हिन्दी कादि भाषानिबद्ध विविध चादाय प्राश्नी विशिष्ट गअन्यावदी

प्रधान संपादक युरातत््वाचार्य, पद्मश्री, जिन विजय मुनि

[ ऑनररी मेंबर ऑफ जप्तन भोरीएन्टछ सोसाइटी, जमेनी ] सम्मान्य सदस्य -भाण्डारर प्राच्यविद्या सशोधन मन्दिर, पूना, गुजरात साहितय सभा, अहमदाबाद, विश्वेश्वरानन्दर वेढिफ शोध सस्यान, द्ोशियारपुर, पञआाब, निदत्त सम्मास्य नियामक ( लेनिरशी ठायरेक्टर )- भारतीय विद्यासवन, बबरई, प्रधान सपादक - गुजरात पुरातत््य मन्दिर ग्न्थायली, भारतीय विद्या ग्रन्यावली, सिंघी जैन ग्न्यमाला, जन साहित्सशोधकू अन्थायठी,-इत्यादि, इत्यादि

-- यन्थांक ४७४७ -- ठक्ुर - फेरू- विरचित

रलपरीक्षादि- सप्त- ग्रन्थसंग्रह

प्रकाशक शाजस्थानराज्याक्षाइसार

+ च्राच्यविया [2 4 सचाठुक -- राजस्थान बात्यावद्या भातए्ठान 4906७0० , '8.]858॥ 006०) +४९०७०) ॥व४ॉ/फए३०७, उं०१॥एछप्र" 'उक्रमाबद २०२७ राष्ट्रीय कतई ५८८३ [ *न्यनियमाउुसार सर्याधिकार सुरक्षित [ 22%] सुदझ-लक्मीयाई नारायण चौधरी, निणयसागर प्रेस, २६-२८ कोलभाट स्ट्रीट बचई मरकाशक-गोपाछ नारायण बहुरा, उपधचाल्क राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर

ठक्कुर - फेरू -विरचित

| 00 | कि गन + रलपराक्षाद - सप्त - ग्रन्थसग्रह

. सम्लुपलब्ध-प्राचीनतम-पुस्तकालुसार परातत्त्वाचा्थ जिनविजय सुनि द्वारा संशोधित एवं सुपरिष्कृत

सामग्री-संपादनकतों अगरचन्द तथा भंवरलाल नाहटा

प्रकाशनकतो राजस्थान राज्याशानुसार संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान ( डायरेक्टर, राजस्थान ओरिएन्टल रीखर्च इन्स्टीव्यूट ) जोधपुर (राजस्थान )

खिस्ताचद्‌ / श९दृ१ /

विक्रमाव्द्‌ २०१७ |

राष्ट्रीय शकाब्द १८८३ 552 |

विपयानुकम

ज््््ज््््रा प्रधान संपादकीय - किंचित्‌ प्रासंगिक पू०. १- प्रास्ताविक कथन अगरचन्द्र, मंचरलाल नाहदा रे ५-

ठक्कर फेरूकृत रल्नपरीक्षाका परिचय के. डॉ. मोतीचन्द्र एम्‌ पीएचू. डी. पू०.. १-० २७

(१) रलपरीक्षा मूल ग्रन्थ पू० १-१६ ( २) द्रव्यपरीक्षा 99. 99 99 १७-- रे८ (३) धातूपत्ति #४ 9 9... ३९- ४४ ( 8) ज्योतिषसार 99. 99 99 १०-४० (५) गणितसार ,, # 9. 8१-७४ (६) वास्तुसारः » 9 , 9. नहर (७) खरतरगच्छयुगप्रधानचतुःपदिका 9. १०४-१०६ (८ ) परिशिष्ट - ज्योतिषविषयक स्फुटपय 9. १०७--१०८

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प्रधान संपादकीय - किंचित्‌ प्रासंगिक

राजस्थान प्रातन ग्रन्थमाला के ४४ वें प्रन्यांक रूप में, ठक्कर फेरू रचित ग्रन्थों का यह एकत्र संग्रह प्रकट किया जा रहा है

ठक्कुर फेरू के इन ग्रन्थों की लिखी हुईं ग्राचीन पोथी का पता छगाने का श्रेय श्री अगर चन्दजी और भंवंर छालजी नाहठा को है इन साहित्यलोजी बन्घुओं की लगन ने, कलकत्ते के ्क कोने में पडे हुए जैन ग्रन्थों के पिठारे में से, इस मूल्यवान निधि को अक्ाश में लाने का अमिनन्दनीय यश ग्राप्त किया है |

ठक्कर फेरू के ये ग्रबन्धात्मक ग्रन्थ कैसे मिले और इन को ग्रकाश में लाने का कैसा प्रयत्ञ किया --इस विषय में नाहठा बन्धुओं ने, अपने प्रस्तावनात्मक वक्तव्य में यथेष्ट लिखा है। इस से पहले भी इन्हों ने, कुछ पत्रों में छेख प्रकट करा कर इस विषय पर काफी प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है।

इस संग्रह की ग्राचीन पोथी जब इन के देखने में आई, तो इन की शोधक बुद्धि ने तत्काल उस का विशिष्ट महत्त्व पिछान लिया और तुरन्त उस पोथी पर से अपने हाथ से नकल उतार कर मेरे पास देखने के लिये भेज दिया। में ने भी ग्रन्थ के (द्वव्य- परीक्षा” नामक प्रबन्ध में वर्णित सर्वथा अज्ञात विषय की उपलब्धि देख कर, इस को सुप्रसिद्ध सिंधी जैन अन्थमाला द्वारा प्रकट कर देने की अपनी इच्छा नाहठा बन्धुओं को व्यक्त की और उस असल प्राचीन लिखित पोथी को मेरे पास भेज देने को लिखा पर उस समय कलकत्ते में सांप्रदायिक मार-पीठ की तूफान वाली हछ -चल मच रही थी इस लिये तुरन्त वह प्रति मेरे पास सकी ग्रतिका प्रत्यक्ष अवछोकन किये विना किसी ग्रन्थ को छाप देने के लिये भेरी रुचि संतुष्ट नहीं रहती, इस लिये में उस की प्रतीक्षा करता रहा बाद में, भेरा खयं जब कलकत्ता जाना हुआ तो में उस प्रति को देखने में समथे हुआ और नाहठा बन्धुओं के सौजन्य से वह प्रति कुछ समयके लिये मुझे मिल गई बंबई कर में ने उस पर से अपने निरीक्षण में प्रतिलिपि करवाई और उसे प्रेस में छपवाने की व्यवस्था की

बाद में बंबर छोड कर मेरा अधिक रहना राजस्थान में होने छगा और मैं मेरे तत्वावधान मे प्रस्थापित और संचालित राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर ( अब, राजस्थान ग्राच्य विद्या प्रतिष्ठान ) के संगठन और संचालन के कार्य में अधिक व्यस्त रहने छगा, तो इस का प्रकाशन स्थगित सा हो गया

पर इस ग्रन्थ को, इस रूप में, प्रकट करने - कराने की अमिवाषा नाहठा बन्धुओं को बहुत ही उत्कट रही और सुझे भी ये बहुत ग्रेरणा करते रहे | तब में ने इसे राजस्थान

श्‌ सलपरीक्षादि ग्रन्थ संग्रह-किंचित्‌ प्रासंगिक

पुरातन ग्रन्यमाला द्वारा प्रकट करने की व्ययस्था की और उसी के फल खरूप, आज यह ग्रन्य प्रकाश में रहा है | नाहठा वन्धुओं का जो सत्तत आग्रह रहता तो में इसे प्रकट करने में शायद ही समय होता अत* इस के सपादन के श्रेयोभागी ये बन्धु हैं। इस सम्रह की प्रेस कॉपी से छे कर ग्रन्य को चर्तमान रूप देने तक के ग्रुफ वगैरह सत्र मुप्ने ही देखने पडे और भाषा एवं अथीजुसन्धान की दृष्टि से इस के समोवन में मुझे बहुत श्रम उठाना पडा | इस लिये ग्रन्य के प्रकाशित होने में अपेक्षा से भी बहुत भधिक समय व्यतीत हुआ ठकर फेरू ने अपनी ये सब रचनाए ग्राइृत भाषा में' लिखी # | पर इस की यह प्राकृत भाषा, शिष्ट और व्याकरण वद्ध हो कर, एक ग्रकार की ' प्राइतै-अपश्षश की चलती शैली वाली भाषा है जिसे हम झुद्ध ग्राकृत कह सकते हैं, शुद्ध अपश्रग ही कह. सकते है फेरू के इन ग्रन्थो के जो यिपय है वे लोकव्यवह्ार की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी और अम्यसनीय है | इस लिये उस ने अपनी रचना के लिये ग्राहृत , भाषा की बहुत ही सरल शैली का उपयोग करना पसद किया उस का छक्ष्य अपने भाव को- त्रिपय के अये को अभिव्यक्त करना रहा है, इस लिये व्याकरण के रूट वियमो का अनुप्तरण करने के लिये वह प्रयक्षगान्‌ नहीं दिखाई देता। अपनी रचना के लिये प्राकृत का प्रसिद्ध गाथा छन्‍द उस ने पसन्द किया है और वह छन्द के नियम का ठीक पालन करने की दृष्टि स, कही हख को दीप और दीप को हख रखता है, और कहीं कहीं द्वित्व अक्षर को एकाक्षर के रूप में तो कहीं एकाक्षर को द्ित्व के रूप में भी प्रधित कर देता है। छन्‍्द का भग हो इस पिचार से वह शब्दों का निर्विभक्तिक रूप तक रख देता है। अन्यकार की इस शैली का ठीक अध्ययन करते करते हमें इस का सशोधन करना पडा है। इस लिये हमारा समय भी इस में बहुत व्यतीत हुआ | '.. फेरू के इन ग्रन्यों में से 'वस्तुसार' और 'रक्तपरीक्षा” तथा “धादत्पत्ति! के कुछ हिस्से के सित्रा, और प्रन्यों की अन्य कोई प्रति उपलब्ध नहीं हुईं, अत उक्त एकमात्र प्रति के आधार पर ही सब पाठनिणैय करना पडा। साथ में प्रति के लेखक की अशद्युद्धियो ने भी ऊुछ परिश्रम बढा दिया। प्रति का लिखने बाला सस्कृत जानता है प्राकृत उस ने कहीं कहीं अपनी भापा में जो वाक्य लिखे हैं उन पर से उस के मापाज्ञान का परिचय पिल जाता है | हम ने इस के सशोधन में केयछ उतना ही प्रयत्न किया है जिस से अधथैवोध ठीक हो सके, और व्याकरण के नियम के निकठ शब्द का रूप रह सके। दब्यपरीक्षा, रत्नपरीक्षा और धावत्पत्ति ये तीन अवन्ध छौकिक शर्व्दों के ऊपर आधारित हैं और इन में के अनेक शब्द ऐसे हैं. जो सर्बथा अपरिचित से लगते हैं ।! इन शब्दों का ठीक

खरूप जानने का कोई अन्य साधन नहीं | अत उन की;स्थिति जैसी लिखित प्रति में है बच्ची दी रखनी आनश्यक रही

रत्नपरीक्षादि अन्थ संग्रह-किंचित्‌ प्रासंगिक

वस्तुसार एक प्रसिद्ध रचना है। इसका मुद्रण भी पहले हो चुका है और फिर इस की अन्य प्रतियां भी उपलब्ध होती हैं | अतः उन के आधार पर यह प्रबन्ध तो प्रायः ठीक शुद्ध किया जा सका है। इस के तो विशिष्ट पाठ भेद भी दे दिये हैं

फेरू के इन ग्रन्थों में सब से अधिक महत्त्व का ग्रन्थ “द्रव्यपरीक्षा ! है इ्स प्रबन्ध भें, उस ने अपने समय में भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों और प्रान्तों में प्रचलित, सिक्कों की जो जानकारी लिखी है वह स्वथा अप्रव है इस विषय पर प्रकाश डालने वाली और कोई ऐसी प्राचीन साहिल्थिक कृति अभी तक ज्ञात नहीं है इस ग्रन्थ पर तो भारत के मध्यकालीन सिक्कों के परिज्ञाता ऐसे किसी विशिष्ट विद्वान्‌ को, एक अध्ययन पूर्ण एवं प्रमाणभूत ग्रन्थ लिखना आवश्यक है। इस का संपादन कार्य प्रारंग करते समय हमारा उत्साह था, कि हम इस विषय में यथाशक्य जानकारी एवं साधनसामग्री प्राप्त करके, इस के साथ छोठा-बडा भी वैसा कोई निबन्ध लिखेंगे; पर समयाभाव के कारण हम वैसा निबन्ध लिखने में असमथे रहे हम आशा करते हैं कि अब इस ग्रन्थ का यह मूल खरूप प्रकठ हो जाने पर, कोई सुयोग्य निष्कविज्ञ विद्वान वैसा प्रयत्न करने की प्रेरणा ग्राप्त करेंगे

फेरू के “रह्नपरीक्षा ! ग्रन्थ के विषय में तो प्रसिद्ध विद्वान्‌ डॉ. मोती चन्दजी ने एक अच्छा परिचयात्मक निबन्ध लिख देने की कृपा की है, जो इसके साथ दिया गया है | इसके लिये हम डॉक्टर साहब के प्रति अपना आभार प्रदशित करते हैं |

“गणितसार ओर “ज्योतिषसार ! ये रचनाएं ग्राथमिक अभ्यासियों के अध्ययन की दृष्टि से अच्छी उपयोगी हैं गणितसार में तो ठक्कुर फेरू ने अपने समय में दिल्ली के आसपास के प्रदेश में व्यवह्तत अनेक देश्य शब्दों ओर स्थानिक पदार्थों का भी उछेख किया है जिन पर विशेष प्रकाश डाला जा सकता है

फेरू के इस ग्रन्थ संग्रह की जो उक्त प्राचीन प्रति उपलब्ध हुई है वह, जैसा कि उसके लिपि कतो ने दो तीन स्थानों पर निर्देश किया है, वि. सं. १४०३ और १४०४ वर्ष के बीच में लिखी गई है| वास्तव में यह पोथी उक्त संबत्‌ के फाल्युण और चेत के महिने के बीच में, डेढ-दो महिने के अन्दर ही छिखी गई है ठक्कर फेरू ने “द्रव्य परीक्षा” की रचना, संवत्‌ १३७० में दिल्ली में अछाउद्दीन बादशाह के राज्य काल में की थी | अतः रचना समय के वाद २७-३० वे के भीतर ही यह पोथी लिखी गई थी जिस से इस की ग्राचीनता खतः सिद्ध है

इस ग्रति की कुछ पत्रसंख्या ६० हैं और उन में निम्न तालिका के अनुसार फेरू की इस संग्रह वाली सातों रचनाएं लिखी गई हैं

रत्मपरीक्षादि ग्रन्थ संग्रह - किंचित्‌ प्रासंगिक

पत्राक श्से१८ तक में ज्योतिपसार ३. १९ से २७ 2 » ' द्ब्यपरीक्षा २८ से ३७ वास्तुसार 9 ५9 १६ से 9७१ & हर रक्परीक्षा / ७५ फऊऋ ४१०५ से ४३ & गन घात्त्पत्ति घफ ४३ से 9४ गा युगप्रधान चतुप्पदी ४५ से ६० हा गणितसार

हम ने इस सम्रह में प्रतिस्थित ग्रन्यक्म का अनुसरण करते हुए, प्रथम रत्परीक्षा, द्व्यपरीक्षा और बातरपत्ति नामक इन रचनाओं को एक साथ रखा है, और फिर य्योतिपसार, गणितसार एवं वास्तुसार इन रचनाओं को एक साथ रख कर, अन्त में “युग प्रधान चतुप्पदी” रचना को दे दिया है| इस से ग्रिपय का प्रिमाजन ठीऊ सगत हो गया है

इसके साथ मूल प्राचीन प्रति जो कलकते के जैन भडार में प्राप्त हुई उसके कुछ पन्नेंफे ब्ाक भी बना कर दिये जा रहे हैं. जिस से पाठझों को प्रति की प्रतिकृति का दर्शन हो सके

प्योतिष, गणित, वास्तुशाद्र, र्शास्र और मुद्रानिपयक जिज्ञान पर, इस प्रकार की विशिष्ट ग्रन्थ रचना करने वाला ठक्कुर फेर, सचमुच अपने समय का एक बहुत ही बहुश्रुत तिद्ानू और अनुभवी शाख्ज्ञ था| उसकी ये कृतिया हमारे प्राचीन साहिलय की वहुमूल्य निधि हैं और इस प्रकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान द्वारा इन का ग्रफाशित होना सपधा समादरणीय होगा

चैत्र शुक्र ३, वि २०१७

) दिनाऊ-३१, मार्च, १९६१ न्‍+ भारतीय विद्या भगन, वपई रा छुनिजिनविजय

ठकुर फेरू और उनके ग्रन्थों के विषय में प्रासत्ताविक कथन

(लेखक - अगरचन्द, भंचरलाल नाहदा )

कन्नाणा निवासी ठक्कुर फेर का नाम यों तो उन की सुग्रसिद्ध कृति बास्तुसार प्रकरण के कारण सर्व विदित था, परन्तु उन के बहुमुखी प्रतिभासंपन्न एवं महान्‌ ग्रंथकार होने का अब तक पता नहीं था। १५ वर्ष पूर्व, कलकते की श्रीमणि जीवन जैन व्ययत्रेरी की सूची में 'सारा कौमुदी गणित ज्योतिष” नाम से उछिखित फेरू ग्रंथावढी की प्रति देखने पर ठक्कुर फेर की कई नई कृतियाँ ज्ञात हुईं | इस प्रति की ग्राप्ति से केवछ हमने ही नहीं, पर जिस किसीने सुना परम आनंद प्राप्त किया इन ग्रंथों की उपलब्धि से ठक्कर फेर की गणना, भारतीय साहिल्म में, एक अनूठा स्थान प्राप्त करने वाले विद्वानों में की जा सकती है।

ठक्कुर फेरू विक्रम की चौदहवीं शती के राजमान्य जैन गृहस्थों में प्रमुख व्यक्ति थे। इन्होंने अपनी कृतियों में जो परिचय दिया है उससे विदित होता है कि ये कन्नाणा निवासी श्रीमाल वंश के धांधिया ( घंघकुछ ) गोत्रीय श्रेष्ठि कालिय या कलश के पुत्र ठक्कुर चंद के सुपुत्र थे। इनकी सर्व प्रथम रचना “युगप्रधान चतुष्पदिका' है जो संवत्‌ १३४७ में वाचनाचाय राजशेखर के समीप, अपने निवासस्थान कन्नाणा में बनी थी इन्होंने अपनी कृतियों के अंत में “परम जैन” और अपने आप को “जिणंद पय ' भत्तो” लिख कर अपना कट्टर जैनत्व सूचित किया है| इन्होंने 'रत्नपरीक्षा' में अपने पुत्र का नाम हेमपाल लिखा है, जिसके लिये इस ग्रेथ की रचना की है। इनके भाई का नाम अज्ञात है परन्तु श्राता और पुत्र के लिए 'द्रव्यपरीक्षाँ नामक विशिष्ट ग्रंथ की रचना की थी।

दिल्लीपति सुरत्राण अलाउद्दीन खिलजी के राज्याधिकारी या मंत्रिमंडल में होने के कारण, पीछे से इनका निवास स्थान अधिकतर दिल्ली ही गया था। इन्होंने 'द्रव्यपरीक्षा' दिल्ली की टंकसाल के अनुभव से तथा रवत्नपरीक्षाँ ग्रंथ सम्राट के रत्नागार के प्रत्यक्ष अनुभव से, एवं गणितसारा में मी दी हुई तत्कालीन राजनैतिक गणित ग्रश्नावली आदि से, यह फलित होता है कि ये अवश्य शाही दरार में उच्च पदासीन व्यक्ति थे। संबत्‌ १३८० में दिल्ली से श्रीमाल सेठ रयपति ने महातीर्थ शत्रुज्ञय का संघ निकाला था, जिसमें ठक्कुर फेर भी सम्मिलित हुए थे

१-पं, भगवानदासजी जैन ने जयपुर से “बास्तुसार” ( गुजराती अनुवाद सहित संस्करण ) के साथ “रत्नपरीक्षा” और “घातोत्पत्ति” का अपूर्ण अंश सी प्रकाशित किया है ३-देखें हमारी “दादा जिन कुशल सूरि” पुस्तक +

द्व प्रास्ताविक कथन

ठकुर फेर की “बुगप्रधान चतुष्पढिका के अतिरिक्त समी कतियाँ प्राकृत में हैं। भापा बडी सरल, ग्रवाही और अपश्रश या तत्कालीन छोऊभापा के प्रमाव से प्रभानित है ग्रन्योक्त कतिपय चृत्तान्त तत्फालीन भारतीय संस्कृति एप भाषा पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं | इनकी कृतियों का सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

१, युगप्रधान चतुष्पदिफा-यह कृति तत्काीन लोकमापा अपन्रश में २८ चौपई एक छप्पय में रची गई है। इसमें भगवान महावीर से छगा कर खरतरमच्छ के युगप्रधान आचार्यों की परपा की नामायछी निम्रद्ध है। आचार्य श्री वद्धमान सूरि के पद्नधर श्री जिनेश्वर सूरिजी से यट गच्छ खरतर नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके परतर््ती आचार्यों के सबन्ध में कतिपय सक्षिप्त ऐतिहासिक बृत्तान्तों का मी निर्देश किया गया है। जैसे -

श्री जिनेश्वर सूरिजी ने अणहिलपुर में दुर्लभराज के समक्ष ८४ आचार्यों को जीत कर वसति माग प्रकाशित किया।

श्री जिनचद सरिजी ने उपदेश द्वारा नृपति को रजित फ्रिया एप 'सबेग- रगशाला नामक ग्रय की रचना की |

श्री अभयदेव सूरिजी ने अर्गो पर टीऊाएँ बनाई एवं स्तभन पाश्चनाथ की प्रतिमा ग्रफट की

श्री जिनयद्धम सरिजी ने नदी, न्हयण, रथ, प्रतिष्ठा, युवतियों के ताला रास जादि कार्य रात्रि में किये जाने निषिद्ध किये।

श्री जिनदत्त सूरिजी ने उज्जैन में ध्यान-बल से योगिनी चक्र को प्रतिबोध दिया शासन देयता ने इन्हें 'युग प्रधान! पद धारक घोषित किया |

श्री जिनचद्र सूरिजी बडे रूपयान थे। इन्होंने बहुत से श्रावर्कों को प्रति- बोध दिया |

श्री जिनपति सूरिजी ने अजमेर के द्ृपति ( पृथ्वीराज ) की सभा में पद्मप्रभ को पराजित कर जयपत्र ग्राप्त किया |

< श्री जिनेश्वर सूरिजी ने अनेक स्थानों में जिनाछय एवं तदुपरि ध्वज, दण्ड, “कण, तोरणादि स्थापित किये एवं १२३ सावु दीक्षित किये

इनके पहघर श्री जिनप्रवोध सूरि के पद्घर श्री जिनचद्र सूरिजी के समय में कल्ाणा में बाचनाचार्य राजमेखर गणि के समीप, समत्‌ १३४७ के माघ मास में, इस चतुष्पदी की रचना हुईं इसकी एक पति दमें जैसलमेर के मडार का अवलोरून करते हुए प्राप्त हुई थी, जिसकी नकझ हमारे पास विद्यमान है और उससे आयश्यक पाठन्तर मी लिये गये है |

भास्ताविक कथन

. २, रत्नप्रीक्षा-- यह ग्रंथ १३२* ग्राकृत गाथाओं में है। संवत्‌ १३७२ में दिल्ली में सम्राद्‌ अल्लाउद्दीन के शासनमें खपुत्र हेमपालछ के लिये प्रस्तुत ग्रंथ की रचना की | पूर्व कबि अगस्त और बुद्ध मठ के ग्रंथों के अतिरिक्त शाही र्नकोश की अनुभूति द्वारा अभिलषित विषय का सुन्दर ग्रतिपादन किया है

३, वास्तुसार - शिल्प स्थापत्य के विषय में प्रस्तुत ग्रंथ प्रामाणिक माना जाता है | पं. भगवानदासजी ने हिन्दी और गुजराती अनुवाद सह जयपुर से प्रकाशित भी कर दिया है। प्रस्तुत ग्रति संवबत्‌ १४०४ की लिखित है ओर मुद्रित संस्करण से पाठ भेद का प्राचुय है। इसकी रचना संबत्‌ १३७२ विजया-दशमी को कन्नाणापुर में हुई

४, ज्योतिषसार-यह ग्रंथ संवत्‌ १३१७२ में २४२ प्राकहृत गाथाओं में रचित है, जिसकी छोक संख्या, यंत्र कुंडलिका सह 9४७४ होती है। इसमें ज्योतिष जैसे वैज्ञानिक विषय को बडी कुशलता के साथ निरूपण किया है।

५, गणितसार कोझ्ु॒दी -यह ग्रंथ कुछ ३११ गाथाओं में है। गणित जैसे शुष्क और बुद्धि प्रधान विषय का निरूपण करते हुए ग्रन्थकार ने अपनी योग्यता का अच्छा परिचय दिया है। इस ग्रंथ के परिशीलन से तत्काढीन वस्तुओं के भाव, तौंल, नाप इल्यादि सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति का अच्छा ज्ञान हो जाता है। बर्खों के नाम, उनके हिसाब, पत्थर, छकड़ी, सोना, चाँदी, धान्य, घुत, तैलछादि के हिसाबों के साथ साथ क्षेत्रों का माप, धान्योत्पत्ति, राजकीय कर, मुकाता इत्यादि अनेक महत्वप्ण बातों पर प्रकाश डाला गया है। इसके कतिपय प्रश्न देश्य भाषा के छप्पयों में भी है, जो भाषाकीय अध्ययन की दृष्टि से भी अपना वैशिष्टय रखते हैं

६, धातोत्पत्ति-प्राकृत की ५७ गाथाओं में पीतछ, तांबा, सीसा ग्रभ्न॒ति धातुओं के उत्पत्ति विधानादि के साथ साथ हिंगुल, सिंदुर, दक्षिणावत्त संख, कपूर, अगर, चंदन, कस्त्री आदि वस्तुओं का भी विवरण दिया है; जो कबि के बहुज्ञ होने का सूचक है।'

७, द्रव्यपरीक्षा - प्रस्तुत श्रेथ' कवि की समस्त रचनाओं में अहछवितीय है। भारतीय साहिल्ल में पुराने सिक्कों के संबन्ध में खतन्न रचना वाढ्य यही एक ग्रंथ उपलब्ध है

* प० भगवानदासजी के प्रकाशित वास्तुसार (गुजराती अनुवादसहित ) के अंत में रह्नपरीक्षा ( गा० २३ से १३७ ) छपी हैं उसके बीच की ६१ से ११५ तक की गाथाएँ धातोत्पत्ति की हैं पाठमेद भी काफी है। उक्त अन्थाजुसार रह्परीक्षा १९७ गाथाओं का होता है पर वास्तव में उसमें बीच की बहुत सी गाथाएं छूट गई हैं

प्रास्ताविक कथन

जिसमें मुठ्राओं के मूल उपादान, धातुओं की चासनी, धातुशोधन ग्रणालिका, मिन्न मिन्न मुद्राओं (सैऊ्डों रकम की ) के नाम, टकसालस्थान, आकार प्रकार, तौल, माप, धातु के मिश्रण, राजाओं के नाम-ठाम आदि समी विपयों पर १४९ गाथाओं में, प्राचीन काल से ले कर तत्काढीन समय तक की प्राप्त समी मुद्राओ पर विशिष्ट विवेचन किया गया है

प्रस्तुत प्रति जिसके कुछ ६० पत्र हैं, सयत्‌ १४७०३-१४०४ में लिखी हुई सुन्दर सुवाच्य ओर अच्छी स्थिति में है। किसी सा० भायदेव के पुत्र पुरिसड ने अपने लिए लिखी है | प्रति के हासिये पर पत्तनीय ग्र लिखा हुआ है जिससे माठम होता दे कि यह प्रति मूलमें पाटण के ज्ञानमडार की रही होगी फेरू ग्रपावदी की प्रस्तुत प्रति से “प्रेसकापी” भयरलाछने खय अपने हाथ से करके पुरातत्याचार्य मुनि जिनबिजयजी को भेजी, जिसे देख कर इन्होने उस समय सिंधी जैन प्रन्यमाव्य द्वारा इसे तुए्त प्रकाशित करने की इच्छा व्यक्त की | साथ में आपने मूल प्रति को भी देखना चाहा पर कलछकत्ते की तत्काढीन साम्रदायिक प्रिपम परिस्थिति वश, बह तब उन्हें नहीं भेजी जा सकी बादमें जब मुनिजी कलकत्ता पघारे तथ प्रस्तुत ग्रति को बचई ले गये। श्रद्धेय मुनिजी जैसे विद्वान के तत्तयाधान में यह अथ शञीत्र प्रकाशित हो ऐसी हमारी उत्कद इच्छा रही, पर सिंधी जेन ग्रन्यमाठा के अनेकानेऊ ग्रन्थों के सपादन कार्य में मुनिजी अलद्यग्त व्यस्त रहने के कारण इसके प्रकाशन कार्य में विछ्व होता रहा |

पर अप यह ग्रन्थ, इस रूप में राजस्थान पुरातन ग्रन्थ माला द्वारा अरकाशित हो रहा है, जो इस विषय के जिज्ञासुओं को परम आनन्द दायक होगा

प्रस्तुत सम्रह में ठक्कुर फेरू के 'र्नपरीक्षा? ग्रन्थ के परिचय रूप में, स॒प्रसिद्ध विद्वान डॉ मोती चन्दजी ने, हमारी प्रार्थना पर, एफ पिस्तृत नियन्‍्ध लिख दिया है, जो इसमें मुद्रित हो रहा है। हम इसके छिये डॉ साहब के प्रति अपना हार्दिक कृतज भाग ग्रऊर करना चाहते है |

अन्त मे हम आचार्य श्री जिननिजयजी के प्रति अपना यिनम्र और सादर आमार- भाग प्रदर्शित करना चाहते है कि इन्‍्हों ने, बहुत परिश्रम के साथ, इस ग्रन्थ का यह सुन्दर प्रकाशन, राजस्थान पुरातन ग्रन्य माछझ के एक सुन्दर रत्न के रूप में प्रकट कर, हमारे चिरामिलूपित मनोरथ को सफ़छ बनाया |

अगरचन्द तथा 'मंवरलाल नाहदा

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ठक्कुर फेरुकृत रलपरीक्षाका परिचय "+-ब्दल 26075. लेखक ध्स् डॉ, मोतीचन्द्र, एम, छ्‌ श्र पीएच. डी, ( क्युरेटर, प्रिस्स औफ वेटल मुजिअम, बंबई ) | 2,<

अमरकोश ( २।१॥३-४७ ) में पृथ्वी के अड़तीस नामों में बछ्चुधा, वसुमती और रलगभा नाम आए हैं जिनसे इस देश के रत्नों के व्यापार की ओर ध्यान जाता है ऐ्लिनी ने ( नेचुरठ हिस्दी ३७७७६ ) भी भारत के इस व्यापार की ओर इशारा किया है। इसमें जरा भी संदेह नहीं कि १८ वीं सदी पर्यत जब तक कि, ब्राजिल की रत्नों की खानें नहीं ख़ुलीं थीं, भारत संसार भर के रत्नों का एक प्रधान बाजार था रह्नों की खरीद विक्री के बहुत दिनों के अनुभव से भारतीय जौहरियोंने र्परीक्षा शात्र का सजन किया। जिसमें रत्नों के खरीद, बेच, नाम, जाति, आकार, घनत्व, रंग, ग्रुण, दोष, कीमत तथा उत्पत्तिस्थानों का सांगोपांग विवेचन किया गया | बाद में जब नकली रत्न बनने छगे तब उन्हें असली रत्नों से विठछग करने के तरीके भी वतछाए गए आंत में रत्नों और नक्षत्रों के सम्बन्ध और उनके शुभ और अशुभ प्रभावों की ओर भी पाठकों का ध्यान दिलाया गया।

रत्रपरीक्षा का शायद सबसे पहला उछेख कौटिल्य के अर्थशात्र ( २११ ०२६ ) में हुआ है | इस प्रकरणमें अनेक तरह के रत्न, उनके प्राप्तिस्थान तथा गुण और दोष की विवेचना है कामसूत्र की चोंसठ कलछाओं की तालिका में ( कामसूत्र, १।३।१६ ) रूप्य-रत्न-परीक्षा और मणिरागाकर ज्ञान विशेष कलाएँ मानी गई हैं। जयमंगला टीका के अनुसार रूप्य-रत्न-परीक्षा के अन्तगत सिक्कों तथा रत्न, हीरा, मोती इत्यादि के शुण दोषों की पहचान व्यापार के लिए होती थी मणिरागाकर ज्ञान की कला में गहनों के जड़ने के लिए स्फटिक रंगने और रत्नों के आकरों का ज्ञान जाता था। दिव्यावदान (प्रृ० ३) में भी इस बात का उल्लेख है कि व्यापारी को आठ परीक्षाओं में, जिनमें रह्नपरीक्षा भी एक है, निंष्णात होना आवश्यक था पर इस रह्परीक्षा ने किस युग में एक शास्त्र का रूप ग्रहण किया इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता कौठिल्य के कोश-प्रवेश्य रत्नपरीक्षा प्रकरण से तो ऐसा माद्ूम पड़ता है कि मैये युग में मी किसी किसी रूप में रत्नपरीक्षा शात्र का वैज्ञानिक रूप॑ स्थिर हो चुका था। रोम और भारत के बीच में ईसा की आरंभिक सदियों में जो व्यापार चलता था उसमें रत्नों का भी एक विशेष स्थान था इसलिए यह अनुमान करना शायद गछत होगा कि भारतीय व्यापारियों को, रत्नों का अच्छा ज्ञान रहा होगा

2 8क्कुर-फैरू-विरचिते

जौर्‌ किसी किसी रूप में र्षपरीक्षा, शात्ष की स्थापना हो चुकी होगी जो भी हो, इसमें जगा मी सदेह नहीं कि ईसा की पाचववीं सदी के पहले रक्षपरीक्षा का सृजन हो चुका था।

यह समझ लेना भूल होगा कि रक्-परीक्षा शास्र केनछ जैहरियों की शिक्षा के लिए ही बना था। इसमें शक नहीं कि, जैसा दिव्यावदान में कहा गया है; व्यापारियों के पुत्र पूर्ण और सुप्रिय ( दिव्यावदान, ए० २६, २९, ) को जौर और वियाओ के साथ साथ रक्तपरीक्षा मी पढ़ना पडा था | हमें इस बात का पता है कि आधीन भारत में राजा और रईस र्ों के पारखी होते थे यह आउश्यक भी था क्‍यों कि व्यापारियों के सिवा वे ही रक्ष खरीदते थे और सग्रह करते थे जैसा कि हमें साहिदय से पता चचछता है, काव्यकारों को भी इस रक्नशाश्न का ज्ञान होता था और वे बहुधा रहो का उपयोग रूपको और उपमाओ में करते थे, गो कि रत्न सम्बन्ची उनके अकलार कमी कमी अतिरंजित होकर वास्तविकता से बहुत दूर जा पहुचते थे जैसा कि हमें मृच्छफठिक के चौथे अक से पता चढता है, कि जब विदूषक वस्तसेना के महल में घुसा तो उसने छट्ठे परकोटे के आगन के दाछानो में कारीगरों को आपस में चैड्ड्य, मोती, मूगा, पुखराज, नीछम, कर्मेतन, मानिक और पन्ने के सम्बन्ध में बातचीत करते देखा मानिक सोने से जडे ( बध्यन्ते ) जा रहे थे, सोने के गहने गढ़े जा रहे थे, शख काटे जा रहे थे, और काटने के लिए मूगे सान पर चढ़ाए जा रहे थे उपयुक्त बविपरण से इस वात का पता चल जाता है कि शूद्वक को रत्॒परीक्षा का अच्छा ज्ञान रहा होगा कछाविछास के आठवे सम में सोनारो के वर्णन से भी इस बात का पता चलता है कि क्षेमेन्द्र को उनकी कछा और रत्नशात्ष का अच्छा परिचय था। '

रतपरीक्षा शात्ष का जितना ही मान था, उतना ही वह शात्ष कठिन माना जाता था। इसीलिए एक कुशछ रत्नपरीक्षर का समाज में काफि आदर होता था। र्नपरीक्षा के ग्रय उसका नाम बड़े आदर से छेते हैं। अगस्तिमतां (६७-६८) के अबुसार गरुणवान मडलिक जिस देश में होता है, वह धन्य है| आराहक को उसे बुलाकर आसन देकर तथा गध मालादि से सत्कार करना चाहिए। बुद्धभट्ट ( १४-१५) के अनुसार रत्नपरीक्षको को शाल्ज्ञ एव. कुशल होना चाहिए | इसी- लिये उन्हें रुनो के मूल्य और मात्रा के जानकार कहा गया है | देश कार के अनुसार मूल्य आँकने वाले तथा शात्र से अनमिज्ञ जौदरियों की विद्वान कदर नहीं करते। ठकुर फेल ( १०६-१०७ ) का भात मी कुछ ऐसा ही दै। उसके अनुत्तार मडलिक

2 देखिए, लेलेपिदर आंदिया, श्री लई फिनो, पारी १८९६। मैंने इस भूमिका को छिसने श्री ऐिलो के प्रध से सहायता ली है जिलश में आमार मानता हू.। श्री फिनो ने अपने इस महत्वपूर्ण प्रथ

में उपलब्ध रत्न शाज्रों को एक जगह इकट्ठा कर दिया है। के

सलपरीक्षा का परिचय'

को शात्रज्ञ, आंखवाछा, अनुभवी, देश, काल और भाव का ज्ञाता और रत्नों के खरूप का जानकार होना आवश्यक था। हीनांग, नीच जाति, सत्य रहित और बदनाम व्यक्ति जानकार और मान्य होने पर भी असली जोहरी कमी नहीं हो सकता | अगस्तिमत (६५) ने मी यही भाव प्रकट किए हैं।

अगस्तिमत ( ५४-६६ ) के अनुसार चतुर जोहरी को मंडलिन्‌ कहा गया है। यह नाम शायद इसलिए पडा कि जौहरी अपना काम करते समय मंडल में बैठता था। यह भी संभव है कि यहां मंडल से मंडछी यानी समूह का मतलब हो | अगस्ति मत ( ६१-६६ ) के अनुसार जौहरी रत्नों का मूल्य आंकता था। उसे देश में मिलनेवाले आठ खानों तथा विदेशी और द्वीपों से आए हुए रत्नों का ज्ञान होता था। उसे रनों की जाति, राग रंग, वर्ति, तौछ, गुण, आकर, दोष, आब (छाया ) और मूल्य का पता होता था | वह आकर ( पूर्वी मध्यभारत ), पूर्वदेश, कश्मीर, मध्यदेश, सिंह तथा सिंधु नदी की घाटी में रत्न खरीदता था तथा रत्न बेचने और खरीदने वाले के बीच मध्यस्थ का काम करता था | अगस्तिमत (७२ ) के अनुसार वह रत्न॑ विक्रेता से हाथ मिला- कर अंगुलियों के इशारे से उसे रत्न के मूल्य का पता दे देता था। उसी के एक क्षपक ( १३-२३ ) के अनुसार १, २, ३, 9 संख्याओं का ऋमशः तजनी से दूसरी अंगु- लियों को पकड़ने से बोध होता था अंगूठे सहित चारों अंगुलियां पकड़ने से की संख्या प्रकट होती थी कनिष्ठा आदि के तलस्पश से ऋरमशः ६, ७, और की संख्याओं का बोध होता था; तथा तजनी से १० का। फिर नखों के छूने से ऋशः ११, १२, १३, १४ और १७ का बोध होता था | इसके बाद हथेछी छूने पर कनिष्ठादि से १६ से १९ तक की संख्याओं का बोध होता था। तजनी आदि का दो, तीन, चार और पांच बार छूने से २० से ५० तक की संख्याओं का बोध होता था। कनिष्ठा आदि के तलों को वार तक छूने से ६० से ९० तक अंकों की ओर इशारा हो जाता था; तथा आधी तजनी पकड़ने से १००, आधी मध्यमा पकड़ने से १०००, आधी अनामिका पकड़ने से अयुत, आधी कनिष्ठिका से १०००००, अंगूठे से अ्रयुत, कलाई से करोड़ | मुगल काल में तथा अब मी अंग्रुलियों की सांकेतिक भाषा से जौहरी अपना व्यापार चछाते हैं।

प्राचीन साहिल्य में मी बहुधा जौहरियों के सम्बन्ध में उल्लेख मिलते हैं | दिव्या- वदान ( पृू० ३) में कहा गया है कि किसी रत्न की कीमत आंकने के लिए जौहरी बुलाये जाते थे। अगर वे रत्न की ठीक ठीक कीमत नहीं आंक सकते थे तो उसका मूल्य वे एक करोड़ कह देते थे। बृहत्कथाछोकसंग्रह ( १८, ३६६ ) से पता चलता है कि सानुदास ने पांड्य मथुरा में पहुंच कर वहां का जौहरी बाजार देखा और वहां एक क्रेता और विक्रेता को, एक जौहरी से, एक रक्ालंकार का मूल्य आंकने को कहते

ठकुर-फेरू-विरचित

घुना | सातुदात को उस गहने की ओर ताकते हुए देखकर उन्होने समझा मर शायद यह निमाहदार था। उससे पूछने पर उसने गहने की कीमत 'एक करोड़ बता कर कट दिया कि घेचने और खरीदनेयाले की मर्जी से सौदा पठ सकता था वे दोनों एक दूसरे जौहरी के पास पहुंचे जिसने कहा कि गहने की कीमत सारा ससार था पर नासमझ्न के छिए उसका मोल एक छदाम था सानुदास की जानकारी से प्रसन होकर राजा ने उसे अपना खपरीक्षक नियुक्त कर दिया

प्राचीन साहिलय में अनेऊ ऐसे उल्लेख आए हैं जिनसे पता चलता है जि रक्षो के ब्यापार के लिए भारतीय जौहरी देश और विदेश की वरावर यात्रा करते थे | दिव्या- बदान (प० २२९-२३० ) की एक कहानी में बतछाया गया है फि रत्नों के व्यापारी मोती, बैड्डये, शख, मंग़ा, चादी, सोना, अकीऊ, जमुनिया, और दक्षिणाव्त अख के व्यापार के लिए समुद्र यात्रा करते थे नियामक प्रायः उन्हें सिंहल द्वीप में बनने वाले नकछी रह्नों से होशियार कर देता था तथा उन्हें आदेश दे देता था कि वे खूब समझ कर माल खरीदें ज्ञाताधर्म कया ( १७) और उत्तराध्ययन सूत्रकी टीफा (३६।७३ ) से मी रत्ों के इस व्यापार की ओर सकेत मिछता है। उत्तराध्यय्नन टीका में एक ईरानी व्यापारी की कहानी दी गई है जो ईरान से इस देश में सोना, चादी, रत्न और मृगा छिपा कर छाना चाहता था | आवश्यक चूर्णि (प० ३४२) में रक्रव्यापार के लिए. एक बनिए का पारमकूछ जाने का उल्छेज है। महामारत ( २७२०-२६ ) के अनुसार दक्षिण समुद्र से इस देश में रत्न और मूगे आते थे ईसा की प्रारभिक सदियों में तो भारत से रोम को हीरे, साड, छोहिताऊ, अफीक, सार्डोनिक्स, वाबागोरी, क्राइसाप्रेस, जहर मुहरा, रक्तमणि, हेडियोद्राप, ज्योतिरस, कसौटी पत्थर, लहझुनिया, एवेंचुरीन, जमुनिया, स्फटिक, बिदौर, कोरड, नीक्म, मानिऊ छाल, छालपदे, गार्नेठ, तुरमुली, मोती इत्यादि पहुचते थे ( मोतीचन्द्र, सार्थवाह, पृ० १२८-१२५९ )

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प्राचीन रक्षपरीक्षा का क्या रूप रहा होगा यह तो ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता, पर उस सम्बन्ध के जो ग्रथ मिले हैं उनका विवरण नीचे दिया जाता है।

१, अर्थशास्र-कौठित्य ने कोश-अवेश्य रक्परीक्षा ( अर्थशात्र, २-१०-२९ ) में र्षपरीक्षा के सम्बन्ध की कुछ जानकारिया दी है कोश में अधिकारी व्यक्तियों के सह से ही रक्त खरीदे जाते थे | पहले प्रकरण में मोती के उत्पत्ति स्थान, गुण, दोष तथा आऊार इत्यादि का वर्णन है | इसके बाद मणि, सौगधिक, वैहर्य, पुष्पराग, इन्हनीक, नदक, समन्मष्य, सूथकान्त, विमठक, सस्यक, अजनमूल, पित्तक, घुछभक, छोदितक, अम्ताझुक, प्योतिरसक, मैलेयक, अहिष्छत्रक, कृर्प, पूतिकृप, झुगन्धिकूप,

रलपरीक्षा का परिचय '

क्षीरपक, सुक्तिचू्णक, सिलाप्रवालक, चूलक, झुऋ्रपुलक तथा हीरा और मूंगा ' के नाम आए हैं | इनमें से बहुंत से रत्नों की ठीक ठीक पहचान भी नहीं हो सकती क्यों कि वाद के रत्रशात्र उनका उल्लेख तक नहीं करते

२, रलप्रीक्षा-बुद्धभद्ट की रत्नपरीक्षा का समय निश्चित करने के पहले वराह- मिहिर की ब्रहत्‌ संहिता के ८० से ८३ अध्यायों की जानकारी जरूरी है | इन अध्यायों में हीरा, मोती और मानिक के वर्णन हैं | पन्ने का वणेन तो केवछ एक छोक में हैं| बुद्धभदट की रह्नपरीक्षा और बुहतूसंहिता के रक्नप्रकरण की छानबीन क़रके श्री फिनो ( वही ४० से ) इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि दोनों की रत्नों की तालिकाओं तथा हीरे और मोती का भाव लगाने की विधि इत्यादि में बड़ी समानता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों ग्रंथों ने समान रूप से किसी प्राचीन रत्नशाद्ष से अपना मसाला लिया गरुड़ पुराण ने मी बुद्धभट्ट का नाम हटाकर ६८ से ७० अध्यायों में रत्नपरीक्षा ग्रहण कर लिया | बहुत संभव है कि शायद बुद्धभट्ट का समय ७-८ वीं सदी या इसके पहले भी हो सकता है |

३, अगस्तिमत-भगस्तिमत और रत्नपरीक्षा का विषय एक होते हुए भी दोनों में इतना भेद है कि दोनों एक ही अनुश्वुति की बहुत दिनोंसे अछग हुई शाखा जान पड़ते हैं। श्री फिनो ( पृ० ११) के अनुसार अगस्तिमत का समय बुद्धमट्ट के बाद यानी छठी सदी के बाद माना जाना चाहिए शायद उसका लेखक दक्षिण का रहनेवाला जान पड़ता है। संभव है कि अगस्तिमत का आधार कोई ऐसा रक्शासत्र रहा हो जिसकी ख्याति दक्षिण में बहुत दिनों तक थी। ग्रंथ के अनेक उल्छेखों से ऐसा पता चलता है, कि रब्शात्र के ग्राचीन सिद्धान्तों को निबाहते हुए भी प्रंथकार ने अपने अनुभवों का उल्लेख किया है। अमाग्यवश ग्रंथकार के व्याकरण ओर हैली में निष्णात होने से उसके भाव समझने में बड़ी कठिनाई पड़ती है।

४, नवरत्रपरीक्षा-नवरत्रपरीक्षा के दो संस्करण मिलते हैं छोटे संस्करण में सोम भूभूजू का नाम तीन जगह मिलता है जिसके आधार पर यह माना जा सकता है कि इसके रचयिता कल्याणी का पश्चिमी चाढक्य राजा सोमेश्वर ( ११२८--१ १३ ८, ई. ) था | इस कथन की सचाई इस बात से भी सिद्ध होती है कि मानसोछास के कोशा- ध्यायमें ( मानसोलछास, भा० १, प० ६४ से ) जो रक्षों का वर्णेन है, वह सिवाय कुछ छोटे मोटे पाठमेदों के नवरक्षपरीक्षा जैसा ही है | नवरक्वपरीक्षा का दूसरा संस्करण बीकानेर और तंजोरकी हस्तलिखित प्रतियों में मिठता है इसमें धातुगद, मुद्राप्रकार और कृत्रिम रत्नप्रकार प्रकरण अधिक हैं संभव है कि स्पृतिसारोद्दार के लेखक नारायण पंडित ने इन प्रकरणों को अपनी ओर से जोड़ दिया हो।

उछुर-फेरू-विशचित

५, अगरस्तीय रतपरीक्षा-अगस्तीय रत्परीक्षा वास्तम में अगस्ति मत का सार है। पर विस्तार में कहीं कहीं नई बाते गईं हैं। अभाग्ययण इसका पाठ बहुत भ्रष्ट और भश्ुद्ध है।

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उपयुक्त ग्रयोँ के सिवाय रत्मग्रह, अथया रतसमुचय, अथवा समस्तरत्परीक्षा २२ छोकों का एक छोठा सा प्रथ है। छ्घुर्वपरीक्षा में मी २० छोक हैं, जिनमें रत्नों के गुण दोषों का वियरण है। मणिमाहात्म्य में शित्र पार्वती सवाद के रूप में कुछ उपरक्तों की मद्दिमा गाई गई है |

६, फेरू रचित रल्परीक्षा-दक्ृर फेरूर चित रत्परीक्षा , का कई कारणों से विशेष महत्त्व है | पहली बात तो यह है कि यह रत्नपरीक्षा प्राकृन में है। ठक्कर फेर के पहले भी शायद ग्राकत में रक्परीक्षा पर कोई ग्रथ रहा हो, पर उसका अभी तक पता नहीं दूसरी वात यह है कि ग्रथकार श्रीमाल जाति में उत्पन्न ठक्कुर चद के पुत्र ठक्कर फेर का छुल्तान अलछाउद्दीन खिछजी ( १२९६-१३ १६ ) के खजाने और टक्साछ से निकटतर सम्बन्ध था। उसका खय कहना है कि उसने बृहस्पति, अगस्त और बुद्धभट्ट की रक्तपरीक्षाओं का अध्ययन करके और एक जौहरी की निगाह से अछाउद्दीन के खजाने में रत्नों को देख कर, अपने अथ की रचना की ( ३-७५ ) उसके इस कथन से यह वात साफ माकम पड जाती है कि कम से कम ईसा की १३ वीं सदी के अत में बुद्धभट्ट की रत्परीक्षा, वराहमिद्िर के रत्नो पर के अध्याय और अगस्तिमत, रत्नशास्न पर अधिकारी ग्रथ माने जाते थे और उनका उपयोग उस थुग के जौहरी बराबर करते रहते थे | जैसा हम आगे चछ कर देखेंगे, ठक्कुर फेर ने रक्तपरीक्षा की प्राचीन परम्परा की रक्षा करते हुए भी तत्कालीन मूल्य, नाप, तोछ तथा रक्ों के अनेक नए

स्रोतों का उछेख किया है जिनका पता हमें फारसी इतिहासकारों से भी नहीं चलता रे

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4 प्राचीन रक्शाक्षों में खानों से निकले रत्नों के सित्राय मोती और मूंगा भी शामिल है जो वास्तत में पत्थर नहीं कहे जा सकते साधारणत जयाहरात के लिए रक़् और मणि और कमी कमी उपल झान्द का व्यवह्वार किया गया है सल्कृत सहिल्य में रत शब्द का व्यवद्वार कीमती वस्तु और कीमती जवाहरात के लिए हुआ है वराहमिहिर (च्यु० स० ८०२ ) के अनुसार रत्न शब्द का व्ययहार हाथी, धोड़ा स्री इल्ादि के लिए गुणपरक है, रत्तपरीक्षा में इसका व्यवहार केपछ कचनादि रक्षों के

लिए इआ है। मणि झजद का व्यवहार कीमती रत्नों के लिए हुआ है, पर बहुधा यह डब्द्‌ मनिया, गुरिया अयया मनके लिए भी आया है।

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रेल्परीक्षा का परिचर्थ है

वेदों में रत्न शब्द का ग्रयोग कीमती वस्तु और खजानों कें भर्थ में हुआ है ऋग्वेद में तीन जगह ( फिनो, पृ० १०५ ) स॒प्त रत्नों का उछ्लेख है मणि का अर्थ ऋगेद में तावीज की तरह पहननेवाले रत्नों से है ( ऋगेद, १।३॥८; अ०'वबे० १२९२; २।०।१ इब्मादि ) मणि तागे में पिरोकर गछे में पहनी जाती थी ( वाजसनेयी सं० ३०७; तैत्तिरीयस ३॥४।३॥१ ) इसमें भी संदेह नहीं कि वेदिक आरयों को मोती का भी ज्ञान था। मोती ( कृशन ) का उपयोग झंगार के लिए होता था ( ऋग्वेद, २।३०४; १०६८१; अथवैवेद 8/१०।१-३ )

सुब्यवस्थित रत्नशात्रों के अनुसार नव रत्नों में पांच महारत्न और चार उपरक्न हैं। बच्र, मुक्ता, माणिक्य, नील और मरकत महारत्न हैं। गोमेद, पुष्पराग, बैड ( छहसनिया ) और ग्रवाल उपरत्न हैं | मानिक और नीलम के कई भेद गिनाए गए हैं। वराहमिहिर ( ८२।१ ) तथा बुद्धभट्ट (११७ ) के अनुसार मानिक के चार भेद यथा-पतद्मराग, सोगंधि, कुरुबिंद और स्फटिक हैं अगस्तिमत ( १७३ ) के अलुसार मानिक के तीन भेद हैं, यथा-पद्मराग, सौगंधिक, कुरुविंद नवरत्रपरीक्षा ( १०९-११० ) में इनके सिवाय नीलगंधि भी गया है। अगस्तीय रत्नपरीक्षा में ( ०६ से ) मानिक का एक नाम मांसपिंड भी है। ठक्कर फेर के अनुसार (५६) मानिक के साधारण नाम माणिक्य और चुनी है, अब भी मानिक के ये ही दो नाम सर्वसाधारण में ग्रचलित हैं। मानिक के निम्नलिखित भेद गिनाए गए हैं- पत्मराय ( पद्मराग ), सोगंधिय ( सौगंधिक ), नीडगंध, कुरुविन्द और जामुणिय |

र्परीक्षाओं में नीलम के तीन भेद गिनाए गए हैं -नीढछ साधारण नीलम के लिए व्यवहतत हुआ है तथा इन्द्रनीई और महानीकू उसकी कीमती किसमें थीं। ठक्कर फेर ने (८१) नीलम की केवछ एक किस्म महिंदनील ( महेन्द्रनील ) बतलाया है |

ग्राचीन र्षपरीक्षाओं में पन्ने के मरकत और ताक़्य नाम आए हैं। पर ठक्कर फेर ( ७२ ) ने पन्ने के निम्नलिखित भेद दिए हैं- गरुडोदार, कीडडठी, बासउती, मूगउनी, ओर धूलिमराई

उपयुक्त नव रत्नों की तालिका प्रायः सत्र रत्नशात्रों में आती है पर अगस्तिमत ( २३२०-२९ ) में स्फटिक और ग्रभ जोड़कर उनकी संख्या ग्यारह कर दी गई है। बुद्धभट्ट ने उस तालिका में पांच निम्नलिखित रत्न जोड़ दिए हैं >यथा शेप ( ००४5) कर्केतन ( फैएएड09०४%३)! ) मीष्म, पुलक ( 8०77० 6 ) रुधिराक्ष (०००००॥०! ) शेष का ही अरबी जज रूपान्तर है | यह पत्थर मारत और यमन से आता था इसके बहुत से रंग होते हैं जिनमें सफेद और काला. प्रधान है भारत में इस पत्थर का पहनना अश्युभ

उछ२-फेरू-विरचित

माना जाता था मीष्म कोई सफेद रग का पत्थर होता था। बुद्ध (२१३२-७५ ) के अनुसार कषायर्क पिछाहट लिए हुए छाढूरग का पत्थर होता था जो युक्तिक्पतरु के अनुसार स्फटिक का एक मेद मात्र था। सोमछफ नीठ्मायठ सफेद पत्थर था और कुछ कर्केतन के किस्म का नीछा पत्थर था। '

बराहमिहिर की रक्नों की तालिका में वाईस नाम गिनाए गए हैं पर एक ही रत्न फी अनेक किसमें देखते हुए उनकी सख्या कम कर दी जा सकती है जैसे शशजिकान्त स्फिटिक का ही एक भेद है, महानील और इन्द्रनी७ नीलम हैं, तथा सौगधिक और पक्तराग मानिक के ही भेद हैं | इस तरह रत्नों की सख्या घट कर उन्नमीस हो जाती है यथा स्फटिक के सहित दस रत्न, कर्केतन, पुलक, रुषिराक्ष तथा विमठफ, राजमणि, शंख, अ्ह्ममणि, प्योतिसस और ससस्‍्यक प्योतिरस और सस्यक का उल्लेख आर्थशास्र </